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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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कई कारणों से उन्होंने अपने इस भाव को संवरण किया। इतने में ही उस समृद्धशाली पुरुष ने भूमिष्ठ होकर महाप्रभु के चरणों में प्रणाम किया। उस पुरुष को प्रणाम करते देखकर प्रभु ने अत्यन्त ही स्नेह से एक अपरिचित पुरुष की भाँति पूछा- ‘क्या आपका ही नाम राजा रामानन्द राय है?’
दोनों हाथों की अंजलि बांधे हुए अत्यन्त ही विनीत भाव से राय महाशय ने उत्तर दिया- ‘भगवन! इस दीन-हीन, भक्ति-हीन शूद्राधम को रामानन्द कहते हैं?’
इतना सुनते ही प्रभु ने उठकर रामानन्द राय का आलिंगन किया और बड़े ही स्नेह के साथ कहने लगे- ‘राय महाशय! मुझे सार्वभौम भट्टाचार्य ने आपका परिचय दिया था; उन्हीं की आज्ञा शिरोधार्य करके केवल आपके ही दर्शनों की इच्छा से मैं विद्यानगर आया हूँ। मैं सोच रहा था कि आपसे भेंट किस प्रकार हो सकेगी, सो कृपासागर प्रभु का अनुग्रह तो देखिये, अकस्मात ही आपके दर्शन हो गये। आज आपके दर्शनों से मैं कृतार्थ हो गया। मेरी सम्पूर्ण यात्रा सफल हो गयी। मेरा संन्यास लेना सार्थक हो गया, जो आप-जैसे परम भागवत भक्त के मुझे स्वत: ही दर्शन हो गये।’
हाथ जोड़े हुए दीनतापूर्वक रामानन्द जी ने कहा- ‘भगवन ! मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है कि आज मेरे अनन्त जन्मों का पुण्योदय हुआ है, जो साक्षात नारायण स्वरुप आप संन्यासी का वेष धारण करके मुझे जीवन बनाने के लिये यहाँ पधारे हैं। भट्टाचार्य सार्वभौम की मेरे ऊपर सदा से अहैतु की कृपा रही है, वे पुत्र की तरह, शिष्य की तरह, सेवक और सम्बन्धी की तरह सदा मेरे ऊपर अनुग्रह बनाये रखते हैं। प्रतीत होता है, उनके ऊपर आपकी असीम कृपा है, तभी तो उनके आग्रह को स्वीकार करके आपने मुझे अपने दर्शनों से कृतार्थ किया। वे एकान्त में भी मेरे कल्याण की ही बातें सोचा करते हैं, उसी के फलस्वरुप आपके अपूर्व दर्शनों का सौभाग्य मुझ-जैसे अधम को भी हो सका। मेरा जन्म छोटी जाति में हुआ है, मैं दिन-रात्रि लोकनिन्दित राज-काज में लगा रहता हूँ, विषयों के सेवन में ही मेरा समय व्यतीत होता है, ऐसे विषयी और परमार्थ-पथ से विमुख अधम को भी आपने आलिंगन प्रदान किया है, यह आपकी दीनवत्सलता ही हैं, इसमें मेरा अपना कुछ भी पुरुषार्थ नहीं है। मुझसे बढ़कर भाग्यवान आज संसार में कौन होगा, अब मैं अपने भाग्य की क्या प्रशंसा करूँ। प्रभु ने इस अधम को इतनी स्मृति रखी, इसे मैं किन पुण्यों का फल समझूँ।’
महाप्रभु ने कहा- ‘राय महाशय ! मैं आपके मुख से श्रीकृष्ण-कथा सुनने के निमित्त ही यहाँ आया हूँ, कृपा करके मुझे श्रीकृष्ण –कथा सुनाकर कृतार्थ कीजिये।’
रामानन्द जी ने कहा- ‘भगवन ! संसारी कीचड़ में फँसा हुआ मैं मायाबद्ध जीवन भला श्रीकृष्ण-कथा का आपके सम्मुख कथन ही क्या कर सकता हूँ? आप तो साक्षात श्रीहरि के स्वरुप हैं।’
प्रभु ने कहा- ‘संन्यासी समझकर आप मेरी प्रवंचना मत करें। सार्वभौम महाशय ने मेरे शुष्क हृदय को सरल बनाने के निमित्त ही यहाँ भेजा है। आप मुझे भक्तितत्त्व बताकर मेरे मलिन मन को विशुद्ध बनाइये।’ महाप्रभु और रामानन्द के बीच में इस प्रकार की बातें हो ही रही थीं कि उसी समय एक वैदिक ब्राह्मण ने आकर प्रभु को भोजन के लिये निमन्त्रित किया। राय महाशय ने भी समझा कि यहाँ इतनी भीड़-भाड़ में इन महापुरुष से आन्तरिक बातें करना ठीक नहीं है। अत: ‘फिर आकर दर्शन करूँगा’ ऐसा कहकर रामानन्द जी ने प्रभु से अपने स्थान में जाने की आज्ञा मांगी। प्रभु ने अत्यन्त ही स्नेह से कहा ‘भूलियेगा नहीं। अवश्य पधारियेगा। आपसे मिलकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है। आपके मुख से श्रीकृष्ण-कथा सुनने की बड़ी उत्कटा इच्छा हो रही है। क्यों आयेंगे न?’
रामानन्द जी ने सिर नीचा करके धीरे से कहा- ‘अवश्य आऊँगा, शीघ्र ही श्रीचरणों के दर्शन करके अपने को कृतार्थ बनाऊँगा। प्रभो! जब आपने इस अधमपर इतना अपार अनुग्रह किया है, तब कुछ काल तक तो यहाँ निवास करके मुझे संगतिमुख दीजिये ही। मैं इतना अधिक पापी हूँ कि आपके केवल दर्शनों से ही मेरा उद्धार न हो सकेगा।’ इतना कहकर राय महाशय ने प्रभु के पादपद्मों में प्रणाम किया और वे अपने सेवकों के सहित राजधानी की ओर चले गये। इधर महाप्रभु भी उस ब्राह्मण के साथ उसके घर भिक्षा करने के लिये गये।
राय रामानन्द द्वारा साध्य तत्व प्रकाश…
सन्ध्या का सुहावना समय है, सूर्यदेव अपनी समस्त रश्मियों के सहित अस्ताचल की लाल गुहा में घुस गये हैं। भगवान अंशुमाली का अनुसरण करते हुए पक्षिवृन्द भी अपने-अपने कोटरों में घुसकर चुपचाप शयन कर रहे हैं। मधुर रति के उपासक अपनी प्रिय वस्तु के मिलन के लिये उत्कण्ठित होकर भगवती निशा देवी के साथ अराधना में लगे हुए हैं। संसारी लोग सो रहे हैं, विषयीलोग विषय-चिन्तन में निमग्न हैं और संयमी जागरण करके उस अखण्ड ज्योति का ध्यान कर रहे हैं, महाप्रभु भी एकान्त में बैठे हुए राय महाशय की प्रतीक्षा कर रहे हैं।प्रेम में इतना अधिक आकर्षण है। वह प्रेमपात्र के दूर रहने पर भी उसे समीप में ले आता हैं, बाहर रहने पर भी भीतर खींच लाता है और बीच में आये हुए अन्तरायों को तोड़-फोड़ करके रास्ते को साफ भी कर देता हैं।
राय महाशय शरीर से तो चले आये थे, किन्तु उनका मन प्रभु के पादपद्मों में ही फंसा रह गया। वे शरीर से यन्त्र की भाँति बे-मन राज-काज करते रहे। सायंकाल होते ही उनका शरीर अपने मन की खोज में अपने-आप ही उधर की ओर चलने लगा। वे राज-पाट, पद-प्रतिष्ठा तथा मान-सम्मान किसी की भी परवा न करके एक साधारण सेवक को साथ लेकर दीनभाव से प्रभु के निवास स्थान की ओर चले। दूर से ही देखकर उन्होंने प्रभु के युगल चरणों में प्रणाम किया, प्रभु ने भी उन्हें उठाकर गले से लगा लिया। इसके अनन्तर थोड़ी देर तक दोनों ही मौन बने रहे। कुछ काल के पश्चात प्रभु ने कहा- ‘राय महाशय ! मैं आपके मुख से कुछ श्रीकृष्ण-कथा सुनना चाहता हूँ। आप मुझे बताइये कि इस संसार में मनुष्य को मुख्य कर्तव्य क्या है? आप ज्ञानी हैं, भगवदभक्त हैं, इसलिये मुझे साध्य-साधन का तत्त्व समझाइये।’
रामानन्द जी ने विनीतभाव से कहा- ‘आप मेरे द्वारा अपने मनोगत भावों को प्रकट कराना चाहते हैं।
क्रमशः
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