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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
219-

अच्‍छी बात है, जो मेरे अन्‍त:करण में प्रेरणा हो रही है, उसे मैं आपकी ही कृपा से आपके सामने प्रकट करता हूँ। पहले क्‍या कहूँ, सो बताइये?’ प्रभु ने कहा- ‘मनुष्‍य का जो कर्तव्‍य है उसका कथन करिये।’ राय महाशय ने कहा- ‘प्रभो ! मैं समझता हूँ-

स्‍वे स्‍वे कर्मण्‍यभिरत: संसिद्धिं लभते नर:।
अर्थात-
 अपने-अपने वर्णाश्रम धर्म के अनुकूल कर्म करते रहने से मनुष्‍य परम सिद्धि को प्राप्‍त हो सकते हैं, अत: जो जिस वर्ण में हो उसके कर्मों को करता हुआ उन्‍हीं के द्वारा विष्‍णु भगवान की आराधना कर सकता है। वर्णाश्रम को छोड़कर भगवान के प्रसन्‍न करने का और तो कुछ कोई सरल, सुगम और सुकर उपाय सूझता नहीं। शास्‍त्रों में भी स्‍थान-स्‍थान पर वर्णाश्रम पर ही अत्‍यधिक जोर दिया गया है। श्रीमभगवदगीता में तो स्‍थान-स्‍थान पर जोरों के साथ वर्णाश्रम धर्म के अनुसार कर्म करने के लिये आग्रह किया गया है और उसी के द्वारा सिद्धि मानी गयी है।
महाप्रभु राय महाशय के मुख से वर्णाश्रमधर्म की बात सुनकर बड़े प्रसन्‍न हुए। उन्‍होंने मुसकराते हुए कहा-‘राय महाशय ! यह आपने बहुत सुन्‍दर बात कही। सचमुच संसार में सभी मनुष्‍यों के लिये वर्णाश्रमधर्म का पालन करना अत्‍यन्‍त ही श्रेयस्‍कर है। इसीलिये सभी शास्‍त्र जोरों से चिल्‍ला-चिल्‍लाकर वर्णाश्रमधर्म की दुहाई दे रहे हैं। जीव पाप-पुण्‍य दोनों के मिश्रण से मनुष्‍य-शरीर पाता है, इसलिये जिनकी वासनाएँ विषय-भोगों में फंसी हुई हैं उनके निमित्त धर्म, अर्थ और कामरूपी त्रिपुरुषार्थयुक्‍त धर्म का विधान है। यदि मनुष्‍य स्‍वेच्‍छा से विषय-भोगों में प्रवृत्त हो जाय तो पतित हो जायगा, इसीलिये धर्म की आड़ की आवश्‍यकता है। धर्मपूर्वक बर्ताव करने से मनुष्‍य को स्‍वर्ग सुख की प्राप्ति होती है। किन्‍तु स्‍वर्ग सुख अस्‍थायी होने से पुण्‍य क्षीण होने पर फिर उसे गिरना पड़ता है, इसलिये कोई ऐसा उपाय बताइये कि कभी गिरना न पड़े।’

प्रभु की ऐसी बात सुनकर रामानन्‍द जी ने कहा- ‘प्रभो ! इसका तो यही उपाय है कि कर्मों में आसक्ति न रखी जाय। निष्‍कामभाव से कर्म किये जायँ। सकाम कर्म करने से तो वे फल को देने वाले होते हैं, किन्‍तु भगवत्‍प्रीत्‍यर्थ कर्म करने से वे किसी प्रकार के भी फल को उत्‍पन्‍न नही करते।’ महाप्रभु ने कहा- ‘यह आपने बड़ी ही सुन्‍दर बात बतायी। सचमुच यदि निष्‍कामभाव से कर्म किया जायँ तो वे त्रिलोकी के सुख से ऊंचे की ओर की ले जाते हैं, किन्‍तु उनके द्वारा तो आत्‍मशुद्धि ही होती है, वे मुक्ति में प्रधान हेतु न होकर गौण हेतु हैं, उनका फल ज्ञान न होकर आत्‍मशुद्धि है।इससे भी बढ़कर कुछ और बताइये?’

रामानन्‍द जी ने कहा- ‘प्रभो ! जब आप निष्‍कामकर्म को भी श्रेष्‍ठ नहीं समझते, तो सभी प्रकार के कर्मों का स्‍वरूपत: परित्‍याग करके निरन्‍तर श्रीभगवान का भजन ही करते रहना चाहिये। सचमुच कर्म कैसे भी किये जायँ, उनसे त्रितापों की निवृत्ति नहीं होती, इसलिये तापों से सन्‍तप्‍त प्राणियों के लिये सर्व धर्मों का परित्‍याग करके प्रभु के पादपद्मों की शरण जाना ही मैं मनुष्‍य का मुख्‍य कर्तव्‍य समझता हूँ। भगवान ने भी गीता में अर्जुन को यही उपदेश दिया है कि ‘हे अर्जुन’ ! तू सब धर्मों का परित्‍याग करके मेरी ही शरण में आ जा। मैं तुझे सब पापों से मुक्‍त कर दूँगा, तू सोच मत कर।’
प्रभु ने हंसते हुए कहा- ‘राय महाशय ! मालूम पड़ता है, आपसे कोई भी शास्‍त्र छूटा नहीं है। आपने शास्‍त्रों का विधिवत अध्‍ययन किया है। यह शरणापत्ति-धर्म जो अपने बताया है सर्वश्रेष्‍ठ धर्म है, किन्‍तु यह तो संसारी तापों से तपे हुए साधकों के लिये हैं, जो तापों का अत्‍यन्‍ताभाव ही करने के इच्‍छुक हैं। जो साधक इससे भी उच्‍च कोटिका है और उसे संसारी तापों का भान ही नहीं होता, उसके लिये कोई और उपाय बताइये।’

तब तो रामानन्‍द जी कुछ सोचने लगे और थोड़ी देर के पश्‍चात कहने लगे- ‘प्रभो ! मैं समझता हूँ समभाव में अवस्थित रहकर और सत-असत का विचार करते हुए भगवान की निरन्‍तर भक्ति करते रहना ही मनुष्‍य का मुख्‍य कर्तव्‍य है।’ प्रभु ने कहा- ‘यह तो बहुत सुन्‍दर है, किन्‍तु जिसे असली आनन्‍द की इच्‍छा है, उससे दो चीजों का विचार कैसे हो सकता है? द्वैधीभाव ही तो भय का कारण है। सत-असत का विचार बहुत उत्‍तम है, किन्‍तु इसमें मुझे सरसता नहीं दीखती। कोई सरस-सा उपाय बताइये।’
तब भक्‍ताग्रगण्‍य रामानन्‍द जी ने गर्जकर कहा- ‘प्रभो ! भगवान की विशुद्ध भक्ति ही सर्वश्रेष्‍ठ और मनुष्‍य का मुख्‍य कर्तव्‍य है। जैसा कि ब्रह्मा जी ने श्रीमदभागवत में भगवान की स्‍तुति करते हुए कहा-

ज्ञाने प्रयासमुदपास्‍य नमन्‍त एव
जीवन्ति सन्‍मुखरितां भवदीयवार्ताम।
स्‍थाने स्थिता: श्रुतिगतां तनुवाड़्मनोभि
र्ये प्रायशोऽजित जितोअप्‍यसि तैस्त्रिलोक्‍याम्।
अर्थात- 
‘हे अजित! जो मनुष्‍य ज्ञान में कुछ भी प्रयत्‍न न करके केवल साधु-संतों के स्‍थान पर अवस्थित रहकर उनके मुख से आपके गुणानुवादों को ही श्रवण करते रहते हैं और मन, वचन तथा कर्म से आपको नमस्‍कार करते हुए जीवन व्‍यतीत करते हैं, वे ही त्रिलोकी में आपको प्राप्‍त हो सकते हैं।’

रामानन्‍द जी के मुख से इस श्‍लोक को सुनकर प्रभु अत्‍यन्‍त ही प्रसन्‍न हुए। उन्‍होंने प्रसन्‍नता प्रकट करते हुए कहा- ‘सचमुच भट्टाचार्य सार्वभौम ने आपके शास्‍त्र ज्ञान की मुझसे जैसी प्रशंसा की थी, यहाँ आकर मैंने आपको वैसा ही पाया। मनुष्‍य का परम पुरुषार्थ और सर्वश्रेष्‍ठ धर्म भगवान मधुसूदन की अहैतु की भक्ति करना ही है। इसलिये यह तो मैं स्‍वीकार करता हूँ किन्‍तु भक्ति किस प्रकार से की जाय, यह और बताइये ?’

रामानन्‍द जी ने कहा- ‘प्रभो ! मैं समझता हूँ, प्रेमपूर्वक भक्ति करने से ही इष्‍टसिद्धि हो सकती है। भगवान प्रेममय हैं, प्रेम ही उनका स्‍वरूप है, वे रसराज हैं, इसलिये जैसे भी हो सके उस रसार्णव में घुसकर खूब गोते लगाना चाहिये क्‍योंकि- 

कृष्‍णभक्तिरसभाविता: मति:
क्रीयतां यदि कुतोऽपि लभ्‍यते।
तत्र लौल्‍यमपि मूल्‍यकेवलं 
जन्‍मकोटिसुकृतैर्न लभ्‍यते।
अर्थात- 
‘मनुष्‍य को श्रीकृष्‍ण-भक्ति रस से भावित मति जैसे भी प्राप्‍त हो सके ही प्राप्‍त करनी चाहिये। उसे प्राप्‍त करने का मूल्‍य क्‍या है? उसके प्रति लोलुपता, लोभी भाव, सदा हृदय में उसी की इच्‍छा बनी रहना, उसे मनुष्‍य कोटि जन्‍म के सुकृत से भी प्राप्‍त नहीं कर सकता।’
महाप्रभु ने कहा- ‘धन्‍य हैं, सच्‍ची बात तो यह है कि ‘रसो वै स:। रसं ह्येवायं लब्‍ध्‍वानन्‍दी भवति’ (तेत्ति. उ.) अर्थात वे भगवान स्‍वयं रसस्‍वरुप हैं।
क्रमशः

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