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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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उस रस को प्राप्‍त करके जीव आनन्‍दमय हो जाता है। किन्‍तु एक बात अभी शेष रह गयी। उस रस का आस्‍वादन किसी न किसी प्रकार के सम्‍बन्‍ध से ही किया जा सकता है, इसलिये भगवान के साथ किस सम्‍बन्‍ध से उस रस का आस्‍वादन किया जाय, इसे जानने की मेरी बड़ी इच्‍छा है, कृपा करके इसे और बताइये? यह सुनकर राय महाशय कहने लगे- ‘प्रभो ! मैं समझता हूँ भगवान के प्रति दास्‍यभाव रखना ही सर्वश्रेष्‍ठ सम्‍बन्‍ध है, क्‍योंकि बिना दास्‍यभाव अवश्‍य रहता है। वह अत्‍यन्‍त पीड़ा के समय में व्‍यक्‍त भी हो जाता है।

नन्‍द जी का भगवान के प्रति वात्‍सल्‍य-स्‍नेह था; किन्‍तु मथुरा से जाकर जब भगवान का सन्‍देश उद्धव जी ने नन्‍दबाबा आदि गोपों को सुनाया और कुछ दिन वज्र में रहकर जब वे लौटने लगे, तब अत्‍यन्‍त ही कातर-भाव से दु:खी होकर नन्‍दबाबा ने कहा था- ‘मनसो वृत्तयो न: स्‍यु: कृष्‍णपादाम्‍बुजाश्रया:’ अर्थात हे उद्धव ! हमारे मन की वृत्ति सदा श्रीकृष्‍ण के चरणों का आश्रय करने वाली हो। पुत्र की तरह स्‍नेह करने वाले पिता का दास्‍यभाव घोर दु:ख के समय अपने-आप ही उमड़ पड़ा। इसी प्रकार जब ब्रह्मा जी गौओं के बछड़ों को चुरा ले गये और भगवान ने वैसे ही बछड़े बनाकर वज्र में रख दिये और सालभर के पश्‍चात जब उन बछड़ों को ब्रह्मा जी ने छोड़ा तब बलराम जी को पता चला और छोटे भाई के प्रति विस्‍मय के कारण उनका दास्‍यभाव व्‍यक्‍त हो उठा। वे भगवान की महिमा को स्‍मरण करके कहने लगे-

प्रायो मायास्‍तु मे भर्तुर्नान्‍या मेऽपि विमोहिनी।
अर्थात-
 यह सब मेरे प्रभु की लीला है।राधिका जी का भगवान के प्रति कान्‍ताभाव था। वे स्‍वाधीनपति का थीं, किन्‍तु जब रास में सहसा भगवान अन्‍तर्धान हो गये तो उनका दास्‍यभाव प्रस्‍फुटित हो उठा और वे रोती हुई कहने लगीं- ‘दास्‍यास्‍ते कृपणाया मे सखे! दर्शय सन्निधिम्’ अर्थात ‘हे सखे ! तुम हमें अपने दर्शन दो। हम तुम्‍हारी दासी हैं।’ भला जो दिन-रात्रि प्‍यारे से मान ही करती रहें, उनके मुख से ऐसे दास्‍यभाव के वचन शोभा देते हैं? किन्‍तु करें क्‍या, दास्‍यभाव तो स्‍नेह का स्‍वामी है। इसलिये प्रभो ! दास्‍यभाव को मैं सर्वश्रेष्‍ठ समझता हूँ।

प्रभु ने हँसकर कहा- ‘हाँ, ठीक है, होगा, मैं इसी अस्‍वीकार नहीं करता, किन्‍तु फिर भी दास्‍यभाव में कुछ संकोच अवश्‍य रहता है। सेवक को अपने स्‍वामी के ऐश्‍वर्य, बड़प्‍पन और मान-सम्‍मान का सदा ध्‍यान रहता है। इसलिये निर्भय होकर आनन्‍द-रस का पान करने में संकोच होता है, ऐसा कोई सम्‍बन्‍ध बताइये जिसमें संकोच का लेश भी न हो।’
तब तो अत्‍यन्‍त ही उल्‍लास के साथ रामानन्‍द राय ने कहा- ‘तब तो प्रभो ! मैं सख्‍य-सम्‍बन्‍ध को सर्वश्रेष्‍ठ समझता हूँ। सख्‍य-प्रेम में ऐश्‍वर्य, धन, मान, सम्‍मान किसी की भी परवा नहीं रहती। ग्‍वाल-बाल भगवान से नाराज होते थे, उनसे गौओं को घिरवाकर लाते थे। उनके कंधे पर चढ़कर चड्डी लेते थे। उन्‍हें अखिल विश्‍व के एकमात्र आधार भगवान वासुदेव से किसी प्रकार का संकोच नहीं था। यथार्थ रसास्‍वाद तो सख्‍यप्रेम में ही होता है।’
महाप्रभु ने कहा- ‘सख्‍य प्रेम का क्‍या कहना है? सख्‍य प्रेम ही तो यथार्थ में प्रेम है। किन्‍तु सख्‍य प्रेम सबको प्राप्‍त नहीं होता। उसमें दूसरे के प्रेम की अपेक्षा रहती है, यदि अज्ञानवश भ्रम हो जाय कि हमारा प्रेमी हमसे उतना प्रेम नहीं करता, जितना हम उससे करते हैं तब स्‍वाभाविक ही हमारे प्रेम में कुछ न्‍यूनता आ जायगी। इसलिये प्रेम का ऐसा कोई सम्‍बन्‍ध बतलाइये जो निरपेक्ष और हर हालत में एकरस बना रहे।’

इस पर जल्‍दी से रामानन्‍द जी ने कहा- ‘प्रभो ! यह बात तो वात्‍सल्‍य-प्रेम में नहीं है। ‘कुपुत्रो जायेत क्‍वचिदपि कुमाता न भवति’ सन्‍तान चाहे प्रेम करे या न करे, माता-पिता का प्रेम उस पर वैसा ही बना रहता है। इसीलिये तो भगवान व्‍यासदेवजी ने कहा है- 

नेमं विरिञ्चो न भवो न श्रीरप्‍यगंसंश्रया।
प्रसादं लेभिरे गोपी यत्तत् प्राप विमुक्तिदात।
अर्थात-
‘प्रेमदाता श्रीहरि की जैसी कृपा यशोदा जी पर हुई थी, वैसी कृपा ब्रह्मा, शिव की तो बात ही क्‍या, भगवान के सदा हृदय में निवास करने वाली लक्ष्‍मी पर भी नहीं हुई।’ इसलिये वात्‍सल्‍यभाव ही सर्वोत्तम ठहरता है।

प्रभु ने अत्‍यन्‍त ही प्रसन्‍नता प्रकट करते हुए कहा- ‘राय महाशय ! आप तो रसराज हैं, आपसे कोई बात अविदित नहीं है, वात्‍सल्‍य-रस की तो भगवान व्‍यास देव ने भूरि-भूरि प्रशंसा की है। फिर भी वात्‍सल्‍य-रस में मुझे पूर्ण निर्भयता प्रतीत नहीं होती। उसमें छोटे और बड़ेपन का कुछ अंशों में तो भाव रहता ही है। इससे आगे भी आप कोई ऐसा भाव बता सकें जिसमें इन विचारों का अत्‍यन्‍ताभाव हो, तो उसे मुझसे कहिये?’
राय महाशय ने कहा- ‘प्रभो ! इससे आगे और क्‍या कहूँ, वह तो कहने का विषय नहीं। सचमुच में एक ही भाव अवशेष है और उसे ही अन्तिम कहा जा सकता है- वह है ‘कान्‍ताभाव’। बस, इसी में जाकर सभी रसों की, सभी भावों का और सभी सम्‍बन्‍धों की परिसमाप्ति हो जाती।’
राय रामानन्‍द के मुख से इस बात को सुनकर प्रभु ने उनका गाढ़ालिंगन किया और प्रेम में विह्रल होकर गदगद कण्‍ठ से कहने लगे- ‘राय महाशय ! आप धन्‍य हैं, आपका कुल धन्‍य है, आपकी ही जननी वास्‍तव में जननी कही जा सकती हैं, आपका शास्‍त्रीय ज्ञान सार्थक है। इतने बड़े रहस्‍य-ज्ञान को मुझे बताकर आपने मेरा उद्धार कर दिया, किन्‍तु इससे भी ऊँचा कोई भाव जानते हो तो कहिये?’
महाप्रभु के इससे भी आगे पूछने पर राय चकित होकर प्रभु की ओर देखने लगे और बहुत देर के अनन्‍तर धीरे-धीरे कहने लगे- ‘प्रभो ! इससे आगे मैं और कुछ नहीं जानता।’
प्रभु ने मधुर स्‍वर में कहा- ‘राय महाशय ! आपसे कोई बात छिपी नहीं है। आप मुझे शुष्‍कहृदय, गृहत्‍यागी वनवासी संन्‍यासी समझकर भुलावा देना चाहते हैं। अन्तिम साध्‍यतत्त्व का अनधिकारी समझकर आप मेरी उपेक्षा कर रहे हैं। आप तो सब कुछ जानते हैं। कान्‍ता-स्‍नेह से भी बढ़कर जो कुछ हो उसे कृपया बता दीजिये।’ 
राय ने प्रभु के पादपद्मों को पकड़े हुए कहा-

अनयाऽऽराधितो नूनं भगवान हरिरीश्‍वर:।
यन्‍नो विहाय गोविन्‍द: प्रीतो यामनयदरह:।

‘बस, प्रभो ! इससे आगे स्‍पष्‍ट नहीं कह सकता। क्‍योंकि यह विषय अत्‍यन्‍त ही गोप्‍य है। भगवान व्‍यासदेव ने भी इसे परम गुह्य समझकर अप्रकट ही रखा है।
क्रमशः

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