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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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केवल संकेत से बहुत ही थोड़ा-सा लक्ष्य किया है- बस, इससे आगे मैं और कुछ न कह सकूँगा।’
इतना सुनते ही प्रभु एकदम उठकर खडे़ हो गये और राय महाशय का गाढ़-आलिंगन करते हुए कहा- ‘धन्य है, धन्य है। आपने तो प्रेम की पराकाष्ठा ही कर डाली। आपने तो साध्यतत्त्व को परिसीमा पर पहुँचा दिया। भला, श्रीराधिका जी के प्रेम की प्रशंसा कर ही कौन सकता है? उनका ही प्रेम तो सर्वश्रेष्ठ है। अब आप मुझे उन दोनों के विलास की पूर्ण महिमा सुनाइये।’
इतना सुनते ही राय महाशय ने अपने कोकिलकूजित कमनीय कण्ठ से इस श्लोक को बड़े ही लय के साथ पढ़ने लगे-
वाचा सूचितशर्वरीरतिकलाप्रागल्भया राधिकां
व्रीडाकुञ्चितलोचनां विरचयन्नग्रे सखीनामसौ।
तदवक्षोरुहचित्रकेलिमकरीपाण्डित्यपारगंत:
कैशोरं सफलीकरोति कलयन कुञ्जे विहारं हरि:।
बस, यही रास-विलास पराकाष्ठा है। प्रभु इसको सुनकर बड़े ही प्रसन्न हुए। प्रभु ने राय महाशय का जोर से आलिंगन किया और दोनों प्रेम में प्रमत्त होकर पृथ्वी पर गिर पड़े।
राय रामानन्द से साधन-सम्बन्धी प्रश्न….
दोनों ही पागल हों, दोनों की दृष्टि में संसारी पदार्थ निस्सार हों, दोनों ही किसी एक ही मार्ग के पथिक हों और फिर उन दोनों का एकान्त में समागम हो, तो फिर उस आनन्द का तो कहना ही क्या? उसे ही अनिर्वचनीय आनन्द कहते हैं। उस आनन्द-रस का आस्वादन करना सब किसी के भाग्य में नहीं बदा है, जिसके ऊपर उनकी कृपा हो वही इस आनन्द का अधिकारी हो सकता है। राय रामानन्द जी के मुख से परम साध्यतत्त्व की बात सुनकर कहने लगा- ‘राय महाशय ! आपकी असीम अनुकम्पा से मैंने परम साध्यतत्त्व जान लिया। अब यह बताइये कि उसकी उपलब्धि कैसे हो? बिना साधन जाने हुए साध्य का ज्ञान व्यर्थ है, इसलिये जिस प्रकार इस महाभाव की प्राप्ति हो सके कृपा करके उस उपाय को और बताइये ?’ राय महाशय ने अत्यन्त ही अधीरता के साथ कहा- ‘प्रभो ! आप सर्वसमर्थ हैं। मैं संसारी पंक में फंसा हुआ विषयी जीव भला साध्य-साधन-तत्त्व को समझ ही क्या सकता हूँ? किन्तु आप अपने भावों को मेरे ही द्वारा प्रकट कराना चाहते हैं, तो आपकी इच्छा के विरुद्ध कर ही कौन सकता है। इसलिये आप मेरे हृदय में जो प्ररेणा करते जायंगे मैं वही कहता जाऊँगा।’
प्रभो ! श्रीराधिका जी का प्रेम सामान्य नहीं है। संसारी सुखों में आनन्द का अनुभव करने वाले पुरुष तो इसके श्रवण के भी अधिकारी नहीं हैं, इसलिये इसे परम गोप्य कहा गया है। इसे तो व्रज की गोपिकाएँ ही जान सकती हैं। गोपिकाएँ के अतिरिक्त किसी दूसरे का रस में प्रवेश नहीं। गोपिकाएँ इन्द्रिय-सुख की अभिलाषिणी नहीं, उन्हें तो श्रीराधिका के साथ कुंज में केलि करते हुए श्रीकृष्ण की वह कमनीय प्रेमलीला ही अत्यन्त प्रिय है। अपने लिये वे कुछ नहीं चाहती, उनकी सम्पूर्ण इच्छाएँ, सम्पूर्ण भावनाएँ, सम्पूर्ण चेष्टाएँ और मन, वाणी तथा इन्द्रियों की सम्पूर्ण क्रियाएं उन प्यारी-प्यारे के विहार के ही निमित्त होती हैं। जो उस अनिर्वचनीय रस का आस्वादन करना चाहते हैं, उन्हें अपनी सम्पूर्ण भावनाएं इसी प्रकार त्यागमय और नि:स्वार्थ बना लेनी चाहिये। गोपीभाव को धारण किये बिना कोई उस आनन्दामृत का पान ही नहीं कर सकता। गोपियों के प्रेम में सांसारिकता नहीं है। वह विशुद्ध है, निर्मल है, वासनारहित और इच्छारहित है। गोपियों के विशुद्ध प्रेम का ही नाम ‘काम’ है। इस संसारी ‘काम’ को ‘काम’ नहीं कहते। उस दिव्य प्रेमभाव का ही नाम यथार्थ में काम है, जिसकी इच्छा उद्धव आदि भक्तगण भी निरन्तर रुप से किया करते हैं।’
राय रामानन्द से साधन-सम्बन्धी प्रश्न…
कोई चाहे कि जप से, तप से वेदाभ्यास अथवा यज्ञ-यागद्वारा हम उस रससागर में प्रविष्ट होने के अधिकारी बन जायँगे तो यह उनकी भूल है। उस अमृतरुपी महासागर के समीप पहुँचने के लिये तो भक्ति ही एकमात्र साधन हैं, जैसा कि भगवान व्यासदेव ने कहा है-
नायं सुखापो भगवान देहिनां गोपिकासुत:।
ज्ञानिनां चात्मभूतानां यथा भक्तिमतामिह।।
अर्थात ‘नन्दनन्दन’ भगवान वासुदेव जिस प्रकार भक्त को भक्ति से सहज में प्राप्त हो सकते हैं, उस प्रकार देहाभिमानी, कर्मकाण्डी तथा ज्ञानाभिमानी पुरुष को प्राप्त नहीं हो सकते।’ इसीलिये तो गोपियों के प्रेम को सर्वोत्तम कहा-
यदपि जसोदा नन्द अरु ग्वालबाल सब धन्य।
पैं या रसकूँ चाखि के गोपी भईं अनन्य।।
गोपियों के प्रेम की बराबरी कौन कर सकता है। राम-बिलास के समय जिनके भुजदण्डों का आश्रय ग्रहण करके जो गोपिकाएँ धन्य बन चुकी हैं, उनकी पदधूलि के बिना कोई प्रेम का अधिकारी बन ही नहीं सकता।
प्रभु ने राय महाशय की भूरि-भूरि प्रशंसा की। इसी प्रकार रातभर दोनों में बातें होती रहीं। रोज प्रात:काल रात्रि समझकर चकवा-चकवी की भाँति ही पृथक हो जाते थे और रात्रि को दिन मानकर दोनों ही उस प्रेम-सरोवर के समीप एकत्रित हो जाते थे। इस प्रकार कई दिनों तक सत्संग और साध्य साधन निर्णय होता रहा। एक दिन प्रभु ने राय महाशय से कुछ अत्यन्त ही रहस्यमय गूढ़ प्रश्न पूछे, जिनका उत्तर राय ने भगवत-प्ररेणा से जैसा मन में उठा वैसा याथातथ्य दिया। प्रभु ने पूछा- ‘राय महाशय ! मुझे सम्पूर्ण विद्याओं में श्रेष्ठ पराविद्या बताइये, जिससे बढ़कर दूसरी कोई विद्या ही न हो।’
राय ने कुछ लज्जितभाव से कहा- ‘प्रभो ! मैं क्या बताऊँ, श्रीकृष्ण-भक्ति के अतिरिक्त और सर्वोत्तम विद्या हो ही कौन सकती है? उसी के लिये परिश्रम करना सार्थक है, शेष सभी व्यर्थ है।’
श्रीकृष्णेति रसायनं रसपरं शून्यै: किमन्ये: श्रमै:’
प्रभु ने पूछा- ‘सर्वश्रेष्ठ कीर्ति कौन सी कही जा सकती है?’ राय ने कहा- ‘प्रभो ! श्रीकृष्ण के सम्बन्ध से लोगों में परिचय होना यही सर्वोत्तम कीर्ति है।’
प्रभु ने पूछा- ‘अच्छा, ऐसी सर्वश्रेष्ठ सम्पत्ति कौन-सी है जिसके सामने सभी सम्पत्तियाँ तुच्छ समझी जा सकें?’
राय ने उत्तर दिया- ‘श्रीनिकुंजविहारी राधावल्लभ की अविरल भक्ति जिसके हृदय में विद्यमान है वही सर्वश्रेष्ठ सम्पत्तिशाली पुरुष है। उसकी समता का पुरुष त्रिभुवन में कोई नहीं हो सकता।’
प्रभु ने पूछा- ‘मुझे यह बताइये कि सबसे बड़ा दु:ख कौन सा है?’
रुँधे हुए कण्ठ से अश्रुविमोचन करते हुए राय महाशय ने कहा- ‘प्रभो ! जिस क्षण श्रीहरि का हृदय में स्मरण न रहे, जिस समय विषय भोगों की बातें सूझने लगें, वही सबसे बड़ा दु:ख है। इसके अतिरिक्त भगवदभक्तों से वियोग होना भी एक दारुण दु:ख है।’
प्रभु ने कहा- ‘आप मुक्त जीवों में सर्वश्रेष्ठ किसे समझते हैं?’
क्रमशः
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