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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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राय ने कहा- ‘प्रभो ! जिसकी सम्पूर्ण चेष्टाएँ श्रीकृष्ण की प्रेमप्राप्ति के ही निमित्त हों, जो सतत श्रीकृष्ण के ही मधुर नामों का उच्चारण करता हुआ उन्हें ही पाने का प्रयत्न करता रहता है, वही सर्वश्रेष्ठ मुक्त पुरुष है।’
प्रभु ने पूछा- ‘आप किस गान को सर्वश्रेष्ठ गान समझते हैं?’
राय ने कहा-
‘श्रीकृष्ण! गोविन्द! हरे! मुरारे!
हे नाथ! नारायण! वासुदेव!’
‘इस सुमधुर नामों के गान को ही मैं सर्वश्रेष्ठ गायन समझता हूँ।’
प्रभु ने पूछा- ‘आप जीवों के कल्याण के निमित्त सर्वश्रेष्ठ कार्य किसे समझते हैं ?’
राय ने कहा- ‘प्रभो ! महत्पुरुषों के पादपद्मों की पावन पराग से अपने मस्तक को अलंकृत बनाये रहना और उनके मुख नि:सृत अमृत वचनों का कर्णरन्ध्रों से निरन्तर पान करते रहना-इसे ही मैं जीवों के कल्याण का मुख्य हेतु समझता हूँ।’
प्रभु ने पूछा- ‘प्राणिमात्र के लिये सर्वश्रेष्ठ स्मरणीय क्या वस्तु है ?’ राय ने कहा-
‘श्रीकृष्ण!’ गोविन्द! हरे! मुरारे!
हे नाथ! नारायण! वासुदेव!’
‘बस यही सर्वश्रेष्ठ स्मरणीय है।’
प्रभु ने पूछा- ‘आप ध्यान में सर्वश्रेष्ठ ध्यान किसे समझते हैं ?’
राय ने कहा- ‘श्रीवृन्दावनविहारी की बांकी झांकी का ही निरन्तर ध्यान बना रहे: बस यही सर्वश्रेष्ठ ध्यान है।’
प्रभु ने पूछा- ‘आप जीवों के लिये ऐसा सर्वोत्तम निवास स्थान कौन सा समझते हैं, जहाँ सर्वस्व के मुख में धूलि देकर निवास किया जाय?’
राय ने कहा- ‘प्रभो !
‘सरबसु के मुख धरि दै सरबसु कै व्रज-धूरि’
बस, सब कुछ छोड़कर वृन्दावन वास करना ही जीव का अन्तिम निवास स्थान है। वृन्दावन को परित्याग करके एक पैर भी कहीं अन्यत्र न जाना चाहिये’-
‘वृन्दावनं परित्यज्य पादमेकं न गच्छति।’
-बस राधा-मुरलीधर का ध्यान करते रहना चाहिये और वृन्दावन को न छोड़ना चाहिये-
‘श्रीराधामुरलीधरौ भज सखे ! वृन्दावनं मा त्यज।’
प्रभु ने पूछा- ‘आप श्रवणों में सर्वश्रेष्ठ श्रवणीय क्या समझते हैं?’
राय ने कहा-
‘श्रीकृष्ण! गोविन्द! हरे! मुरारे!
हे नाथ! नारायण! वासुदेव!’
‘यह सम्पूर्ण श्रवणों का सार है। जिसने इसे यथावत रीति से सुन लिया फिर उसके लिये कुछ श्रवण करना शेष नहीं रह जाता।’
प्रभु ने पूछा- ‘आप उपासनाओं में सर्वश्रेष्ठ उपासना किसे समझते हैं?’
राय ने कहा- ‘युगल सरकार के सिवा और उपासना की ही किसकी जा सकती है। असल में तो वृन्दावन विहारी ही परम उपास्य हैं। शक्ति से वे पृथक हो ही नहीं सकते।’
प्रभु ने पूछा- ‘आप भक्ति और मुक्ति में किसे अधिक पसन्द करते हैं?’
राय ने कहा- ‘प्रभो ! मुक्ति के नीरस फल को तो कोई विचारप्रधान दार्शनिक पुरुष ही पसन्द करेगा। मुझे तो प्रभु के पादपपद्मों में निरन्तर लोट लगाते रहना ही सबसे अधिक पसन्द है। मैं अमृत के सागर में जाकर अमृत बनना नही चाहता। मैं तो उसके समीप बैठकर उसकी मधुरिमा के रसास्वादन करने को ही सर्वश्रेष्ठ समझता हूँ।’
इस प्रकार के प्रश्नोत्तरों में ही वह रात शेष हो गयी और दोनों फिर एक-दूसरे से पृथक हो गये।राय महाशय का अनुराग प्रभु के पादपपद्मों में उत्तरोत्तर बढ़ता ही जाता था, वे उनमें साक्षात श्रीकृष्ण के रुप का अनुभव करने लगे। उनके नेत्रों के सामने से प्रभु का वह प्राकृत रुप एकदम ओझल हो गया और वे अपने इष्टदेव श्रीराधा-कृष्ण के स्वरूप का दर्शन करने लगे। इसीलिये उन्होंने एक दिन प्रभु से पूछा- ‘प्रभो ! मैं आपके श्रीविग्रह में अपने इष्टदेव के दर्शन करता हूँ। मुझे ऐसा भान होने लगा है कि आप साक्षात श्रीमन्नारायण ही हैं। लोगों को भ्रम में डालने के लिये आपने यह छद्म-वेष धारण कर लिया है।’
हंसते हुए प्रभु ने उत्तर दिया- ‘राय महाशय ! आपको भी मेरे शरीर में अपने इष्टदेव के दर्शन न होंगे तो और किसे होंगे? आपकी दृष्टि में तो जितने संसार के दृश्य पदार्थ हैं सब के सब इष्टमय यही होने चाहिये।
श्रीमदभागवत में लिखा है कि ‘सर्वश्रेष्ठ भगवद्भक्त सम्पूर्ण चराचर प्राणियों मे भगवान के ही दर्शन करता है, उसकी दृष्टि में भगवान से पृथक कोई वस्तु है ही नहीं।’ आप सर्वश्रेष्ठ भागवतोत्तम हैं, फिर आपको मेरे शरीर में अपने इष्टदेव के दर्शन होते हैं, तो इसमे आश्चर्य की कौन-सी बात है?
प्रभु के ऐसे उत्तर को सुनकर राय कहने लगे- ‘प्रभो ! आप मेरी प्रवंचना न कीजिये। मुझे अपने यथार्थ रुप के दर्शन दीजिये। मुझे शुद्राधम समझकर अपने यथार्थ स्वरूप से वंचित न कीजिये।’ यह कहते-कहते राय महाशय प्रेम के आवेश में आकर मूर्च्छित होकर प्रभु के पैरों में गिर पड़े। उसी समय उन्हें प्रभु के शरीर में श्रीराधा और श्रीकृष्ण के सम्मिलित दर्शन हुए। प्रभु के शरीर में उस अदभुत रुप के दर्शन करके राय महाशय ने अपने को कृतकृत्य समझा और वे अपने भाग्य की भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे।
सावधान होने पर प्रभु ने राय रामानन्द जी का दृढ़ आलिंगन किया और उनसे कहने लगे- ‘राय महाशय ! मेरे ये दस दिन आपके साथ श्रीकृष्ण-कथा सुनते सुनते बहुत ही आनन्दपूर्वक व्यतीत हुए। इतना अपूर्व रस पहले मुझे कभी प्राप्त नहीं हुआ था। आपकी कृपा से इस अत्यन्त ही दुर्लभ प्रेमरस का मैं यह किंचित रसास्वादन कर सका। अब मेरी इच्छा है कि आप शीघ्र ही इस राज-काज को छोड़कर पुरी आ जाइये। वहाँ हम दोनों साथ रहकर निरन्तर इस आनन्दरस का पान करते रहेंगे, आपकी संगति से मेरा भी कल्याण हो जायगा।’
हाथ जोड़े हुए अनन्त ही विनीतभाव से राय रामानन्द ने कहा- ‘प्रभो ! यह तो सब आपके ही हाथ में है। जब इस भव-जंजाल से छुड़ाकर अपने चरणों की शरण प्रदान करेंगे, तभी चरणों के समीप रहने का सुयोग प्राप्त हो सकेगा। मेरे सामर्थ्य के बाहर की बात है। आप ही अनुग्रह करके मुझे ऐसा धन्य-जीवन दान कर सकते हैं।’ प्रभु ने कहा- ‘अच्छा, अब जाइये। दक्षिण से लौटकर एक बार मैं आपसे मिलूँगा। तभी आप मेरे साथ पुरी चलियेगा।’ प्रभु की आज्ञा शिरोधार्य करके राय रामानन्द जी अपने स्थान की ओर चले गये और प्रभु ने तो प्रात:काल आगे की यात्रा का विचार किया।
दक्षिण के तीर्थों का भ्रमण…..
महापुरुषों का तीर्थ भ्रमण लोक कल्याण के ही निमित्त होता है। उनके लिये स्वयं कोई कर्तव्य नहीं होता, किन्तु फिर भी लोकशिक्षण के लिये, गृहस्थियों को पावन बनाने के लिये, भक्तों को कृतार्थ करने के लिये, तीर्थों को निष्पाप बनाने के लिये तथा पृथ्वी को पवित्र करने के लिये वे नाना तीर्थों में भ्रमण करते हुए देखे गये हैं।
क्रमशः
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