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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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इसी से अब तक ये तीर्थ पावनता की रक्षा करते हुए संसारी लोगों के पाप तापों को शमन करने में समर्थ बने हुए हैं।
महाप्रभु प्रात:काल गोदावरी में स्‍नान करके विद्यानगर से आगे के लिये चल दिये। वे गौतमी, गंगा, मल्लिकार्जुन, अहोबलनृसिंह, सिद्धवट, स्‍कन्‍धक्षेत्र, त्रिपठ, वृद्धकाशी, बौद्धस्‍थान, त्रिपती, त्रिमल्‍ल, पानानृसिंह, शिवकांची, विष्‍णुकांची, त्रिकालहस्‍ती, वृद्धकोल, शियालीभैरवी, काबेरीतीर, कुम्‍भकर्ण-कपाल आदि पुण्‍य तीर्थों में दर्शन स्‍नान आदि करते हुए और अपने दर्शनों से नर नारियों को कृतार्थ करते हुए श्रीरंग क्षेत्र पर्यन्‍त पहुँचे। रास्‍ते में महाप्रभु सर्वत्र श्रीहरि नामों का प्रचार करते जाते थे। लाखों मनुष्‍य प्रभु के दर्शनमात्र से ही भगवद्भक्‍त बन गये। प्रभु रास्‍ते में चलते-चलते इस मन्‍त्र का उच्‍चारण करते जाते थे।महाप्रभु सायंकाल के समय जंगलों में घूमने जाया करते थे। एक दिन वे एक बगीचे में गये। वहाँ जाकर उन्‍होंने देखा एक ब्राह्मण आसन लगाये बड़े ही प्रेम के साथ गदगद कण्‍ठ से गीता का पाठ कर रहा है। यद्यपि वह श्‍लोकों का उच्‍चारण अशुद्ध कर रहा था, किन्‍तु पाठ करते समय वह ध्‍यान में ऐसा तन्‍मय था कि उसे ब्राह्य संसार का पता ही नहीं रहा। वह भाव में मग्‍न होकर श्‍लोकों को बोलता था उसका सम्‍पूर्ण शरीर रोमांचित हो रहा था, नेत्रों से जल बह रहा था। महाप्रभु बहुत देर तक खड़े खड़े उसका पाठ सुनते रहे। जब वह पाठ करके उठा, तब महाप्रभु ने उससे अत्‍यन्‍त ही स्‍नेह के साथ पूछा- ‘क्‍यों भाई, तुम्‍हें इस पाठ में ऐसा क्‍या आनन्‍द मिलता है, जिसके कारण तुम्‍हारी ऐसी अदभुत दशा हो जाती है! इतने ऊंचे प्रेम के भाव तो अच्‍छे-अच्‍छे भक्‍तों के शरीर में प्रकट नहीं होते, तुम अपनी प्रसन्‍नता का मुझसे ठीक-ठीक कारण बताओ?’

उस पुरुष ने कहा- ‘भगवन ! मैं एक अपठित बुद्धिहीन ब्राह्मण-वंश में उत्‍पन्‍न हुआ निरक्षर और मूर्ख ब्राह्मण बन्‍धु हूँ। शुद्धाशुद्ध का कुछ भी बोध नहीं है। मेरे गुरुदेव ने मुझे आदेश दिया था कि तू गीता का नित्‍यप्रति पाठ किया कर। भगवन ! मैं गीता का अर्थ क्‍या जानूँ। मैं तो पाठ करते समय इसी बात का ध्‍यान करता हूँ कि सफेद रंग के चार घोड़ों से जुता हुआ एक बहुत सुन्‍दर रथ खड़ा हुआ है। उसकी विशाल ध्‍वजा पर हनुमान जी विराजमान हैं, खुले हुए रथ में अस्‍त्र-शास्त्रों से सुसज्जित अर्जुन कुछ शोक के भाव से धनुष को नीचे रखे बैठा है। भगवान अच्युत सारथी के स्थान पर बैठे हुए मंद मुस्कान के साथ अर्जुन को गीता का उपदेश कर रहे हैं। बस, भगवान की इसी रुपमाधुरी का पान करते करते मैं अपने आपे को भूल जाता हूँ। भगवान की वह त्रिलोकपावनी मूर्ति मेरे नेत्रों के सामने नृत्‍य करने लगती है, उसी के दर्शनों से मैं पागल-सा बन जाता हूँ। लोग मेरे पाठ को सुनकर पहले बहुत हंसते थे। बहुत से तो मुझे बुरा-भला भी कहते थे। अब कहते हैं या नहीं-इस बात का तो मुझे पता नहीं है, किन्‍तु मैंने किसी की हंसी की कुछ परवा नहीं की। मैं इसी भाव से पाठ करता ही रहा। अब मुझे इस पाठ में इतना रस आने लगा है कि मैं एकदम संसार को भूल-सा जाता हूँ। आज ही आकर आपने मुझसे दो मीठी बातें की हैं, नहीं तो लोग सदा मेरी हंसी ही उड़ाते रहते हैं। मालूम पड़ता है, आप साक्षात श्रीनारायण हैं, जो मेरे पाठ का फल देने के लिये यहाँ पधारे हैं। आप चाहे कोई भी क्‍यों न हों, हैं तो कोई अलौकिक दिव्‍य पुरुष। आपके चरणकमलों में मेरा कोटि-कोटि प्रणाम है।’ इतना कहकर वह प्रभु के चरणों में गिर पड़ा।
प्रभु ने उसे बड़े स्‍नेह से उठाकर छाती से लगाया और बड़े ही मीठे स्‍वर से कहने लगे, ‘विप्रवर! तुम धन्‍य हो, यथार्थ में गीता का असली अर्थ तो तुमने ही समझा है। भगवान शुद्ध अथवा अशुद्ध पाठ से प्रसन्‍न या असन्‍तुष्‍ट नहीं होते। वे तो भाव के भूखे हैं। भावग्राही भगवान से किसी के घटकी बात छिपी नहीं है। लाखों शुद्ध पाठ करो और भाव अशुद्ध हैं, तो उनका फल अशुद्ध ही होगा। यदि भाव शुद्ध हैं और अक्षर चाहे अशुद्ध भी उच्‍चारण हो जायँ तो उसका फल शुद्ध ही होगा। भावों को शुद्धि की ही अत्‍यन्‍त आवश्‍यकता है। भाव शुद्ध होने पर पाठ शुद्ध हो तब तो बहुत ही अच्‍छा है। सोने में सुगन्‍ध है और यदि पाठ शुद्ध न भी हो तो भी कोई हानि नहीं। जैसा कि कहा है-

मूर्खो वदति विष्‍णाय धीरो वदति विष्‍णवे।
तयो: फलं तु तुल्‍यं हि भावग्राही जनार्दन:।।

अर्थात ‘मुर्ख कहता है ‘विष्‍णाय नम’ और पण्डित कहता है ‘विष्‍णवे नम:’ भाव शुद्ध होने से इन दोनों का फल समान ही होगा। कारण कि भगवान जनार्दन भावग्राही हैं।’ 
महाप्रभु के मुख से इस बात को सुनकर उस ब्राह्मण को बड़ी प्रसन्‍नता हुई और उसने उसी समय प्रभु को आत्‍मसमर्पण कर दिया। जब तक प्रभु श्रीरंगक्षेत्र में रहे, तब तक वह महाप्रभु के साथ ही रहा।

धनी तीर्थराम को प्रेम और वेश्याओं का उद्धार…….

जिसने प्रेमासव का पान कर लिया है, जो उसकी मस्‍ती में संसार के सभी पदार्थों को भूला हुआ है, उसके सामने ये संसार के सभी सुन्‍दर, सुखद और चमकीले पदार्थ तुच्‍छ हैं। वह उन पदार्थों की ओर दृष्टि तक नहीं डालता, जिनके लिये विषयी मनुष्‍य अपना सर्वस्‍व अर्पण करने के लिये तत्‍पर रहते हैं। जिस हृदय में कामारि के भी पूजनीय प्रभु निवास करते हैं, उस हृदय में काम के लिये स्‍थान कहाँ? क्‍या रवि और रजनी एक स्‍थान पर रह सकते हैं? दीपक लेकर यदि आप अन्‍धकार को खोजने चलें तो उसका पता कहीं मिल सकता है? इसीलिये कहा है- ‘जहाँ काम है, वहाँ राम नहीं। और जहाँ राम हैं, वहाँ काम नहीं।’

जो जाड़े से ठिठुरा हो उसके सम्‍मुख उसकी इच्‍छा विरुद्ध भी धधकती हुई अग्नि पहुँच जाय तो उद्योग न करने पर भी उसका जाड़ा छूट जायगा। सांभर की झील में कंकड़ी, पत्‍थर, हड्डी जो भी वस्‍तु गिर जायगी, वह नमक बन जायगी। प्रेमी से चाहे प्रेम से सम्‍बन्‍ध करो या ईर्ष्‍या-द्वेष से, कल्‍याण आपका अवश्‍य ही होगा। भूल से भी लोहा पारस से छुआ दिया जाय तो उसके सुवर्ण होने में कोई सन्‍देह नहीं।
क्रमशः

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