cc 225
श्री श्री चैतन्य चरितावली
225-
तीर्थराम इन बातों को सुन रहा था। प्रभु के संकीर्तन के श्रवणमात्र से ही उसका धैर्य टूट गया था। अब रहा सहा धैर्य इस असम्भव घटना ने तोड़ दिया। परमसुन्दरी दो युवती एकान्त में जिससे प्रेमालाप करने की प्रार्थना करने की प्रार्थना करें और वह उन्हें माता कहकर सम्बोधन करे, वह कोई मनुष्य नहीं, ईश्वर है। यह संसारी प्राणी का काम नहीं, ये तो देवताओं के भी देवताओं का काम है। यह सोचते सोचते वह महाप्रभु के पादपद्मों में गिर पड़ा और बड़े ही जोर से चीत्कार मारकर कहने लगा- ‘हा प्रभो ! मुझ पापी का उद्धार करो, प्रभो ! मुझे अपने चरणों में शरण दो।’
महाप्रभु ने उसे उठाकर छाती से लगाया और प्रेम में विह्वल होकर जोर-जोर से नृत्य करते हुए संकीर्तन करने लगे। वे अविरलभाव से प्रेमाश्रु विमोचन करते हुए नृत्य करने लगे। भावावेश में उनके शरीर का वस्त्र जमीन पर गिर पड़ा। इससे उनके दीप्तिमान श्रीअंगों से तेज की किरणें फूट फूटकर उस नीरव स्थान को आलोकित करने लगीं। वे वेश्याएँ भी इस अदभुत चमत्कार को देखकर भावावेश में अपने को भूल गयीं और भगवान के नाम का कीर्तन करती हुई नृत्य करने लगीं!
तीर्थराम ने प्रभु के श्रीचरणों को जोर से पकड़ लिया और बार बार चिल्ला चिल्लाकर वह कहने लगा- ‘प्रभो ! मुझ पापी का भी किसी प्रकार उद्धार हो सकेगा? दयामय ! मेरे पापों का प्रायश्चित्त किसी तरह हो सकता है क्या?’
पतितपावन प्रभु ने उसे उठाकर अपने गले से लगाया और कहा- ‘तीर्थराम ! तुम पापी नहीं, पुण्यात्मा हो, तुम्हारे श्रीअंग के स्पर्श से मैं पावन हुआ। तुम भाग्यवान हो, प्रभु के कृपामात्र हो, अपने मन से ग्लानि निकाल दो। करुणामय श्रीहरि सबका भला करते हैं। जो उनकी शरण में पहुँच जाता है उसके पाप रहते ही नहीं। रूई के ढेर में जैसे अग्नि पड़ने से भस्म हो जाती है उसी प्रकार वे भस्म हो जाते हैं।’ महाप्रभु के इन आदेशमय वाक्यों को सुनकर तीर्थराम को कुछ धैर्य हुआ। उसने अपने को महाप्रभु के श्रीचरणों में सर्वतोभावेन समर्पित कर दिया। महाप्रभु ने उसे हरि-नाम-मन्त्र का उपदेश दिया और वह भी तिलक-कण्ठी धारण करके शुद्ध वैष्णव बन गया। दोनों वेश्याओं ने भी अपने पापों का प्रायश्चित किया और वे निरन्तर हरि-नाम स्मरण करने लगीं। तीर्थराम की स्त्री का नाम कमलकुमारी देवी था, अपने पति की ऐसी दशा देखकर उसे परमानन्द हुआ। वह सती-साध्वी पतिव्रता पत्नी अपने पति चरणों का अनुगमन करने वाली थी। उसने अत्यन्त ही दीन भाव से प्रभु के पादपपद्मों में प्रणाम किया और गदद कण्ठ से प्रार्थना की- प्रभो ! इस पापिनी का उद्धार कीजिये। मुझे भी अपने चरणों की शरण प्रदान कीजिये, जिससे संसार सागर से मैं भी पति के चरणों का अनुगमन कर सकूँ।’
महाप्रभु की आज्ञा से तीर्थराम ने अपनी पत्नी को हरि-नाम मन्त्र का उपदेश दिया। वह भी अपना सारा धन कंगालों को बांटकर तीर्थराम के साथ हरिनाम संकीर्तन करने लगी।
महाप्रभु सात दिन तक बटेश्वर में ठहरे। वहाँ रहकर वे धनीराम को उपदेश देते थे। प्रभु ने उससे कहा- ‘बहुत ग्रन्थों के मायाजाल में मत पड़ना। भगवान केवल विश्वास से ही प्राप्त हो सकते हैं। सम्पूर्ण जगत के वैभव को तृण-समान समझना और निरन्तर भगवन्नाम संकीर्तन में लगे रहना यही वेद शास्त्रों का सार है।’ इस प्रकार तीर्थराम और उन दो सुन्दरी वेश्याओं को प्रेम दान करके महाप्रभु श्रीरंगम में चले गये थे और श्रीरंग में ही चातुर्मास्य किया। जब वर्षा समाप्त हो गयी, तब प्रभु ने श्रीरंगम से आगे चलने का विचार किया।
श्री श्री चैतन्य चरितावली
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तीर्थराम इन बातों को सुन रहा था। प्रभु के संकीर्तन के श्रवणमात्र से ही उसका धैर्य टूट गया था। अब रहा सहा धैर्य इस असम्भव घटना ने तोड़ दिया। परमसुन्दरी दो युवती एकान्त में जिससे प्रेमालाप करने की प्रार्थना करने की प्रार्थना करें और वह उन्हें माता कहकर सम्बोधन करे, वह कोई मनुष्य नहीं, ईश्वर है। यह संसारी प्राणी का काम नहीं, ये तो देवताओं के भी देवताओं का काम है। यह सोचते सोचते वह महाप्रभु के पादपद्मों में गिर पड़ा और बड़े ही जोर से चीत्कार मारकर कहने लगा- ‘हा प्रभो ! मुझ पापी का उद्धार करो, प्रभो ! मुझे अपने चरणों में शरण दो।’
महाप्रभु ने उसे उठाकर छाती से लगाया और प्रेम में विह्वल होकर जोर-जोर से नृत्य करते हुए संकीर्तन करने लगे। वे अविरलभाव से प्रेमाश्रु विमोचन करते हुए नृत्य करने लगे। भावावेश में उनके शरीर का वस्त्र जमीन पर गिर पड़ा। इससे उनके दीप्तिमान श्रीअंगों से तेज की किरणें फूट फूटकर उस नीरव स्थान को आलोकित करने लगीं। वे वेश्याएँ भी इस अदभुत चमत्कार को देखकर भावावेश में अपने को भूल गयीं और भगवान के नाम का कीर्तन करती हुई नृत्य करने लगीं!
तीर्थराम ने प्रभु के श्रीचरणों को जोर से पकड़ लिया और बार बार चिल्ला चिल्लाकर वह कहने लगा- ‘प्रभो ! मुझ पापी का भी किसी प्रकार उद्धार हो सकेगा? दयामय ! मेरे पापों का प्रायश्चित्त किसी तरह हो सकता है क्या?’
पतितपावन प्रभु ने उसे उठाकर अपने गले से लगाया और कहा- ‘तीर्थराम ! तुम पापी नहीं, पुण्यात्मा हो, तुम्हारे श्रीअंग के स्पर्श से मैं पावन हुआ। तुम भाग्यवान हो, प्रभु के कृपामात्र हो, अपने मन से ग्लानि निकाल दो। करुणामय श्रीहरि सबका भला करते हैं। जो उनकी शरण में पहुँच जाता है उसके पाप रहते ही नहीं। रूई के ढेर में जैसे अग्नि पड़ने से भस्म हो जाती है उसी प्रकार वे भस्म हो जाते हैं।’ महाप्रभु के इन आदेशमय वाक्यों को सुनकर तीर्थराम को कुछ धैर्य हुआ। उसने अपने को महाप्रभु के श्रीचरणों में सर्वतोभावेन समर्पित कर दिया। महाप्रभु ने उसे हरि-नाम-मन्त्र का उपदेश दिया और वह भी तिलक-कण्ठी धारण करके शुद्ध वैष्णव बन गया। दोनों वेश्याओं ने भी अपने पापों का प्रायश्चित किया और वे निरन्तर हरि-नाम स्मरण करने लगीं। तीर्थराम की स्त्री का नाम कमलकुमारी देवी था, अपने पति की ऐसी दशा देखकर उसे परमानन्द हुआ। वह सती-साध्वी पतिव्रता पत्नी अपने पति चरणों का अनुगमन करने वाली थी। उसने अत्यन्त ही दीन भाव से प्रभु के पादपपद्मों में प्रणाम किया और गदद कण्ठ से प्रार्थना की- प्रभो ! इस पापिनी का उद्धार कीजिये। मुझे भी अपने चरणों की शरण प्रदान कीजिये, जिससे संसार सागर से मैं भी पति के चरणों का अनुगमन कर सकूँ।’
महाप्रभु की आज्ञा से तीर्थराम ने अपनी पत्नी को हरि-नाम मन्त्र का उपदेश दिया। वह भी अपना सारा धन कंगालों को बांटकर तीर्थराम के साथ हरिनाम संकीर्तन करने लगी।
महाप्रभु सात दिन तक बटेश्वर में ठहरे। वहाँ रहकर वे धनीराम को उपदेश देते थे। प्रभु ने उससे कहा- ‘बहुत ग्रन्थों के मायाजाल में मत पड़ना। भगवान केवल विश्वास से ही प्राप्त हो सकते हैं। सम्पूर्ण जगत के वैभव को तृण-समान समझना और निरन्तर भगवन्नाम संकीर्तन में लगे रहना यही वेद शास्त्रों का सार है।’ इस प्रकार तीर्थराम और उन दो सुन्दरी वेश्याओं को प्रेम दान करके महाप्रभु श्रीरंगम में चले गये थे और श्रीरंग में ही चातुर्मास्य किया। जब वर्षा समाप्त हो गयी, तब प्रभु ने श्रीरंगम से आगे चलने का विचार किया।
श्री श्री चैतन्य चरितावली
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तीर्थराम इन बातों को सुन रहा था। प्रभु के संकीर्तन के श्रवणमात्र से ही उसका धैर्य टूट गया था। अब रहा सहा धैर्य इस असम्भव घटना ने तोड़ दिया। परमसुन्दरी दो युवती एकान्त में जिससे प्रेमालाप करने की प्रार्थना करने की प्रार्थना करें और वह उन्हें माता कहकर सम्बोधन करे, वह कोई मनुष्य नहीं, ईश्वर है। यह संसारी प्राणी का काम नहीं, ये तो देवताओं के भी देवताओं का काम है। यह सोचते सोचते वह महाप्रभु के पादपद्मों में गिर पड़ा और बड़े ही जोर से चीत्कार मारकर कहने लगा- ‘हा प्रभो ! मुझ पापी का उद्धार करो, प्रभो ! मुझे अपने चरणों में शरण दो।’
महाप्रभु ने उसे उठाकर छाती से लगाया और प्रेम में विह्वल होकर जोर-जोर से नृत्य करते हुए संकीर्तन करने लगे। वे अविरलभाव से प्रेमाश्रु विमोचन करते हुए नृत्य करने लगे। भावावेश में उनके शरीर का वस्त्र जमीन पर गिर पड़ा। इससे उनके दीप्तिमान श्रीअंगों से तेज की किरणें फूट फूटकर उस नीरव स्थान को आलोकित करने लगीं। वे वेश्याएँ भी इस अदभुत चमत्कार को देखकर भावावेश में अपने को भूल गयीं और भगवान के नाम का कीर्तन करती हुई नृत्य करने लगीं!
तीर्थराम ने प्रभु के श्रीचरणों को जोर से पकड़ लिया और बार बार चिल्ला चिल्लाकर वह कहने लगा- ‘प्रभो ! मुझ पापी का भी किसी प्रकार उद्धार हो सकेगा? दयामय ! मेरे पापों का प्रायश्चित्त किसी तरह हो सकता है क्या?’
पतितपावन प्रभु ने उसे उठाकर अपने गले से लगाया और कहा- ‘तीर्थराम ! तुम पापी नहीं, पुण्यात्मा हो, तुम्हारे श्रीअंग के स्पर्श से मैं पावन हुआ। तुम भाग्यवान हो, प्रभु के कृपामात्र हो, अपने मन से ग्लानि निकाल दो। करुणामय श्रीहरि सबका भला करते हैं। जो उनकी शरण में पहुँच जाता है उसके पाप रहते ही नहीं। रूई के ढेर में जैसे अग्नि पड़ने से भस्म हो जाती है उसी प्रकार वे भस्म हो जाते हैं।’ महाप्रभु के इन आदेशमय वाक्यों को सुनकर तीर्थराम को कुछ धैर्य हुआ। उसने अपने को महाप्रभु के श्रीचरणों में सर्वतोभावेन समर्पित कर दिया। महाप्रभु ने उसे हरि-नाम-मन्त्र का उपदेश दिया और वह भी तिलक-कण्ठी धारण करके शुद्ध वैष्णव बन गया। दोनों वेश्याओं ने भी अपने पापों का प्रायश्चित किया और वे निरन्तर हरि-नाम स्मरण करने लगीं। तीर्थराम की स्त्री का नाम कमलकुमारी देवी था, अपने पति की ऐसी दशा देखकर उसे परमानन्द हुआ। वह सती-साध्वी पतिव्रता पत्नी अपने पति चरणों का अनुगमन करने वाली थी। उसने अत्यन्त ही दीन भाव से प्रभु के पादपपद्मों में प्रणाम किया और गदद कण्ठ से प्रार्थना की- प्रभो ! इस पापिनी का उद्धार कीजिये। मुझे भी अपने चरणों की शरण प्रदान कीजिये।
क्रमशः
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