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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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जब रावण को मारकर भगवान ने सीता जी की अग्नि परीक्षा की, तब अग्नि ने असली सीता जी को निकालकर दे दिया। वास्‍तव में रावण सीता जी की छाया को ही हरकर ले गया था। असली सीता का तो उसने स्‍पर्श तक नहीं किया।’
भक्‍तवत्‍सल महाप्रभु इस प्रसंग को सुनकर अत्‍यन्‍त ही प्रसन्‍न हुए। उन्‍होंने सोचा- ‘इसकी प्रतिलिपि करके उस परमभक्‍त रामदास को दिखानी चाहिये।’ फिर प्रभु ने सोचा-‘यदि मैं नवीन पत्र पर प्रतिलिप करके ले गया तो बहुत सम्‍भव है, नूतन श्‍लोक समझकर उसे विश्‍वास न हो।’ इसलिये प्रभु ने उस कथा कहने वाले ब्राह्मण से कहा- ‘हम इस पृष्‍ठ की नकल करके आपको दे देंगे। इस पुराने पृष्‍ठ को आप हमें दे दें।

कथावाचक ने प्रभु की इस बात को स्‍वीकार कर लिया और प्रभु ने उसकी नूतन प्रतिलिप करके तो उस कथावाचक को दे दी और वह पुराना पृष्‍ठ अपने पास रख लिया।उस पृष्‍ठ को लेकर दयालु गौरांग फिर दक्षिण मथुरा में रामभक्‍त ब्राह्मण के घर आये और उसे कूर्मपुराण के पुराने पृष्‍ठ को दिखाते हुए प्रभु ने कहा- ‘लीजिये अब तो आपको सन्‍तोष होगा। यह तो कूर्मपुराण में ही लिखा है कि रावण सीता की छाया को हरकर ले गया था।’
महाप्रभु की दयालुता को देखकर वह ब्राह्मण प्रेम में व्‍याकुल होकर रुदन करने लगा। प्रभु के पैरों को पकड़कर उसने रोते-रोते कह- ‘आज आपने मेरे दु:खों को दूर किया। आप मेरे इष्‍टदेव श्रीरघुनाथ जी ही हैं। मेरे इष्‍टदेव के सिवा ऐसी असीम कृपा दूसरा कोई कर ही नहीं सकता। आज आपके अमोघ दर्शन से मैं कृतार्थ हो गया। आपने अनुग्रह करके शोकसागर में डूबते हुए मुझ निराश्रय का उद्धार कर दिया। प्रभो ! मैं आपकी स्‍तुति ही क्‍या कर सकता हूँ?

उस ब्राह्मण की ऐसी स्‍तुति सुनकर प्रभु ने कहा- ‘विप्रवर ! मैं आपकी भक्ति देखकर बहुत ही अधिक सन्‍तुष्‍ट हुआ हूँ। ऐसा सच्‍चा भक्त मुझे और कहीं नहीं मिला।’ इस प्रकार उस ब्राह्मण को सन्‍तुष्‍ट और कृतार्थ करके महाप्रभु आगे के तीर्थों में जाने का विचार करने लगे।

दक्षिण के शेष तीर्थों में भ्रमण….

दक्षिण मथुरा से चलकर महाप्रभु पाण्‍डुदेश में ताम्रपर्णीं, नयत्रिपदी, चिवड़तला, तिलकांची, गजेन्‍द्रमोक्षण, पानागड़ि, चामतापुर, श्रीवैकुण्‍ठ, मलयपर्वत, धनुस्‍तीर्थ, कन्‍याकुमारी आदि तीर्थों में होते हुए और अपने अमोघ दर्शनों से लोगों को कृतार्थ करते हुए मल्‍लारदेश में पहुँचे। उधर भट्टथारी नाम से साधुवेषधारी लोगों का एक दल होता है। वे लोग एक स्थान पर नहीं रहते हैं। उसका वेष साधुओं का-सा होता है, किंतु उसका व्यवहार अच्छा नहीं होता है।

जिस प्रकार भूमरिया या बंजारे अपने डेरा-तम्‍बू लादकर घूमते रहते हैं, उसी प्रकार वे लोग भी एक स्‍थान से दूसरे स्‍थानों में घूमा करते हैं। उनमें से बहुत से तो रात्रि में चोरी भी कर लेते हैं। भूली भटकी स्त्रियों को वे बहकाकर अपने साथ रख लेते हैं। इस प्रकार वे अपने दल को बढ़ाया करते हैं। महाप्रभु रात्रि में उनके समीप ही ठहरे थे। उन लोगों ने महाप्रभु के सेवक कृष्‍णदास को बहका दिया। उसे सुन्‍दर स्‍त्री और धन का लोभ दिया। उन्‍होंने उसे भाँति-भाँति से समझाया– ‘तू इस विरक्‍त साधु के पीछे पीछे क्‍यों मारा मारा फिरता हैं, न भोजन का ठिकाना और न रहने की ही सुविधा। हमारा चेला बन जा। हमारे यहाँ अनेकों सुंदर-सुंदर स्त्रियाँ है, जिसे चाहे रखना, खाने पीने की हमारे यहाँ कमी ही नहीं। रोज हलुआ, मोहनभोग घुटता हैं। बेचारा अनपढ़ सीधा सादा गरीब ब्राह्मण उनकी बातों में आ गया। वह महाप्रभु को छोड़कर धीरे से उठकर उन लोगों के साथ चला गया।

जब महाप्रभु को यह बात मालूम हुई तो वे उन लोगों के पास गये और उनसे सरलतापूर्वक कहने लगे- ‘भाइयो ! आपने यह अच्‍छा काम नहीं किया है। मेरे साथी को आपने बहकाकर अपने यहाँ रख लिया है, ऐसा करना आप लोगों के लिये उचित नहीं है, आप भी संन्‍यासी हैं और मैं भी संन्‍यासी हूँ। आपके साथ बहुत-से आदमी हैं, मेरे पास तो यह अकेला ही है, इसलिये मेरे आदमी को कृपा करके आप दे दें नहीं तो इसका परिणाम अच्‍छा न होगा।’

महाप्रभु की ऐसी बात सुनकर वे वेषधारी संन्‍यासी प्रभु के ऊपर प्रहार करने को उद्यत हो गये, किन्‍तु प्रभु के प्रभाव से प्रभावान्वित होकर वे भाग गये और महाप्रभु कृष्‍णदास को उन लोगों से छुड़ाकर आगे के लिये चले। वहाँ से चलकर महाप्रभु पयस्विनी नामक नदी के तट पर पहुँचे। वहाँ उन्‍हें प्राचीन लिखी हुई ब्रह्मसंहिता मिल गयी, उस अदभुत ग्रन्‍थ को लेकर प्रभु श्रृंगेरीमठ में पहुँचे। यह भगवान शंकराचार्य का दक्षिण दिशा का प्रधान मठ है। भगवान शंकराचार्य ने वेद शास्‍त्रों की रक्षा और धर्म प्रसार के निमित्त भारतवर्ष की चारों दिशाओं में चार मठ स्‍थापित किये। उत्तर दिशा में बदरिकाश्रम के समीप जोशीमठ, पूर्व में जगन्‍नाथपुरी में गोवर्धनमठ, द्वारिकापुरी में शारदामठ और दक्षि‍णपुरी में श्रंगेरीमठ। इनमें से जोशी मठ को छोड़कर शेष तीनों मठों के मठाधीश आज तक शंकराचार्य के ही नाम से पुकारे जाते हैं। महाप्रभु का सम्‍बन्‍ध भी दशनामी सम्‍प्रदाय के संन्‍यासियों से ही था।श्रृंगेरीमठ से चलकर महाप्रभु मत्‍स्‍यतीर्थ होते हुए उडूपी नामक स्‍थान में मध्‍वाचार्य के मठपर पहुँचे और वहाँ गोपाल भगवान के दर्शन किये। वहाँ के तत्त्ववादियों के साथ प्रभु शास्‍त्रविचार करते हुए दो तीन दिन तक रहे। वहाँ से फाल्‍गुतीर्थ, त्रिकूप, पम्‍पापुर, सुर्पारक, कोल्‍हापुर आदि तीर्थ-स्‍थानों में होते हुए पण्‍ढरपुर में आये। यहाँ पर एक ब्राह्मण ने महाप्रभु का निमन्‍त्रण किया। महाप्रभु उसका निमन्‍त्रण स्‍वीकार करके उसके यहाँ भिक्षा करने गये। उसने बड़ी श्रद्धाभक्ति से प्रभु को भिक्षा करायी। बातों ही बातों में उसने कहा- ‘यहाँ पर एक बड़े ही योग्‍य और भगवदभक्त महात्‍मा ठहरे हुए हैं।

सम्‍भवतया आपने श्रीमन्‍माधवेन्‍द्रपुरी महाराज का नाम तो सुना ही होगा, वे महात्‍मा उन्‍हीं के शिष्‍य हैं, उनका नाम श्रीरंगपुरी है। इतना सुनते ही प्रभु प्रेम में विभोर हो गये। उन्‍होंने जल्‍दी से कहा –‘विप्रवर! आप मुझे से श्रीरंगपुरी महाराज के समीप ले चलें।’
प्रभु की आज्ञा शिरोधार्य करके वह ब्राह्मण प्रभु को साथ लेकर रंगपुरी महाराज के समीप पहुँचा। प्रभु ने दूर से ही पुरी महाराज को देखकर उनके चरणों में साष्‍टांग प्रणाम किया। पुरी महाराज ने प्रणत हुए प्रभु को उठाकर गले से लगाया और उनकी प्रशंसा करने लगा।
क्रमशः

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