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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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ऊपर से सदा उससे छेड़खानी ही करते रहते। जब भी वह मिल जाता, उसे पकड़कर न्याय की फक्कि का पूछने लगते। वह हाथ जोड़कर कहता- ‘बाबा! मुझे माफ करो, मैं तुम्हारा न्याय-फ्याय कुछ नहीं जानता। मैं तो वैष्णव-शास्त्रों का अध्ययन करता हूँ।’ तब आप उससे कहते- ‘अच्छा, वैष्णव की ही परिभाषा करो। बताओ वैष्णव के क्या लक्षण हैं?’ मुकुन्द कहते- ‘भाई, हम हारे तुम जीते। कैसे पिण्ड भी छोड़ोगे? तुमसे मगजपच्ची कौन करे? तुम पर तो सदा शास्त्रार्थ का ही भूत सवार रहता है। हमें इतना समय कहाँ है?’ इस प्रकार कहकर वे जैसे-तैसे इनसे अपना पीछा छुड़ाकर भागते। एक दिन ये गंगा-स्नान करके आ रहे थे, उधर से मुकुन्ददत्त भी गंगा-स्नान करने के निमित्त आ रहे थे, इन्हें दूर से ही आता देख मुकुन्ददत्त जल्दी से दूसरे रास्ते होकर गंगा की ओर जाने लगे। निमाई ने अपने विद्यार्थियों से कहा- ‘देखी, तुमने इस वैष्णव विद्यार्थी की चालाकी? कैसा बच के भागा जा रहा है, मानो मैं उसे देख ही नहीं रहा हूँ।
एक विद्यार्थी ने कहा- ‘किसी जरूरी काम से उधर जा रहे होंगे।’ आप जोर से कहने लगे- ‘जरूरी काम कुछ नहीं है। सोचते हैं वैष्णव होकर हम इन अवैष्णव लोगों से व्यर्थ की बातें क्यों करें। इसलिये एक तरफ होकर निकले जा रहे हैं।’ फिर जोरों से मुकुन्ददत्त को सुनाते हुए बोले- ‘अच्छा बेटा, देखते हैं कितने दिन इस तरह हमसे दूर रहोगे। यों मत समझना कि हम ही वैष्णव हैं। एक दिन हम भी वैष्णव होंगे और ऐसे वैष्णव होंगे कि तुम सदा पीछे-पीछे फिरते रहोगे।’ इन बातों को सुनते-सुनते मुकुन्द गंगा की ओर चले गये और ये अपनी पाठशाला में लौट आये। इनके पिता श्रीहट्ट के निवासी थे। नवद्वीप में बहुत-से श्रीहट्ट के विद्यार्थी पढ़ने के लिये आया करते और बहुत-से श्रीहट्टवासी नवद्वीप में रहते ही थे। ये जहाँ भी श्रीहट्ट के विद्यार्थी को देखते वहीं उसकी खिल्ली उड़ाते। श्रीहट्ट की बोली की नकल करते, उनके आचार-विचार की आलोचना करते। लोग कहते- ‘तुम्हें शर्म नहीं आती, तुम भी तो श्रीहट्ट के ही हो। जहाँ के रहने वाले हो वहीं की खिल्लियाँ उड़ाते हो।’ ये कहते- ‘शर्म तो हमने उतारकर अपने घर की खूँटी पर लटका दी है, तुम झूठ मानो तो हमारे घर जाकर देख आओ।’ सभी सुनते और चुप हो जाते। कोई-कोई राज-कर्मचारियों तक से इनकी उद्दण्डता की शिकायत करते, किन्तु राजकर्मचारी इनके स्वभाव से परिचित थे, ये उन्हें देखकर जोरों से हँस पड़ते।कर्मचारी शिकायत करने वाले को ही चार उलटी-सीधी सुनाकर विदा करते। इस प्रकार इनकी चंचलता नगरभर में विख्यात हो गयी। उन दिनों नवद्वीप में इने-गिने ही वैष्णव थे, उनकी संख्या उँगलियों पर गिनी जा सकती थी। उन सबके आश्रयदाता थे अद्वैताचार्य। वैष्णवगण अपनी मनोव्यथा उन्हीं से जाकर कहते। वे वैष्णव को आश्वासन दिलाते, ‘घबड़ाओ मत। अन्तर्यामी भगवान हमारी दुर्दशा को भलीभाँति जानते हैं, वे प्रत्यक्ष रीति से हमारी दुर्गति देख रहे हैं। बहुत शीघ्र ही वे हमारा उद्धार करेंगे। एक दिन नवद्वीप में भक्ति की ऐसी बाढ़ आवेगी कि उसमें सभी नर-नारी सराबोर हो जायँगे। जितने दिन की यह विपत्ति है उतने दिन धैर्य से और काटो, अब शीघ्र ही नास्तिकवाद और हिंसावाद का अन्त होने वाला है।’
वैष्णव कहते- ‘निमाई पण्डित ऐसे विद्वान वैष्णवों की हँसी उड़ाते हैं।’ अद्वैत कहते- ‘तुम अभी निमाई को जानते नहीं, वे हृदय से वैष्णवों के प्रति बड़ा स्नेह रखते हैं, वे जो भी कुछ कहते हैं ऊपर से ही यों ही कह देते हैं। आगे चलकर तुम उन्हें यथार्थ रीति से समझ सकोगे।’ इस प्रकार वैष्णव तो आपस में ऐसी बातें किया करते और निमाई अपनी लोकोत्तर मधुर-मधुर चंचलता से नगरवासी तथा शचीदेवी और लक्ष्मीदेवी को आनन्दित और हर्षित किया करते।
नवद्वीप में ईश्वरपुरी......
बड़े-बड़े विद्वान और धर्मकोविदों ने गृहस्थ-धर्म की जो इतनी भारी प्रशंसा की है, उसका एक प्रधान कारण है अतिथि-सेवा। गृहस्थ में रहकर मनुष्य अपनी शक्ति के अनुसार अतिथि-सेवा भलीभाँति कर सकता है। भूखे को यथासामर्थ्य भोजन देना, प्यासे को जल पिलाना और निराश्रित को आश्रय प्रदान करके सुख पहुँचाना- इनसे बढ़कर कोई दूसरा धर्म हो ही नहीं सकता। अहा! उस बड़भागी गृहस्थ के घर की कल्पना तो कीजिये। छोटा-सा लिपा-पुता स्वच्छा घर है, एक ओर तुलसी का बिरवा आँगन में शोभा दे रहा है, दूसरी ओर हल्दी और कुंकुम से पूजित सुन्दर-सी श्यामा गौ बँधी है। गृहिणी सुन्दर और हँसमुख है, छोटे-छोटे बच्चे आँगन में खेल रहे हैं। गृहिणी मुख से सुन्दर हरि नाम का उच्चारण करती हुई रसोई बना रही है, इतने ही में गृहपति आ गये। भोजन तैयार है, गृहपति ने गोग्रास निकाला, सभी सामग्रियों में से थोड़ा-थोड़ा लेकर अग्नि में आहुत दी और द्वार पर खडे़ होकर किसी अतिथि की खोज करने लगे। इतने ही में क्या देखते हैं, एक विरक्त महात्मा कौपीन लगाये भिक्षा के निमित्त ग्राम की ओर आ रहे हैं। गृहस्थी ने आगे बढ़कर महात्मा के चरणों में अभिवादन किया और उनसे भिक्षा कर लेने की प्रार्थना की। सद्गृहस्थी की प्रार्थना स्वीकार करके संत उसके घर में जाते हैं। योग्य अतिथि को देखकर दम्पती हर्ष से उन्मत्त-से हो जाते हैं। अपने सगे जमाई की तरह उनका स्वागत-सत्कार करते हैं। महात्मा के चरणों को धोकर उस जल का स्वयं पान करते हैं और अपने घर भर को पवित्र बनाते हैं। संत को बड़ी ही श्रद्धा से अपने घर में जो भी कुछ रूखा-सूखा बना है, प्रेम से खिलाते हैं। भोजन करके महात्मा चले जाते हैं और गृहस्थी अपने बाल-बच्चे और आश्रित जनों के साथ उस शेष अन्न को पाता है। ऐसे गृहस्थधर्म से बढ़कर दूसरा कौन-सा धर्म हो सकता है? ऐसा गृहस्थी स्वयं तो पावन बन ही जाता है किन्तु जो लोग अतिथि होकर ऐसे गृहस्थ का आतिथ्य स्वीकार कर लेते हैं वे भी पवित्र हो जाते हैं। ऐसे अन्न के दाता, भोक्ता दोनों ही पुण्य के भागी होते हैं। निमाई पण्डित को हम आदर्श सद्गृहस्थी कह सकते हैं। उनकी वृद्धा माता प्रेम की मानो मूर्ति ही हैं, घर में जो भी आता है उसको पुत्र की भाँति प्यार करती हैं और उससे भोजनादि के लिये आग्रह करती हैं।
क्रमशः
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