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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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सार्वभौम ने कहा-‘नहीं, गरुड़ के समीप से क्यों दर्शन करोगे? मन्दिर में सब आदमी अपने ही हैं, जहाँ से इच्छा हो, दर्शन करो। मैंने तो सावधानी के खयाल से यह बात कही है।’
इतनी बातें करने के अनन्तर सार्वभौम ने अपने बहनोई गोपीनाथाचार्य से कहा- ‘आचार्य महाशय ! आपने इनसे हमारा परिचय कराकर बड़ा ही उत्तम कार्य किया। आपकी ही कृपा से हम इन्हें पहचान सके। अब इनके ठहरने का कहीं एकान्त स्थान में प्रबन्ध करना चाहिये। हमारी मौसी का वह दूसरा घर ख़ाली भी है और एकान्त भी है, वह इनके लिये कैसा रहेगा?’
आचार्य ने कहा- ‘स्थान तो बहुत सुन्दर है, ये लोग उसे अवश्य ही पसंद करेंगे। उसी में सबका आसन लगवा दें।’
सार्वभौम ने कहा- ‘हाँ, हाँ, यही ठीक रहेगा। आप इन सबको वहीं ले जायँ।’
सार्वभौम की सम्मति से गोपीनाथाचार्य प्रभु को उनके साथियों के सहित सार्वभौम के मौसा के घर ले गये। प्रभु ने उस एकान्त स्थान को बहुत पसंद किया और वे अपने साथियों के सहित उसी में रहने लगे।
इसी संसार-सागर में डूबते हुए निराश्रित जीवों के गुरुदेव ही एकमात्र आश्रय हैं। गुरुदेव ही बहते हुए, डूबते हुए, बिलखते हुए, अकुलाते हुए, बिलबिलाते हुए, अचेतन हुए जीवों को भव-वारिधि से बाँह पकड़कर बाहर निकाल सकने में समर्थ हो सकते हैं। त्रैलोक्यपावन गुरुदेव की कृपा के बिना जीव इस अपार दुर्गम पयोधि के पार जा ही नहीं सकता। वे अखिल विश्व-ब्रह्माण्डों के विधाता विश्वम्भर ही भाँति-भाँति के रूप धारण करके गुरुरूप से जीवों को प्राप्त होते हैं और उन्हीं के पादपद्मों का आश्रय ग्रहण करके मुमुक्षु जीव बात-की-बात में इस अपार उदधि को तर जाते हैं। किसी मनुष्य की सामर्थ्य ही क्या है जो एक भी जीव का वह विस्तार कर सके? जीवों का कल्याण तो वे ही परमगुरु श्रीहरि ही कर सकते हैं। इसीलिये मनुष्य गुरु हो ही नहीं सकता। जगद्गुरु तो वे ही श्रीमन्नारायण हैं, वे ही जिस जीव को संसार-बन्धन से छुड़ाना चाहते हैं, उसे गुरुरूप से प्राप्त होते हैं। अन्य साधारण बद्ध जीवों की दृष्टि में तो वह रुप साधारण जीवों की ही भाँति प्रतीत होता है; किन्तु जो अनुग्रह-सृष्टि के जीव हैं, जिन्हें वे श्रीहरि स्वंय ही कृपापूर्वक वरण करना चाहते हैं उन्हें उस रूप में साक्षात श्रीसनातन पूर्णब्रह्म के दर्शन होते हैं। इसीलिये गुरु, भक्त और भगवान -ये मूल में एक ही पदार्थ के लोकभावना के अनुसार तीन नाम रख दिये गये हैं। वास्तव में इन तीनों में कोई अन्तर नहीं। इस भाव को अनुग्रह-सृष्टि के ही जीव समझ सकते हैं। अन्य जीवों के वश की यह बात नहीं है।
गोपीनाथाचार्य हृदय प्रधान पुरुष थे। उनके ऊपर भगवान की यथेच्छ कृपा थी। उनका हृदय अत्यधिक कोमल था। भावुकता की मात्रा उनमें कुछ अधिक थी, महाप्रभु के पादपद्मों में उनकी अहैतु की प्रीति थी। वे महाप्रभु के श्रीविग्रह में अपने श्रीमन्नारायण के दर्शन करते थे। उनके लिये प्रभु का पांचभौतिक नश्वर शरीर नहीं के बराबर था। वे उसमें सनातन, सत्य, सगुण, परब्रह्म का अविनाशी आलोक देखते थे और उसी भाव उनकी पूजा-अर्चा करते थे। वे अनुग्रह-सृष्टि के जीव थे, भगवान के अपने जन थे, उनके नित्य पार्षद थे।
एक दिन गोपीनाथाचार्य प्रभु को जगन्नाथ जी के शयनोत्थान के दर्शन कराकर लौटे। लौटते समय वे मुकुन्ददतत्त के साथ सार्वभौम महाशय के घर चले गये। सार्वभौम भट्टाचार्य ने अपने बहनोई का यथोचित सत्कार किया और मुकुन्ददत्त के सहित उन्हें बैठने के लिये आसन दिया। आचार्य के बैठ जाने पर इधर-उधर की बातें होती रहीं। अन्त में महाप्रभु जी का प्रसंग छिड़ गया।
सार्वभौम ने पूछा- ‘इन निमाई पण्डित ने किन से सन्यांस लिया है और इनके संन्यासाश्रम का क्या नाम है?’
गोपीनाथाचार्य ने कहा- ‘श्रीकृष्ण चैतन्य।’ कटवा के समीप जो केशव भारती महाराज रहते हैं, वे ही महाभाग संन्यासीप्रवर न्यासी चूड़ामणि महापुरुष इनके संन्यासाश्रम के गुरु हैं।’ सार्वभौम समझ गये कि केशव भारती कोई विद्वान और नामी संन्यासी तो हैं नहीं। ऐसे ही साधारण संन्यासी होंगे। फिर दण्डी संन्यासियों में भारतीयों को कुछ हेय समझते हैं। आश्रम, तीर्थ और सरस्वती- इन तीन दण्डी संन्यासियों में भारतीयों की गणना नहीं। उनके लिये दण्ड धारण करने का विधान तो है, किन्तु उनका दण्ड आधा समझा जाता है। यही सब विचारकर वे आचार्य से कुछ मुँह सिकोड़कर कहने लगे- ‘नाम तो बड़ा सुन्दर है, रूप-लावण्य भी इनका अद्वितीय है। कुछ शास्त्रज्ञ भी मालूम पड़ते हैं। उच्च ब्राह्मण-कुल में इनका जन्म हुआ है, फिर इन्होंने इस प्रकार हेय-सम्प्रदाय वाले संन्यासी से दीक्षा क्यों ली? मालूम होता है, बिना सोचे-समझे आवेश में आकर इन्होंने मूंड़ मुंड़ा लिया। यदि आप सब लोगों की इच्छा हो, तो हम किसी योग्य प्रतिष्ठित दण्डी स्वामी को बुलाकर फिर से इनका संस्कार करा दें।’
इस बात को सुनकर कुछ दु:ख प्रकट करते हुए आचार्य ने कहा- ‘आपकी बुद्धि तो निरन्तर शास्त्रों में शंका करते-करते शंकित सी बन गयी है। आपकी दृष्टि में घट-पट आदि बाह्म वस्तुओं के अतिरिक्त कोई दूसरी वस्तु है ही नहीं। ये साक्षात भगवान हैं, इन्हें बाह्य उपकरणों की क्या अपेक्षा? ये तो स्वयंसिद्ध त्यागी, संन्यासी, वैरागी और प्रेमी हैं; इन्हें आपकी सिफारिश की आवश्यकता न पड़ेगी।’
सार्वभौम ने कहा- ‘आपकी ये ही भावुकता की बातें तो अच्छी नहीं लगतीं। हम तो उन बेचारों के हित की बातें कह रहे हैं। अभी उनकी नयी अवस्था है। संसारी सुखों से अभी एकदम वंचित- से ही रहे हैं। ऐसी अवस्था में ये संन्यास-धर्म के कठोर नियमों का पालन कैसे कर सकेंगे?’ आचार्य ने कहा- ‘ये नियमों के भी नियामक हैं। इनका संन्यास ही क्या? यह तो लोक-शिक्षा के निमित्त इन्होंने ऐसा किया है।’ हंसते हुए सार्वभौम ने कहा- ‘यह खूब रही, युवावस्था में इन्हें यह लोक-शिक्षा की खूब सूझी। महाराज ! आप कहीं लोक-शिक्षा के निमित्त ऐसा मत कर डालना।’
आचार्य ने कहा- ‘लोक-शिक्षा मनुष्य कर ही क्या सकता है, वह तो भगवान का ही कार्य है और वे विविध वेष धारण करके लोक-शिक्षण का कार्य किया करते हैं।’
जोरों से हंसते हुए सार्वभौम ने कहा- ‘बाबा! दया करो, उस बेचारे संन्यासी को आकाश पर चढ़ाकर उसके सर्वनाश की बातें क्यों सोच रहे हो?
क्रमशः
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