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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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जितना कि इन सर्वसमर्थ ईश्वरों के पदाघात से। तीर्थों का तीर्थत्व जो अभी तक ज्यों का त्यों ही अक्षुण्ण बना हुआ है, इसका सर्वप्रधान कारण यही है कि ऐसे महानुभाव तीर्थों में आकर अपने पादस्पर्श से तीर्थों से एकत्रित हुए पापों को भस्म कर देते हैं, जिससे तीर्थ फिर ज्यों- के-त्यों ही निर्मल हो जाते हैं।
महाप्रभु चैतन्यदेव दक्षिण की ओर यात्रा कर रहे थे। वे जिस ग्राम में होकर निकलते उसी में उच्चस्वर से भगवन्नामों का घोष करते। उन हृदयग्राही सुमधुर भगवन्नामों को प्रभु की चित्ताकर्षक मनोहर वाणी द्वारा सुनकर ग्रामों के झुंड-के झुंड स्त्री-पुरुष आ-आकर प्रभु को घेर लेते। महाप्रभु उनके बीच में खड़े होकर कहते-
हरि हरि बोल, बोल हरि बोल।
मुकुन्द माधव गोविन्द बोल।।
प्रभु के स्वर में स्वर मिलाकर छोटे-छोटे बच्चे ताली बजा-बजाकर जोरों के साथ नाचते हुए कहने लगते-
हरि हरि बोल, बोल हरि बोल।
मुकुन्द माधव गोविन्द बोल।।
बच्चों के साथ बड़े भी गाने लगते और बहुत-से तो पागलों की तरह नृत्य ही करने लगते। इस प्रकार प्रभु जिधर होकर निकलते उधर ही श्रीहरि नाम की गूँज होने लगती। इस प्रकार पथ के असंख्य स्त्री-पुरुषों को पावन करते हुए प्रभु कूर्माचल या कूर्मम स्थान में पहुँचे। यह तीर्थस्थान आन्ध्रप्रदेश के अन्तगर्त गंजाम जिले में अवस्थित है। कहते हैं कि पूर्वकाल में जगन्नाथ जी जाते हुए भगवान रामानुजाचार्य यहाँ ठहरे थे। पहले तो उन्हें कूर्मभगवान की मूर्ति शिवरुप से प्रतीत हुई और पीछे उन्होंने विष्णुरुप समझकर कूर्मभगवान की सेवा की। पीछे से यह स्थान माध्वसम्प्रदाय वाले महात्माओं के अधिकार में आ गया। दक्षिण-देश में इस तीर्थ की बड़ी भारी प्रतिष्ठा है। प्रभु ने मन्दिर में पहुँचकर कूर्मभगवान के दर्शन किये और वे आनन्द में विह्रल होकर नृत्य करने लगे। प्रभु के अलौकिक नृत्य को देखकर कूर्मनिवासी बहुत-से नर-नारी वहाँ एकत्रित होकर प्रभु के देवदुर्लभ दर्शनों से अपने नेत्रों को सार्थक करने लगे। प्रभु बहुत देर तक भावावेश में आकर नृत्य और कीर्तन करते रहे।जब बहुत देर के अनन्तर प्रभु वहीं नृत्य करते-करते बैठ गये तब उन दर्शकों में से ‘कूर्म’ नाम का एक सदाचारी वैष्णव ब्राह्मण प्रभु के समीप आया और प्रभु को प्रणाम करके उसने दोनों हाथों की अंजलि बांधे हुए निवदेन किया- ‘भगवन ! आपके दर्शनों से आज हम सभी पुरवासी कृतार्थ हुए। आप-जैसे महापुरुष यदा-कदा ही ऐसे तीर्थों को अपनी पदधूलि से पावन बनाने के लिये पधारते हैं। लोक के कल्याण के निमित्त आप- जैसे संत-महात्माओं का देशाटन होता है। गृहस्थियों के घरों की पावन करना ही आपकी यात्रा का प्रधान उद्देश्य है। मैं अत्यन्त ही निर्धन, दीन-हीन कंगाल ब्राह्मणबन्धु हूँ। भगवन ! यदि अपनी चरणरज से मेरे घर को पावन बना सकें, तो मेरे ऊपर अत्यन्त ही अनुग्रह हो ! नाथ ! मैं आपके चरणों में सिर से प्रणाम करता हुआ प्रार्थना करता हूँ कि आप मेरी इस प्रार्थना को अवश्य ही स्वीकार करें।’
प्रभु ने प्रसन्नता प्रकट करते हुए कहा- ‘विप्रवर ! आप जैसी बातें कर रहे हैं। ब्राह्मण तो साक्षात श्रीहरि के मुख हैं, आप-जैसे विनयी वैष्णव ब्राह्मण का आतिथ्य ग्रहण करने में तो मैं अपना अहोभाग्य समझता हूँ। जो भगवद भक्त है, साधु-संतों में श्रद्धा रखते हैं, जिन्हें अतिथियों की सेवा करने में सुख प्रतीत होता है, ऐसे भक्तों के घर का प्रसादान्न ग्रहण करने से अतिथि भी पवित्र बन जाता है। ऐसे आतिथ्य से अतिथि और आतिथ्य करने वाला दोनों ही धन्य हो जाते हैं। इसलिये मैं आपका आतिथ्य अवश्य ही ग्रहण करूँगा।’
प्रभु के मुख से निमन्त्रण की स्वीकृति सुनकर वह ब्राह्मण आनन्द के कारण व्याकुल-सा हो उठा। वह उसी समय अस्त-व्यस्त भाव से अपने घर गया और अपनी ब्राह्मणी से कहकर उसने महाप्रभु के लिये भाँति-भाँति के उत्तमोत्तम पदार्थ बनवाये। पतिप्राणा सती-साध्वी ब्राह्मणी ने बात-की-बात में नाना भाँति के व्यंजन बनाकर पति से प्रभु को बुला लाने का अनुरोध किया। भोजनों को तैयार देखकर ब्राह्मण जल्दी से प्रभु को बुला लाया। घर पर आते ही उसने हाथों से प्रभु के पादपद्मों को पखारा और उस पादोदक को स्वयं पान किया तथा परिवार भर को पिलाया। इसके अनन्तर सुन्दर से आसन पर प्रभु को बिठाकर धीरे-धीरे भगवान का प्रसाद ला-लाकर प्रभु के सामने रखने लगा। उस प्रेम में पगे हुए भाँति-भाँति के सुन्दर सुस्वादु पदार्थों को देखकर और उनके ऊपर सुन्दर तुलसी मंजरी का अवलोकर करके प्रभु अत्यन्त ही प्रसन्न हुए और श्रीहरि का स्मरण करते हुए उन्होंने प्रसाद पाया।प्रभु के प्रसाद पा लेने ब्राह्मण ने दूसरी और प्रभु के विश्राम की व्यवस्था कर दी और प्रभु के अवशेष अन्न के प्रसाद समझकर ब्राह्मण ने अपने सम्पूर्ण परिवार के सहित उस अन्न को ग्रहण किया। महाप्रभु एक ओर विश्राम कर रहे थे, कूर्म ब्राह्मण धीरे-धीरे प्रभु के पैरों को दबाने लगा। पैरों को दबाते-दबाते उसने कहा- ‘प्रभो ! यह गृहस्थ का जंजाल तो बड़ा ही बुरा है। इसमें रहकर भगवत-चिन्तन हो ही नहीं सकता। अब तो मैं इस मायाजाल से बहुत ही ऊब गया हूँ। अब मेरा जैसे भी समझें, उद्धार कीजिये और अपने चरणों की शरण प्रदान कीजिये, यही श्रीचरणों में विनम्र प्रार्थना है।’
प्रभु ने ब्राह्मण के प्रति प्रेम प्रदर्शित करते हुए कहा- ‘विप्रवर ! भगवत-सेवा समझकर ही तुम घर के सभी कामों को करते रहो। घर में रहकर ही कृष्णकीर्तन करो और अन्य लोगों को भी इसका उपदेश करो। मैं दक्षिण की यात्रा समाप्त करके जब तक पुरी की ओर लौटकर न आऊँ, तब तक तुम यहीं रहकर भगवन्नामों का संकीर्तन और प्रचार करते रहो।’
प्रभु की इन बातों से ब्राह्मण को कुछ-कुछ संतोष हुआ और उसने उसी समय भगवन्नाम-संकीर्तन करने का निश्चय कर लिया। उस रात्रि प्रभु उस महाभाग कूर्म ब्राह्मण के ही घर में रहे। प्रात: काल नित्यकर्म से निवृत्त होकर प्रभु ने आगे के लिये प्रस्थान किया। कूर्म बहुत देर तक प्रभु को पहुँचाने के लिये उनके साथ-ही ग्राम से बाहर तक गया। जब प्रभु ने बार बार उससे लौक जाने का आग्रह किया, तब वह अत्यंत दु;खित-चित्त से रुदन करता हुआ ग्राम की ओर लौट आया।उसी ग्राम में वासुदेव नामक एक परम वैष्णव ब्राह्मण रहता था। उसकी साधु-महात्माओं के चरणों में अत्यधिक प्रीति थी।क्रमशः
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