cc217
श्री श्री चैतन्य चरितावली
217-
इनके राय रामानन्द, गोपीनाथ पट्टनायक, कलानिधि, सुधानिधि और वाणीनाथ नामक-ये पाँच पुत्र थे। ये उड़ीसा के महाराज प्रताप रुद्र के राजदरबार में एक प्रधान कर्मचारी थे। इनके तीन लड़के भी महाराज के दरबार में ही ऊंचे-ऊंचे अधिकारों पर आसीन होकर राज-काज करते थे। गोपीनाथ कटक-दरबार की ओर से मालजेठा-प्रदेश के शासक थे। वाणीनाथ दरबार में ही किसी उच्च पद पर प्रतिष्ठित थे और राय रामानन्द उत्कल देश के अन्तगर्त विद्यानगर राज्य के शासक थे।
इस बात को हम पहले ही बता चुके हैं कि उस समय भारतवर्ष में छोटे-छोटे सैकड़ों स्वतन्त्र राज्य थे। उस अपने छोटे-से प्रदेश के शासक नृपतिगण सनातन-परिपाटी के अनुसार धर्म को प्रधान मानकर प्रजा का पालन करते थे और क्षत्रिय-धर्म के अनुसार युद्ध भी करते थे।
तैलंग देश में भी बहुत से छोटे छोटे राज्य थे। उनमें से ‘कोटदेश’ नामका एक छोटा-सा राज्य था, जिसकी राजधानी विद्यानगर थी। वर्तमान समय में गोदावरी के उत्तर तटपर स्थित राजमहेन्द्री को ही उस प्रदेश की प्रधान नगरी समझना चाहिये, किन्तु पुराना विद्यानगर तो गोदावरी के दक्षिण तीर पर अवस्थित था और वह वर्तमान राजमहेन्द्री से दस-बारह कोस की दूरी पर था। बहुत-से लोग विजयनगर को ही विद्यानगर समझते हैं, किन्तु नामके साम्य होने के केवल भ्रम ही है। इसे तो पाठक पहले ही पढ़ चुके हैं कि उत्कल-देश के तत्कालीन महाराज पुरुषोत्तमदेव ने विद्यानगर के राजा को युद्ध में परास्त करके उसने देश को अपने राज्य में मिला लिया था। रामानन्द राय उत्कल-राज्य की ही ओर से उस राज्य के शासक होकर वहाँ रहते थे। महाराज की ही ओर से उन्हें ’राजा’ और ‘राय’ की उपाधियाँ मिली हुई थीं।
राय महाशय राज-काल में प्रवीण, देश-काल के जानने वाले, विनयी शूर तथा सदाचारी पुरुष थे। फारसी के पण्डित होने के साथ-ही-साथ उन्हें संस्कृत का भी भलीभाँति ज्ञान था। संस्कृत-साहित्य का उन्होंने खूब अनुशीलन किया था, सभी शास्त्रों में उनकी प्रगती थी। विद्या-व्यासंगी होने के कारण उनका सार्वभौम भट्टाचार्य से अत्यधिक स्नेह था। ये जब भी राज-काल से उड़ीसा जाते तभी पुरी में जाकर सार्वभौम से मिलते और उनके साथ शास्त्रालोचना किया करते। सार्वभौम भी इन्हें हृदय से चाहते थे, दोनों का हृदय कविताप्रिय था। दोनों ही सरस, सरल, विद्वान और शास्त्राभ्यासी थे, इसीलिये इन दोनों की परस्पर खूब पीटती थी। महाराज प्रतापरुद्र भी काव्य-रसिक थे, इसीलिये वे भी सार्वभौम भट्टाचार्य तथा रामानन्द राय-इन दोनों ही का बहुत अधिक सादर करते थे। राय महाशय ने अपने ‘जगन्नाथवल्लभ’ नामक नाटक में महाराज प्रतापरुद्र की बहुत अधिक प्रशंसा की है। राय रामानन्द करणवंशी कायस्थ थे, फिर भी उनका आचार-विचार बड़ा ही शुद्ध तथा पवित्र था। वे देवता और ब्राह्मणों के चरणों में अत्यधिक श्रद्धा रखते थे। वैदिक श्रौत-स्मार्त आदि कर्मों का वे विधिवत अनुष्ठान करते थे और धर्मपूर्वक शासन का कार्य करते हुए सदा श्रीकृष्ण के चरणाविन्दों में अपने मन को लगाये रहते थे।
एक दिन प्रात: काल बहुत-से वैदिक ब्राह्मणों के सहित नित्य की भाँति पतितपावनी पुण्यतोया गोदावरी-में स्नान करने के निमित्त आये। बहुत-से वेदज्ञ ब्राह्मण उनके साथ-साथ स्तोत्रपाठ करते हुए आ रहे थे। आगे-आगे बहुत-से वाद्य बजाने वाले पुरुष भाँति-भाँति के वाद्यों को बजाते हुए चल रहे थे। इस प्रकार बहुत-से आदमियों से घिरे हुए वे गोदावरी के तट पर पहुँचे। तट पर पहुँचते ही वाद्य वालों ने अपने-अपने वाद्य बंद कर दिये। ब्राह्मणगण वस्त्र उतार-उतारकर गोदावरी के स्वच्छ, शीतल जल में स्नान करने लगे। बहुत-से स्नान के समय पढ़े जाने वाले स्तोत्रों को पढ़कर राय रामानन्द जी ने स्नान किया और फिर देवता, ऋषि तथा पितरों को जल से सन्तुष्ट करके उन्होंने ब्राह्मणों को यथेष्ट दक्षिणा दी और फिर वे अपनी राजधानी की ओर चलने लगे।उसी समय दूर ही से उन्होंने अकेले वृक्ष के नीचे बैठ हुए एक नवीन अवस्था वाले काषाय वस्त्रधारी परमरुप-लावण्य युक्त युवक संन्यासी को देखा। पता नहीं, उस युवक संन्यासी की चितवन में क्या जादू भरा हुआ था, उसे देखते ही राय रामानन्द मन्त्रमुग्ध-से बन गये। उन्होंने देखा, संन्यासी के अंग-प्रत्यंग से मधुरिमा निकल-निकलकर उस निर्जन प्रदेश को मधुमय, आनन्दमय और उल्लासमय बन रही है। गोदावरी का वह शांत एकांत स्थान उस नवीन संयासी की प्रभा से प्रकाशित सा हो रहा है, संन्यासी अपने एक पैर के ऊपर दूसरे पैर को रखे हुए एकटक-भाव से रामान्द राय की ओर ही निहार रहा है, उसके चेहरे पर प्रसन्नता है, उत्सुक्ता है, उन्मत्तता है और है किसी से तन्मयता प्राप्त करने की उत्कट इच्छा। संन्यासी कुछ मुसकता रहा है और उसके बिम्बाफल के समान दोनों अरुण ओष्ठ अपने आप ही हिल जाते हैं। पता नहीं, वह अपने आप ही क्या कहने लग जाता है। राय महाशय अपने को संभाल नहीं सके। उस संन्यासी ने दूर से ही ऐसा कोई मोहिनी मन्त्र पढ़ दिया कि उसके प्रभाव से वे राजापन के अभिमान को छोड़कर पालकी की ओर जाते-जाते ही सीधे उस संन्यासी की ओर जाने लगे। अपने प्रभु को संन्यासी की ओर आते देखकर सेवक भी उनके पीछे-पीछे हो लिये।
ये नवीन संन्यासी प्रेम पारसमणि श्रीचैतन्य महाप्रभु ही हैं। महाप्रभु गोदावरी के किनारे एकान्त में स्नानादि से निवृत्त होकर यही सोच रहे थे कि राय रामानन्द से किस प्रकार भेंट हो, उसी समय उन्हें बजते हुए बाजों की ध्वनि सुनायी दी। महाप्रभु उन बाजे वालों की ओर देखने लगे। उन्होंने देखा कि बाजे वालों के पीछे एक सुन्दरी-सी पालकी में एक परम तेजस्वी पुरुष बैठा हुआ आ रहा है। उसके चारों ओर बहुत-से आदमियों की भीड़ चल रही है। बस, उसे देखते ही महाप्रभु समझ गये कि हो-न-हो, ये ही राजा रामानन्द राय हैं। जब उन्होंने देखा वह ऐश्वर्यवान महापुरुष पालकी पर न चढ़कर मेरी ही ओर आ रहा है, तब तो उनके हृदयसागर में प्रेम की हिलोरें मारने लगीं, उन्हें निश्चय हो गया क राय रामानन्द ये ही हैं। उनका हृदय राय महाशय को आलिंगन-दान देने के लिये तड़फने लगा। उनकी बार-बार इच्छा होती थी कि जल्दी से दौड़कर इस महापुरुष को गले से लगा लूँ ।
क्रमशः
Comments
Post a Comment