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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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महाप्रभु जब दक्षिण के समस्त तीर्थों में भ्रमण करते करते श्रीरंगम आ रहे थे, तब रास्ते में अक्षयवट नामक तीर्थ में ठहरे। रास्ते में महाप्रभु का जीवननिर्वाह भिक्षा पर ही होता था। किसी दिन भिक्षा मिल जाती थी, किसी दिन नहीं भी मिलती थी, कृष्णदास भट्टाचार्य प्रभु को भिक्षा बनाकर खिलाते थे। एक दिन भिक्षा का कहीं संयोग ही न लगा। तीर्थ में उपोषण का भी विधान है, अत: उस दिन महाप्रभु ने कुछ भी नहीं लिया। एक निर्जन स्थान में शिव जी के समीप वे कीर्तनानन्द में मग्न हुए-
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण हे।'
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण हे।।
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण रक्ष माम्।
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण पाहि माम्।।
इस महामन्त्र को जोर जोर से उच्चारण कर रहे थे। रास्ते के श्रम से उनके श्रीमुख पर कुछ श्रीमजन्य थकावट के चिह्न प्रतीत होते थे। उनके समस्त अंगों से एक प्रकार का तेज सा निकल रहा था।वे प्रेमानन्द में मग्न हुए उच्च स्वर से नाम संकीर्तन में मग्न थे। इतने में ही तीर्थराम नाम का एक बहुत बड़ा धनी वहाँ सहसा आ पहुँचा। उसे अपने धन का गर्व था, युवावस्था ने उसे कर्तव्यशून्य बना दिया था, यौवन के मद में वह अपने आ पहुँचा। उसे अपने धन का गर्व था, युवावस्था ने उसे कर्तव्यशून्य बना दिया था, यौवन के मद में वह अपने धर्म को तिलांजलि दे चुका था। खाना-पीना और मौज उड़ाना यही उसने अपने जीवन का ध्येय बना रखा था। सुन्दर से सुन्दर भोज्य पदार्थों को खाना और मनोरम से मनोरम ललनाओं के साथ समय बिताना यही उसने जीवन का चरम सुख समझ लिया था। उसके साथ दो अत्यन्त सुन्दरी वेश्याएँ थीं। उनमें से एक का नाम सत्याबाई और दूसरी का नाम लक्ष्मीबाई था। उनके साथ हास-परिहास करते करते वह शिवालय के समीप आ पहुँचा। वहाँ उसने अपनी कान्ति से दिशाओं को आलोकित करते हुए प्रेमावतार श्रीचैतन्य को देखा। सुवर्ण के समान शरीर का रंग था।
कमल के समान विकसित मुखारविन्द पर हठात चित्त को अपनी ओर आकर्षित करने वाली दो बड़ी-बड़ी आँखें थीं। उसकी समझ में ही नहीं आया कि इतनी अतुलनीय रूपराशि से युक्त यह पुरुष यहाँ जंगल में अकेला एक कपड़ा ओढ़े क्यों पड़ा है। अपने सन्देह को मिटाने के लिये उसने धीरे से कहा-‘कौन है।’
किन्तु महाप्रभु तो अपने कीर्तनानन्द में मग्न थे, उन्हें किसी का क्या पता। वे पूर्ववत जोरों से कीर्तन करते रहे। उसकी उत्सुकता और भी बढ़ी। उसने अब के जरा जोर से कहा- ‘आप कौन हैं और यहाँ एकान्त में क्यों पड़े हैं ?’
कृपामय श्रीचैतन्य ने अब के उसकी बात का उत्तर दिया- ‘भाई ! हम गृहत्यागी संन्यासी हैं, अपने प्यारे की तलाश में घर से निकले हैं। एकान्त ही हमारा आश्रय है, वैराग्य ही हमारा बन्धु है, संकीर्तन ही हमारा एकमात्र कर्तव्य है, इसीलिये हम यहाँ एकान्त में पड़े अपने प्यारे के नामों का उच्चारण कर रहे हैं।’ इतना कहकर महाप्रभु फिर पूर्ववत कीर्तन करने लगे।
इस उत्तर को पाकर तीर्थराम को सन्तुष्ट हो जाना चाहिये था और महाप्रभु को छोड़कर वेश्याओं के साथ अन्यत्र चले जाना चाहिये था किन्तु उसका तो प्रभु द्वारा उद्धार होता था, उसके मन में ईर्ष्या का अंकुर उत्पन्न हुआ, वह सोचने लगा- ‘यह भी कोई अजीब आदमी है, विधाता ने इसे इतना सौन्दर्य दिया है, चढ़ती जवानी है, किसी उच्च कुल का प्रतीत होता है, फिर भी ऐसी वैराग्य की बातें कर रहा हूँ। मालूम होता है इसे सत्यबाई और लक्ष्मीबाई के समान रूप-लावण्युक्त कोई ललना नहीं मिली है, यदि एक बार इसने ऐसी अनुपम सुन्दरी के दर्शन के किये होते तो वह संन्यास और वैराग्य सभी को भूल जाता।’
इन बातों को सोचते सोचते वह अपनी दोनों संगनियों से बोला- ‘मालूम होता है, इसने अभी संसार का सुख नहीं भोगा है, तभी यह ऐसी बढ़-चढ़कर बातें करता है।’ एक साथ ही दोनों जल्दी से बोल उठी- ‘अजी, चलो भी किसकी बातें करने लगे। ये सब कामदेव के दण्डित व्यक्ति हैं, जहाँ इन्होंने ललनाओं के रूप की निन्दा की, वहीं कामदेव ने खप्पर हाथ में देकर इन्हें द्वार द्वारका भिखारी बना दिया।’
तीर्थराम ने कहा- ‘नहीं, ऐसी बात नहीं। इसके चेहरे में आकर्षण है। कोई वैराग्यवान साधु मालूम पड़ता है।’ इस पर उसकी बात का प्रतिवाद करती हुई लक्ष्मीबाई बोली- ‘हाँ, बिना मिले के तो सभी त्यागी-वैरागी हैं। खाने को न मिला तो कह दिया एकादशी व्रत है। ‘नारि मुई गृह संपति नासी। मूंड़ मुड़ाइ होहिं संन्यासी।।’ मुझ-जैसी कोई इनके पल्ले पड़ जाय तब हम देखें कि कैसे त्यागी बने रहते हैं?
तीर्थराम ने उन दोनों को उत्तेजना देते हुए कहा- ‘अच्छा, देखें तुम्हारी बात। यदि इसे अपने चंगुल में फंसा लो तो जो चाहो वह इनाम तुम्हें दें।’
उन दोनों को अपने रुप-लावण्य का गर्व था। वे मत्त सिंहनी की भाँति महाप्रभु की ओर चलीं। तीर्थराम पास ही छिपकर उनकी सब बातों को देखता रहा।
महाप्रभु एक करवट से लेटे हुए श्रीकृष्ण कीर्तन कर रहे थे। गोविन्द और कृष्णदास कुछ दूरी पर थे। वे वेश्याएँ वहाँ जाकर बैठ गयीं और अपने हाव-भाव-कटाक्षों से प्रभु की अनन्यता को भंग करने की चेष्टा करने लगीं। किन्तु प्रभु को पता भी नहीं कि कौन आया है, वे अपने नशे में चूर थे, उन्हें दीन-दुनिया किसी का भी होश नहीं था। उन्हें वहाँ बैठे जब बहुत देर हो गयी तब लक्ष्मीबाई ने सम्पूर्ण साहस इकट्ठा करके कहा- ‘साधुबाबा ! मैं आपसे कुछ पूछना चाहती हूँ।’
पतितपावन प्रभु तो इसके लिये तैयार ही बैठे थे। वे जल्दी से उठ बैठे और उन पर करुणाभरी विकार नाशिनी दृष्टि डालकर बड़े ही मधुर स्वर से प्रेम के साथ बोले- ‘माता जी ! इस दीन हीन संतान के लिये क्या आज्ञा है, मैं आपकी किस आज्ञा का पालन करूँ?’ उनकी दृष्टि में और उनके इन शब्दों में पता नहीं क्या जादू था। वे दोनों अवाक रह गयीं। काटो तो बदन में लोहू नहीं! उनकी वाणी बंद हो गयी, धैर्य छूट गया और पश्चात्ताप की अग्नि ने उनके हृदय में एक प्रकार की ज्वाला पैदा कर दी। वे आत्मग्लानि से अभिभूत होकर जल्दी से वहाँ से उठ खड़ी हुईं।
क्रमशः
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