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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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श्रीभगवन्नाम-संकीर्तन में अनन्त शक्ति है।’ यह कहकर महाप्रभु स्वयं अपने दोनों बाहुओं को उठाकर उच्च स्वर से हरि-नाम-संकीर्तन करने लगे। उस समय प्रेम के भावावेश में उनके दोनों नेत्रों से अश्रुओं की धारा बह रही थी, शरीर के रोम खड़े हुए थे, रोमकूपों में से पसीना फब्बारे की तरह निकल रहा था। उनकी ऐसी दशा देखकर सभी देव दासियाँ अपने नारी-सुलभ कमनीय कण्ठ से-
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।।
इस महामन्त्र का उच्च स्वर में कीर्तन करने लगीं। सम्पूर्ण देवालय महामन्त्र की ध्वनि से गूँजने लगा। उस संकीर्तन की बा़ढ़ में उन देव दासियों के समस्त पाप धुलकर बह गये, वे भगवन्नाम के प्रभाव से निष्पाप बन गयीं। उनमें से जो प्रधान देव-दासी थी, उसका नाम इन्दिरा था, वह आकर प्रभु के चरणों में गिर पड़ी और अत्यन्त ही दीनभाव से कहने लगीं- ‘प्रभो! व्यभिचार करते करते मेरी यह अवस्था हो गयी। अब ऐसी कृपा कीजिये कि श्रीहरि के चरणों में भक्ति हो।’ प्रभु ने उसे धैर्य बंधाते हुए कहा-‘देवि ! श्रीकृष्ण दयामय हैं, वे दीनों पर अत्यन्त ही शीघ्र कृपा करते हैं। तुम उनका ही भजन करो, उन्हीं के शरण में जाओ, तुम्हारा कल्याण होगा।’
प्रभु की आज्ञा शिरोधार्य करके उसने अपना सर्वस्व दीन-हीन गरीबों को बाँट दिया और स्वयं भिखारिणी का वेष बनाकर मन्दिर के द्वार पर भिक्षान्न से निर्वाह करती हुई, अहर्निश श्रीकृष्ण-कीर्तन में मग्न रहने लगी। और भी कई देव दासियों ने उसके पथ का अनुसरण किया।
नौरो जी डाकू का उद्धार…..
प्रेम में न भय है, न द्वेष। जिसने प्रेम का प्याला पी लिया है, उसे संसार में सर्वत्र उसी एक परम प्रेमास्पद प्रभु का ही रूप दिखायी देता है, जब सभी अपने प्रेमास्पद हैं तो भय किसका। भय तो दूसरे से होता है। अपने-आपसे किसी को भय नहीं। द्वेष गैर से किया जाता है, जब सभी श्यामसुन्दर के हैं तब द्वेष किससे करें और क्यों करें? महाप्रभु गौरांगदेव इस प्रकार खाण्डवादेव में देव दासियों को श्रीकृष्ण-कीर्तन का उपदेश देकर आगे को चले। वहाँ से थोड़ी दूर पर एक चोरानन्दी वन था, इस वन में बहुत से डाकू बसते थे। उन सब डाकूओं का दलपति नौरोजी डाकू था, वह बड़ा ही क्रूर और हिसंक था। सभी लोग उसके नाम से थर्राते थे। उस प्रदेश में उसके नाम का आतंक था।जब प्रभु ने उस वन में प्रवेश करने का विचार किया तो लोगों ने उन्हें वहाँ जाने से मना किया और कहा कि ‘वे डाकू बड़े हिंसक हैं, आप का उधर से जाना ठीक नहीं है।’ किन्तु महाप्रभु उनकी बात को क्यों मानने लगे। उन्होंने कहा-‘भाई, डाकू लोग तो रुपये-पैसे के लिये लोगों को मारते हैं। हम घर घर के भिखारी संन्यासी हैं, हमें मारकर वे क्या लेंगे? वे यदि हमारी जान ही लेना चाहते हों तो भले ही ले लें। इस शरीर से यदि किसी का भी काम चल जाय तो बड़ा उत्तम है।’ ऐसा कहकर प्रभु उस वन में घुस गये। वहाँ एक वृक्ष के नीचे प्रभु पड़ रहे और शनै: शनै: सुमधुर हरि नाम संकीर्तन करने लगे। दलपति नौरोजी ने सुना कि कोई संन्यासी यहाँ हमारे जंगल में आया है, वह अपने दल के अनेक पुरुषों के साथ प्रभु के पास आया और प्रभु को भोजन के लिये निमन्त्रित किया तथा अपने स्थान पर चलने का आग्रह किया। प्रभु ने कहा- ‘हम तो संन्यासी हैं, वृक्षतले ही हमारा आसन ठीक है, रही भोजन की बात, भिक्षा ही हमारा एकमात्र आधार है, आप जो भिक्षा ले आवेंगे उसे हम सहर्ष स्वीकार करेंगे।’
प्रभु की ऐसी आज्ञा पाकर उसने अपने दल के आदमियों को आज्ञा दी; वे बात की बात में भाँति-भाँति की खाने की सामग्री ले आये। महाप्रभु श्रीकृष्ण प्रेम में विभोर थे, उन्हें शरीर का ज्ञान ही नहीं था, वे प्रेम में गदगद कण्ठ से उन्मत्त की तरह कीर्तन कर रहे थे, कभी कभी नाचने भी लगते थे। नौराजी अपने दल बल सहित प्रभु को घेरे बैठा था।महाप्रभु के इस अभूतपूर्व अलौकिक प्रभु प्रेम को देखकर उसका भी पत्थर जैसा हृदय पसीज गया। उसने जीवनभर लोगों की हिंसा की थी और डाके ही डाले थे। इस समय उसकी अवस्था साठ वर्ष के लगभग थी। महाप्रभु के अलौकिक प्रेम ने उस साठ वर्ष के बूढ़े डाकू के ऊपर भी अपना जादू डाल दिया। वह धीरे धीरे प्रभु के पादपपद्मों को पकड़कर कहने लगा- ‘स्वामी जी ! आप यह कौन सा मन्त्र उच्चारण कर रहे हैं, मुझे भी इस मन्त्र का उपदेश दीजिये। पता नहीं आपने मेरे ऊपर क्या जादू डाल दिया है कि अब मेरा मन हिंसा और डकैती से बिलकुल हट गया है। अब मैं भी आपके चरणों की शरण में रहकर निरन्तर श्रीकृष्ण-कीर्तन करना चाहता हूँ। आप मुझे इस मन्त्र का उपदेश दीजिये। भगवन ! मेरा जन्म वैसे तो ब्राह्मण-वंश में ही हुआ है। किन्तु बाल्यकाल से ही मैंने हिंसा और डकैती का काम किया है, आज तक कभी भी मेरे मन में इन कामों से वैराग्य नहीं हुआ, किन्तु न जाने आज आपके दर्शन से मुझे क्या हो गया कि अब कुछ अच्छा ही नहीं लगता। अब मैं आपके चरणों को नहीं छोडूँगा! आप मुझे अपनी पदधूलि प्रदान करके कृतार्थ कीजिये और जिस मन्त्र के संकीर्तन से आप इतने आनन्दमग्न हो रहे हैं उसका उपदेश मुझे भी कीजिये।’
प्रभु ने उसकी ऐसी आर्तवाणी सुनकर कहा- ‘नौराजी ! तुम बड़े ही भाग्यशाली हो, जो इस वृद्धावस्था में तुमको निर्वेद हुआ। श्रीकृष्ण कीर्तन ही संसार में सार है। ये धन रत्न तो सभी नश्वर और क्षणभंगुर हैं। तुम घबड़ाओ मत, भगवान तो प्रतिज्ञापूर्वक कहते हैं कि चाहे कोई कितना भी बड़ा दुराचारी क्यों न हो, यदि वह अनन्यभाव से मुझे भजता है, तो उसे साधु ही मानना चाहिये। दयालु श्री हरि ने तुम्हारे ऊपर परम कृपा की जो तुम्हें सदबुद्धि प्रदान की, अब तुम निरन्तर हरि नाम कीर्तन ही किया करो।’ ऐसा उपदेश करके प्रभु ने उसे महामन्त्र की दीक्षा दी।
प्रात:काल उठकर प्रभु ने चलने को तैयार हुए तो नौराजी ने भी अपने सभी अस्त्र-शस्त्र फेंक दिये।
क्रमशः
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