249

श्री श्री चैतन्य चरितावली 
249

लक्ष्मी जी की दासियों ने जगन्नाथजी के सेवको को बाँधकर उन्‍हें लक्ष्‍मी जी के सम्‍मुख उपस्थित किया। दासियाँ उन सेवकों को मारती भी जाती थीं। महाप्रभु ने स्‍वरूपदामोदर से पूछा- ‘स्‍वरूप ! यह क्‍या बात है, लक्ष्‍मी जी इतनी कुपित क्‍यों हैं?’
स्‍वरूपदामोदर ने कहा- ‘प्रभो ! क्रोध की बात है। अपने प्राणप्‍यारे से पृथक होने पर किसे अपार दु:ख न होगा।’
महाप्रभु ने पूछा-‘मैं यह जानना चाहता हूँ कि भगवान अकेले ही चुपके से चोर की भाँति वृन्‍दावन क्‍यों चले गये, लक्ष्‍मी जी को वे साथ क्‍यों नहीं ले गये?’
स्‍वरूपदामोदर ने कहा- ‘प्रभो ! रासलीला में व्रज की गोपिकाओं का ही अधिकार है, लक्ष्‍मी जी के भाग्‍य में यह सौभाग्‍य सुख नहीं है।’

पुरी में भक्‍तों के साथ आनन्‍द विहार…

इस प्रकार महाप्रभु जी इसी सम्बंध में श्रीवास पण्डित तथा स्वरूपदामोदर से बहुत देर तक बातें करते रहे। श्रीवास पण्डित लक्ष्‍मीजी का पक्ष लेकर स्‍वरूपदामोदर की बातों का चातुरीपूर्वक खण्‍डन करते थे। इस प्रकार यह प्रेमयुक्‍त विवाद कुछ देर और चलता रहा। इतने में ही सेवकों के यह वचन देने पर कि हम आपके स्‍वामी को शीघ्र ही लाकर आपसे भेंट करा देंगे, लक्ष्‍मी जी ने उनके बन्‍धन खुलवा दिये और वे अपने स्‍थान को लौट आयीं। महाप्रभु जी भी लक्ष्‍मीजी का प्रसाद लेकर सुन्‍दराचल लौट आये। वहाँ भक्‍तों के सहित उन्‍होंने सन्‍ध्‍या-आरती के दर्शन किये और बहुत रात्रि तक संकीर्तन होता रहा।
आठ दिनों तक महाप्रभु सुन्‍दराचल में भक्‍तों के साथ आनन्‍द-विहार करते रहे। वे नित्‍य प्रति इन्‍द्रद्युम्‍न-सरोवर में भक्‍तों के साथ जल क्रीड़ा करते। कोई किसी के ऊपर जल उलीच रहा है, तो कोई किसी के ऊपर सवारी ही कर रहा है। झुंड-के-झुंड भक्‍त टोली बना बनाकर एक दूसरे के ऊपर जल की वर्षा करते, फुहारे छोड़ते और डुबकी लगाकर एक दूसरे के पैर पकड़ते। फिर दो दो मिलकर परस्‍पर में जल युद्ध करते।

गौड़ीय भक्‍तो के सहित सार्वभौम भट्टाचार्य, राय रामानन्‍द, गोपीनाथाचार्य तथा और भी राज्‍य के बहुत से प्रतिष्ठित पुरुष प्रभु की जल क्रीडा में सम्मिलित होते। राय महाशय और सार्वभौम का जोड़ तोड़ था। वे परस्‍पर विविध प्रकार से जलयुद्ध करते। महाप्रभु इन दोनों के कुतूहल को देखकर एक ओर खड़े खड़े हंसते रहते। कभी कभी गोपीनाथाचार्य से कहते- ‘आचार्य ! आप इन दोनों को बरजते क्‍यों नहीं। इस तरह बच्‍चों की तरह क्रीडा करते देखकर लोग इन्‍हें क्‍या कहेंगे, ये दोनों ही महान प्रतिष्ठित और सम्‍मानिय पुरुष हैं।’
आचार्य हंसकर कहते- ‘जब आपका इन दोनों के ऊपर इतना असीम अनुग्रह है, तब ये क्‍या सदा अपने बड़प्‍पन को साथ ही बाँध फिरेंगे? यह सब आपकी कृपा का ही फल है।’

आचार्य सार्वभौम जोरों से जल उलीचते हुए कहा हैं- ‘हरिरसमदिरामदेन मत्ता भुवि विलुठाम नटाम निर्विशाम’ हम पागल हो गये हैं पागल!’ इतने में प्रभु उन्‍हें नीच करके उनके ऊपर सवार हो जाते, वे भी शेषनाग की तरह प्रभु को अपने शरीर पर शयन करा लेते। इस प्रकार यह आनन्‍द प्राय: रोज ही होता था। शाम को महाप्रभु आई टोटा बाग में नित्‍य प्रति श्रीकृष्‍णलीलाओं का अभिनय करते, जिससे भक्‍तों को अत्‍यन्‍त ही सुख मिलता। इस प्रकार आनन्‍द विहार करते करते आठ दिन बात-की-बात में निकल गये, किसी को पता ही न होगा कि कब हम सुन्‍दराचल आये और कब आठ दिन व्‍यतीत हो गये! सुख का समय इसी प्रकार सहज ही बीत जाता है।आठ दिनों तक आनन्‍द के साथ निवास करने के अनन्‍तर अब जगन्नाथ की ‘उलटी रथ यात्रा’ का समय आया। भगवान अब सुन्‍दराचल को छोड़कर नीलाचल पधारेंगे। इसलिये सेवकवृन्‍द भगवान को रथ पर चढ़ाने का प्रयत्‍न करने लगे। भगवान को दयितागण पट्टडोरियों में बाँधकर रथ पर चढ़ाते हैं। उस समय भगवान को रथ पर चढ़ाते समय उनकी एक ‘पट्टडोरी’ टूट गयी। इस पर प्रभु को बड़ा दु:ख हुआ और कुलीन ग्राम निवासी श्रीरामानन्‍द और सत्‍यराज खाँसे आप कहने लगे- ‘आप लोग समर्थ हो, धनी हो। धन का सर्वोत्तम उपयोग यही है कि वह भगवान की सेवा-पूजा मे व्‍यय हो। इस काम को आप अपने जिम्‍मे ले लें। प्रतिवर्ष अपने यहाँ से भगवान की सुन्‍दर सी मजबूत पट्टडोरी बनाकर रथोत्‍सव के समय साथ लाया करें।’

इन दोनों धनी भक्‍तों ने प्रभु की इस आज्ञा को शिरोधार्य किया और अपने भाग्‍य की सराहना की। उसके दूसरे साल से वे प्रतिवर्ष भगवान को पट्टाडोरी बनवाकर अपने साथ लाते थे।

भगवान की ‘पाण्‍डुविजय’ अर्थात रथारोहणपूजा हो जाने पर रथ श्रीजगन्‍नाथ जी की ओर चला, महाप्रभु भी भक्‍तों के सहित संकीर्तन करते हुए रथ के आगे-आगे चले। भगवान के मन्दिर में विराजमान होने पर और उनके दर्शन करके महाप्रभु अपने स्‍थान पर आ गये और भक्‍तों के सहित प्रसाद पाकर उन्‍होंने विश्राम किया।
गौड़ीय भक्‍त बारी बारी से नित्‍यप्रति प्रभु को अपने यहाँ भिक्षा कराते थे। महाप्रभु भी प्रेम के साथ सभी भक्‍तों के यहाँ भिक्षा करते और उनसे घर द्वार, कुटुम्‍ब परिवार के सम्‍बन्‍ध में विविध प्रकार के प्रश्‍न पूछते। इसी प्रकार श्रावण बीतने पर जन्‍माष्‍टमी आयी। महाप्रभु ने भक्‍तों के सहित धूम धाम से जन्‍माष्‍टमी का महोत्‍सव मनाया। नन्‍दोत्‍सव के दिन अपने गौड़ीय भक्‍तरुपी ग्‍वालबालों को साथ लेकर नन्‍दोत्‍सव लीला की। उसमें उत्‍कल देशीय भक्‍त तथा मन्दिर के कर्मचारी भी सम्मिलित थे। कानाई खूटिया और जगन्‍नाथ माइति क्रमश: नन्‍द-यशोदा बने। महाप्रभु स्‍वयं युवक गोप के वेश में लाठी हाथ में लेकर नृत्‍य करने लगे। महाप्रभु की लाठी फिराने की चातुरी को देखकर सभी दर्शक विस्मित हो गये। महाराज प्रतापरुद्र जी ने उस समय प्रभु की भावावेशावस्‍था में ही उनके सिर पर एक बहुमुल्‍य वस्‍त्र और जगन्‍नाथ जी का प्रसाद बांध दिया।

प्रभु के सभी साथी ग्‍वाल-बाल किलकारियाँ मारकर नृत्‍य करने लगे। जो भक्‍त नन्‍द यशोदा बने थे, उन्‍होंने सचमुच अपने अपने घरों में घुसकर अपना सब धन ब्राह्मण तथा अभ्‍यागतों को लुटा दिया, इससे महाप्रभु को परम प्रसन्‍नता हुई। इस प्रकार उस दिन की वह लीला बड़े ही आनन्‍द के साथ समाप्‍त हुई। जन्‍माष्‍टमी बीतने पर विजयादशमी का उत्‍सव आया। उसमें महाप्रभु स्‍वयं महावीर हनुमान बने और भक्‍तों को रीछ वानर बनाकर रावण पर विजय लाभ करने चले। महाप्रभु के सहवास का समय किसी को मालूम न पड़ा कि वह कब समाप्‍त हो गया। सभी अपने अपने घर तथा परिवार वालों को एकदम भूल गये थे।क्रमशः

Comments

Popular posts from this blog

cc 201

362

cc 90