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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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उन सबका चित्त श्रीजगन्नाथ जी में तथा महाप्रभु के चरणों में लगा रहता था। अब महाप्रभु ने भक्तों को अपने अपने घर लौट आने की आज्ञा दी। इस बात को सुनते ही मानो छोटे छोटे कोमल वृक्षों पर तुषार गिर पड़ा हो, उसी प्रकार का दु:ख उन सब भक्तों को हुआ।
भक्तों की विदाई…
भक्तों की विदाई का समय समीप आ गया। महाप्रभु अत्यन्त ही स्नेह से, बड़े ही ममत्व से सभी भक्तों से पृथक पृथक एकान्त में मिलने लगे। उनसे उनके मन की बात पूछते, आप अपने मन की बात बताते, उनका आलिंगन करते, उनके हाथ से थोड़ा प्रसाद पा लेते, स्वयं उन्हें अपने हाथ से प्रसाद देते, इस प्रकार भाँति-भाँति से प्रेम प्रदर्शित करके वे सभी भक्तों को सन्तुष्ट करने लगे। सभी भक्तों को यह अनुभव होने लगा कि महाप्रभु जितना अधिक स्नेह हमसे करते हैं, उतना शायद ही किसी दूसरे से करते हों। सभी को इस बात का गर्व सा था कि प्रभु का सर्वापेक्षा हमारे ही ऊपर अत्यधिक अनुराग है। यही तो उनकी महत्ता थी। जिस समय सभी प्राणियों में आत्मभावना हो जाती है, जब सभी अपने प्यारे के स्वरूप दीखने लगते हैं, तब सबको ही हृदय से चिपटा लेने की इच्छा होती है। सभी हृदयवान भावुक भक्त उसे हृदय से प्यार करने लगते हैं, सभी उसे अपना ही आत्मा समझते हैं। उस अवस्था में मोह कहाँ? शोक कैसा? सर्वत्र आनन्द ही आनन्द! जिधर देखो उधर ही शुद्ध प्रेम ही दिखायी पड़ता है। प्रेम में संदेह, ईर्ष्या, डाह और किसी को छोटे समझने के भाव ही नहीं रहते। ऐसे महापुरुष के संसर्ग में रहकर सभी मनुष्य अपनी खोटी वृत्तियों को भुला देते हैं और वे सदा प्रेमासव में छके से रहते हैं।
सबसे पहले प्रभु ने नित्यानन्द जी को बुलाया और उनसे एकान्त में बहुत देर तक बातें करते रहे और उन्हें गौड़-देश में जाकर भगवन्नाम प्रचार करने के लिये राजी किया। आपने उन्हें आज्ञा दी-‘गौड़ देश में जाकर ब्राह्मण से लेकर चाण्डालपर्यन्त सभी को भगवन्नाम का उपदेश करो। ये रामदास, गदाधर आदि बहुत से भक्त तुम्हारे काम में योगदान देंगे। मंगलमय भगवान तुम्हारा कल्याण करें, मैं भी तुम्हें गुप्तरूप से सदा तुम्हारे साथ ही रहूँगा।’ फिर आपने अद्वैताचार्य से कहा- ‘आचार्य ! आप ही हम सब लोगों के श्रेष्ठ, मान्य, गुरु, पूज्य और अग्रणी हैं। आप ऐसा उद्योग सदा करते रहें कि भक्तवृन्द संकीर्तन से विमुख न हो जायँ, इन्हें आप संकीर्तन के लिये सदा प्रोत्साहित करते रहियेगा।’ इसके अनन्तर श्रीवास पण्डित की बारी आयी। प्रभु ने उनसे कहा- ‘पण्डित जी ! आपके ऋण से तो हम कभी उऋण ही नहीं हो सकते। आपने तो हमें सचमुच खरीद लिया है, इसलिये आपके आंगन में जब भी संकीर्तन होगा, उसमें सदा हम गुप्तभाव से अवस्थित रहेंगे और सदा आपके आंगन में नृत्य करते रहेंगे।’
फिर अपने आँखों में आँसू भरकर कहा- ‘पण्डित जी ! उन पूजनीया दु:खिता वृद्धा माता के चरणों में हमारा बार बार प्रणाम कहियेगा। हमने बड़ा भारी अपराध किया है, जो उन्हें अकेली छोड़कर चले आये हैं। हमारी ओर से आप माता से क्षमा-याचना करें और माता से कह दें कि हम सदा उनके बनाये हुए नैवेद्य का भोजन करते हैं। त्योहारों के दिन जब वे हमारी स्मृति करके रोती हैं, तब हम वहाँ जाकर उनके बनाये हुए पदार्थों को खाते हैं। आप उन्हें सान्त्वना प्रदान करें और हमारे शरीर का कुशल-समाचार उन्हें बतावें। हम शीघ्र ही आकर उनके श्रीचरणों का दर्शन करना भगवान का प्रसादान्न माता के लिये दिया। श्रीवास पण्डित ने उन दोनों वस्तुओं को यत्नपूर्वक बाँध लिया।
फिर आपने उदारमना परमभागवत श्रीशिवानन्द सेनजी से बड़े ही स्नेह के स्वर में कहा- ‘सेन महाशय ! आप गृहस्थ होकर भी गृह की कुछ परवा नहीं करते, यह ठीक नहीं। साधु सेवा करनी चाहिये, किन्तु थोड़ा बहुत घर का भी ध्यान रखा करें। जो आता है उसे ही आप उसी समय उड़ा देते हैं। गृहस्थी के लिये थोड़ा धन संचय करने की भी आवश्यकता है।
इसके अनन्तर कुलीन ग्रामवासी रामानन्द तथा सत्यराज खाँको फिर स्मरण दिलाते हुए कहा- ‘प्रतिवर्ष भगवान की सुन्दर सी मजबूत पट्टीडोरी बनाकर लाया करें। प्रतिवर्ष रथयात्रा में भक्तों के सहित सम्मिलित होनी चाहिये।’
फिर आप मालाघर वसु (गुनराज खाँ) की ओर देखकर कहने लगे- ‘वसु महाशय की प्रतिभा का तो कहना ही क्या? बड़े ही सुन्दर कवि हैं। मैंने इनका रचित ‘श्रीकृष्णविजय’ काव्य सुना। वैसे तो सम्पूर्ण काव्य सुन्दर है, किन्तु उसका एक पद तो बड़ा ही सुन्दर लगा। ‘नन्दनन्दन कृष्ण मोर प्राणनाथ!’ अहा, कितना सुन्दर पद है?’ पास बैठे हुए स्वरूपदामोदर से पूछने लगे- ‘यह पूरा पद कैसे है?’
स्वरुपदामोदर धीरे धीरे लय के साथ कहने लगे- ‘एकभावे वन्द हरि जोड़ करि हात। नन्दनन्दन कृष्ण मोर प्राणनाथ।।’
कुछ देर ठहरकर प्रभु कहने लगे- ‘कुलीनग्राम की तो कुछ बात ही दूसरी है, वहाँ के तो सभी पुरुष भक्त हैं। सभी लोगों के सुख से हरिनाम-संकीर्तन की सुमधुर ध्वनि सुनायी देती है, इसलिये उस गाँव का तो कुत्ता भी मेरे लिये वन्दनीय है!’ प्रभु के ऐसा कहने पर कुलीन ग्रामवासी रामानन्द और सत्यराज खाँ आदि वैष्णवों ने लज्जा के कारण सिर नीचा किये हुए ही धीरे धीरे पूछा- ‘प्रभो ! हम गृहस्थों का भी किसी प्रकार उद्धार हो सकता है? हमारा क्या कर्तव्य है, इसे हम जानना चाहते हैं?’
महाप्रभु ने कहा- ‘आप सब जानते हैं, आपसे छिपी ही कौन सी बात है, गृहस्थी में रहकर भजन पूजन कभी हो सकता है। गृहस्थी के लिये तीन ही बात मुख्य हैं- श्रद्धापूर्वक भगवानकी सेवा पूजा करता रहे, मुख से श्रीहरि के मधुर नामों का संकीर्तन करता रहे और अपने द्वार पर जो आ जाय उसकी यथाशक्ति सेवा करे तथा वैष्णव और साधु महात्माओं के चरणों में श्रद्धा रखे।’
सत्यराज ने पूछा- ‘प्रभो! वैष्णव की क्या पहचान है?’
महाप्रभु ने कहा- ‘जिसके मुख में से एक बार भी श्रीकृष्ण का नाम निकल जाय वही वैष्णव है, वैष्णव की यही एक मोटी पहचान है।’
कुलीनग्रामवासियों को सन्तुष्ट करके प्रभु खण्डग्रामवासियों की ओर देखने लगे। उनमें मुकुन्द दत्त, रघुनन्दन ये दोनों पितापुत्र और नरहरि ये ही तीन मुख्य जन थे। मुकुन्ददत्त के पुत्र रघुनन्दनजी थे। असल में रघुनन्द जी ही भगवदभक्त थे, पुत्र के संग से पिता को भक्तिलाभ हुई थी।
क्रमशः
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