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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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इसी बात को सोचकर हंसते हुए प्रभु ने उनसे जिज्ञासा कि- ‘भाई ! मैं यह जानना चाहता हूँ कि तुम लोगों में कौन पिता है और कौन पुत्र है?’
प्रभु के ऐसे प्रश्न को सुनकर गम्भीर वाणी में अमानी मुकुन्ददत्त कहने लगे- ‘प्रभो ! यथार्थ में पिता तो रघुनन्दन ही हैं। इस शरीर के सम्बन्ध से मैं इनका पिता भले ही होऊँ, किन्तु मुझे श्रीकृष्ण- भक्ति तो इन्हीं से प्राप्त हुई है। इन्हीं के अनुग्रह से मेरा पुनर्जन्म हुआ है, इसलिये सच्चे तो पिता ये ही है।’
महाप्रभु श्रीमुकुन्ददत्त के ऐसे उत्तर को सुनकर अत्यन्त ही सन्तुष्ट हुए और कहने लगे- ‘मुकुन्द ! आपने यह उत्तर अपने शील स्वभाव के अनुरूप ही दिया है। भगवद्भक्त को भक्ति प्रदान करने वाले महापुरुष में ऐसी ही भावना रखनी चाहिये। फिर चाहे वह अवस्था में, सम्बन्ध में, कुल में, जाति में, विद्या अथवा मान में अपने से छोटा ही क्यों न हो’ इतना कहकर महाप्रभु सभी भक्तों को सुनाकर मुकुन्ददत्त की भक्ति के सम्बन्ध में एक कथा कहने लगे- ‘मुकुन्द की प्रशंसा करने के अनन्तर प्रभु ने कहा- ‘इनकी कृष्णभक्ति बड़ी ही अपूर्व है। इनके वंशज सदा से राजवैद्यपने का कार्य करते आये हैं। ये भी मुसलमान बादशाह के वैद्य हैं। एक दिन ये बादशाह के समीप बैठे थे कि इतने में ही एक नौकर मयूरपिच्छ का पंखा लेकर बादशाह को वायु करने के लिये आया। मोरपंख के दर्शनों से ही इन्हें भगवान के मुकुट का स्मरण हो उठा और ये प्रेम में बेसुध होकर वहीं मूर्च्छित होकर गिर पड़े। बादशाह को बड़ा विस्मय हुआ। तब उसने इनका विविध भाँति से उपचार कराया, होश में आने पर खेद प्रकट करते हुए बादशाह ने कहा- ‘आपको बड़ा कष्ट हुआ होगा?’
इन्होंने अन्यमनस्कभाव से कहा- ‘नहीं महाराज ! मुझे कुछ कष्ट नहीं हुआ।’
तब बादशाह ने पूछा- ‘आपको यकायक यह हो क्या गया?’
इन्होंने अपने भाव को छिपाते हुए कहा- ‘मुझे मृगी का रोग है, सहसा उसका दौरा हो उठा था।’ बादशाह सब समझ तो गया, किन्तु उसने कुछ कहा नहीं। उसी दिन से वह इनका बहुत अधिक आदर करने लगा।
प्रभु के मुख से अपनी ऐसी प्रशंसा सुनकर मुकुन्द कुछ लज्जित से हो गये। तब प्रभु ने उनसे कहा- ‘आप भले ही खूब रुपये पैदा करें, किन्तु रघुनन्दन को सदा कृष्ण-भजन में ही लगे रहने दें। यह तो जन्म से ही भक्त हैं। घोर शीतकाल में यह पुष्करिणी में स्नान करके कदम्ब के फूलों से भगवान की पूजा किया करते थे। यह आपके सम्पूर्ण कुल को तार देंगे।’ इसके अनन्तर महाप्रभु ने मुरारी गुप्त को रामोपासना ही करते रहने का उपदेश किया और सभी भक्तों को उनकी दृढ़ रामनिष्ठा की कहानी कहकर सुनायी। फिर सार्वभौम तथा विद्यावाचस्पति दोनों को कृष्ण-भक्ति करने के लिये कहा।
फिर महाप्रभु वासुदेव दत्त की ओर देखकर कहने लगे- ‘यदि ऐसे भक्त दस बीस भी हों तो संसार का उद्धार हो जाय।’ प्रभु के मुख से अपनी प्रशंसा सुनकर वासुदेव दत्त ने लज्जित होकर अत्यन्त ही दीनभाव से कहा- ‘प्रभो ! मैं आपके चरणों में एक प्रार्थना करना चाहता हूँ। आप तो दयालु हैं। इन जीवों को दु:खी देखकर मेरा हृदय फट जाता है। प्रभो ! मेरी यही प्रार्थना है कि सम्पूर्ण जीवों का पाप मेरे शरीर में आ जाय और सभी के बदले का दु:ख मैं अकेला ही भोग लूँ। यही मेरी हार्दिक इच्छा है, ऐसा ही आप आशीर्वाद दें, आप सब कुछ करने में समर्थ हैं।’
प्रभु उनके इस भूतदया के भाव से अत्यन्त ही सन्तुष्ट हुए। सभी भक्त चलने के लिये उद्यत हुए। मुकुन्द प्रभु के समीप ही रहना चाहते थे इसलिये प्रभु ने उन्हें यमेश्वर में टोटा गोपीनाथ की सेवा करने की आज्ञा प्रदान की। वे वहीं क्षेत्रसंन्यास लेकर सेवा पूजा और कृष्ण कीर्तन करने लगे।
भक्त महाप्रभु को छोड़ना ही नहीं चाहते थे। उनके दिल धड़क रहे थे और वे विवश होकर जाने के लिये तैयार हो रहे थे। महाप्रभु के नेत्रो में जल भरा हुआ था। भक्तगण उच्चस्वर में रुदन कर रहे थे। महाप्रभु सबका अलग अलग आलिंगन करते थे। भक्त उनके पैरों में लोट-लोटकर अपने विरह दु:ख को कुछ कम करते थे। जैसे तैसे अत्यन्त ही दु:ख के साथ भक्तवृन्द गौड़देश के लिये चले। महाप्रभु दूर तक उन्हें पहुँचाने गये। भक्तों को विदा करके प्रभु लौटकर अपने स्थान पर आ गये और पुरी, भारती जगदानन्द, स्वरूपदामोदर, दामोदर पण्डित, काशीश्वर और गोविन्द के साथ आप सुखपूर्वक निवास करने लगे। कुछ गौड़ीय भक्त थोड़े दिनों के लिये प्रभु के पास और ठहर गये थे। उन्हें नित्यानन्द जी के साथ प्रभु ने भगवन्नाम के प्रचारार्थ गौड़-देश में पीछे से भेजा था।
सार्वभौमके घर भिक्षा और अमोघ-उद्धार…
गौड़ीय भक्तों के चले जाने के अनन्तर सार्वभौम भट्टाचार्य ने प्रभु के समीप आकर निवेदन किया- 'प्रभो! अब तक तो मैंने भक्तों के कारण कहने में संकोच किया, किन्तु अब तो भक्त चले गये। अब मैं एक प्रार्थना करना चाहता हूँ, उसे आपको स्वीकार करना होगा। 'प्रभु ने कुछ प्रेमपूर्वक व्यंग करते हुए कहा- 'सब बातों को पहले ही स्वीकार करा लिया करें, तब बताया करें यह भी कोई बात हुई, बताइये क्या बात है, जो मानने योग्य होगी तो मान लूँगा और न मानने योग्य होगी तो 'न' कर दूँगा।' भट्टाचार्य ने कहा- 'नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है। मानने तो योग्य है।'
प्रभु ने जल्दी से कहा- 'जब पहले से ही मालूम है कि बात मानने योग्य है, तब संदेह ही क्यों किया? अच्छा, खैर सुनूँ भी तो कौन-सी बात है ?'
कुछ सोचते-सोचते धीरे-धीरे भट्टाचार्य सार्वभौम ने कहा- 'मेरी भी इच्छा है और षाठी (भट्टाचार्य की छोटी पुत्री) की माता भी बहुत दिनों से पीछे पड़ रही है कि प्रभु को कुछ काल तक निरन्तर ही अपने घर लाकर भिक्षा करायी जाय। आप अधिक दिनों तो हमारी भिक्षा स्वीकार ही क्यों करेंगे, किन्तु कम-से-कम एक मासपर्यन्त तो अपनी चरण-धूलि से हमारे नये घर को पवित्र बनाइये ही। यही मेरी प्रार्थना है।'
प्रभु ने जोरों से हंसते हुए कहा- 'आप तो कहते थे, मानने योग्य बात है। इस बात को भला कोई संन्यासी स्वीकार कर सकता है कि एक महीने तक निरन्तर एक ही आदमी के यहाँ भिक्षा करता रहे।
क्रमशः
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