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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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संन्यासी के लिये तो घर-घर से मधुकारी मांगकर उदरपूर्ति करने का विधान है।'
भट्टाचार्य ने कहा- 'प्रभो! इन सब बातों को रहने दीजिये। आप इस प्रार्थना को स्वीकार करके हमारी तथा हमारे सब परिवार की इच्छापूर्ति कीजिये।'
प्रभु ने आश्चर्य-सा प्रकट करते हुए कहा- 'आचार्य! आप भी जब ऐसे धर्मविरुद्ध काम के लिये मुझे विवश करेंगे, तो फिर मूर्ख भक्तों की तो बात ही अलग रही। एक-दो दिन कहें तो भिक्षा कर भी लूँ।' अन्त में पांच दिन की भिक्षा बहुत वाद-विवाद के पश्चात् निश्चित हुई। भट्टाचार्य प्रभु को एकान्त में ही भोजन कराना चाहते थे। इसलिये प्रभु के साथी अन्य साधु-महात्माओं को दूसरे-दूसरे दिनों के लिये निमन्त्रित किया।नियत समय पर महाप्रभु भट्टाचार्य के घर भिक्षा करने के लिए पहुँचे। भट्टाचार्य के चंदनेश्वर नाम का एक लड़का और षाठी नाम की लड़की थी। षाठी के पति अमोघ भट्टाचार्य सार्वभौम के ही पास रहते थे। वे महाशय बड़े ही अश्रद्धालु और नास्तिक प्रकृति के पुरुष थे। इसलिए सार्वभौम ही भिक्षा के समय उन्हें किसी काम से बहार भेज दिया था। महाप्रभु को एकांत में बिठाकर सार्वभौम उन्हें भिक्षा कराने लगे। सार्वभौम की गृहिणी ने अनेक प्रकार की भोज्यसामग्रियाँ प्रभु की भिक्षा के निमित्त बनायी थीं। बीसों प्रकार के साग, अनेकों प्रकार के खट्टे-मीठे अचार तथा मुरब्बे थे। कई प्रकार के चावल, नाना प्रकार की मिठाइयाँ तथा और भी पचासों प्रकार की वस्तुएँ थीं। कुछ तो षाठी की माता ने घर में ही तैयार की थीं, कुछ भगवान के प्रसाद की वस्तुएँ मन्दिर से मँगवा ली थीं। सार्वभौम ने पचासों पात्रों में पृथक्-पृथक् वे पदार्थ प्रभु के सामने परोसे। महाप्रभु उन इतने पदार्थों को देखकर बड़े ही प्रसन्न हुए और आश्चर्य तथा प्रसन्नता प्रकट करते हुए कहने लगे- ‘महान आश्चर्य की बात है। चन्दनेश्वर की माता ने एक दिन में ये इतनी चीजें कैसे तैयार कर लीं। इतनी वस्तुओं को तो बीसों स्त्रियाँ पृथक्-पृथक् सैकड़ों चूल्हों पर भी तैयार नहीं कर सकतीं। भट्टाचार्य सार्वभौम ही धन्य हैं, जिनके घर भगवान को इतनी वस्तुएँ भोग लगती हैं। किन्तु इतनी चीजों को खायेगा कौन, इनसे तो बीसों आदमियों का पेट भर जायगा और फिर भी बच रहेंगी। आप इनमें से थोड़ी-थोड़ी कम कर दीजिये।’
भट्टाचार्य ने कहा- ‘प्रभो! अधिक नहीं है मन्दिर में 56 प्रकार के भोगों से बहुत ही कम है। फिर वहाँ तो बीसों बार भोग लगता है। यहाँ तो मैंने एक ही बार थोड़ा-थोड़ा परोसा है, इसे ही पाकर मुझे कृतार्थ कीजिये।'
महाप्रभु सार्वभौम के आग्रह से प्रसाद पाने लगे। महाप्रभु की जो चीज आधी निबट जाती उसे ही जल्दी से लाकर फिर भट्टाचार्य पूरी कर देते। प्रभु को परोसते समय भी उन्हें अपने जामाता अमोघ का ध्यान बना हुआ था, इसलिये वे पदार्थों को परोसकर जल्दी से दरवाजे पर जा बैठते, जिसमे अमोघ यहाँ आकर किसी प्रकार का विध्न उपस्थित न कर दे। इतने में ही भट्टाचार्य ने अमोघ को आते हुए देखा। दूर से देखते ही उन्होंने उसे दूसरे घर में आने की आज्ञा दी। उस समय तो अमोघ घर में चला गया, किन्तु जब भट्टाचार्य प्रभु के लिये कुछ लेने के लिये दूसरे घर में चले, तब जल्दी से वह प्रभु के पास आ पहुँचा।
महाप्रभु के सामने सैकड़ों प्रकार के व्यंजनों का ढेर देखकर दांतों से जीभ काटता हुआ अमोघ कहने लगा- 'बाप रे बाप! यह संन्यासी है या कोई आफत का पुतला है। इतना भोजन तो बीस आदमी भी नहीं कर सकते। यह इतना भोजन कैसे कर जायगा ?' इस बात को सुनते ही सार्वभौम भट्टाचार्य वहाँ जल्दी से आकर उपस्थित हो गये और अमोघ को दस उलटी-सीधी बातें सुनाकर वे प्रभुसे इस अपराध के लिये क्षमा-याचना करने लगे।
महाप्रभु ने बड़ी ही सरलता के साथ कहा- 'इसमें अमोघ ने अपराध ही क्या किया है, उसने ठीक ही बात कही है। भला, संन्यासी को इतने पदार्थ खिलाकर उसे कोई सदाचारी बने रहने की कैसे आशा कर सकता है ? आपने मुझे इतना अधिक भोजन करा दिया है कि जमीन से उठना भी मेरे लिये अशक्य हो रहा है। अमोघ ने तो बिलकुल सच्ची बात कही है। आप उसकी प्रतारणा न करें। मुझे उसके ऊपर जरा-सा भी क्षोभ नहीं है, आप अपने मन में कुछ और न समझें।' महाप्रभु इतना कहकर और भिक्षा पाकर अपने स्थान को लौट आये।
सार्वभौम तथा उनकी पत्नीको इस घटनासे बड़ा दुःख हुआ। वे प्रभुके अपमानसे क्षुभित होकर अमोघको कोसने लगे। भट्टाचार्य तथा उसकी पत्नीने कुछ भी नहीं खाया। भट्टाचार्यकी लड़की षाठीदेवी अपने भाग्यको बार-बार कोसने लगी। वह भगवान् से कहती-'हे दयालो! ऐसे पतिसे तो मेरा पतिहीन रहना अच्छा है। या तो मेरे इस शरीरका अन्त कर दे या ऐसे साधुद्रोही पतिको ही मुझसे पृथक् कर दें।' अमोघ अपने श्वशुरकी लाल-लाल आँखोंको देखकर बाहर चला गया और उस दिन रात्रिमें भी घर लौटकर नहीं आया। उस दिन मारे चिन्ताके भट्टाचार्यके परिवारभरमें किसीने भोजन नहीं किया। भगवान् की विचित्र लीला तो देखिये, अमोघको अपनी करनीका प्रत्यक्ष फल मिल गया। दूसरे ही दिन उसे भयंकर 'विषूचिका' रोग हो गया।
इस समाचारको सुनते ही कुछ प्रसन्नता प्रकट करते हुए सार्वभौमने कहा-'चलो, अच्छा ही हुआ। 'अत्युग्रपापपुण्यानामिहैव फलमश्नुते' अत्यन्त उग्र पाप-पुण्योंका फल यहीं इस पृथ्वीपर मिल जाता है। अमोघने जैसा किया वैसा ही उसका प्रत्यक्ष फल पा लिया।' लोग अमोघको उठाकर सार्वभौमके घर ले आये। आचार्य गोपीनाथने यह संवाद जाकर प्रभुको सुनाया। सुनते ही महाप्रभु सार्वभौमके घर जल्दीसे दौड़े आये। उन्होंने आकर देखा, अमोघ बेसुध हुआ पलंगपर पड़ा है। उसके जीवनकी किसीको भी आशा नहीं है। तब तो महाप्रभु उसके पलंगके पास गये और उसके हृदयपर हाथ रखकर कहने लगे-'अहा, बच्चोंका हृदय कितना कोमल होता है, फिर कुलीन ब्राह्मणोंका तो कहना ही क्या ? ब्राह्मणोंका स्वच्छ निर्मल अन्तःकरण प्रभुके निवासके ही योग्य होता है। न जाने यह राक्षस मात्सर्य इस अमोघके अन्तःकरण में कहांसे घुस गया।'
प्रभु ने थोड़ी देर चुप रहकर फिर कहा-'ओ दुष्ट मात्सर्य! सार्वभौम भट्टाचार्यके घरमें रहनेवाले अमोघके अन्तःकरणमें प्रवेश करनेका तुझे साहस कैसे हुआ ? सार्वभौमके भयसे तू अभी भाग जा।' इतना कहकर प्रभु फिर अमोघको सम्बोधन करके कहने लगे-'अमोघ! तेरे हृदयमेंसे चाण्डाल मात्सर्य भाग गया, अब तू जल्दीसे उठकर श्रीकृष्णके मधुर नामोंको उच्चारण कर।'
क्रमशः
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