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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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इतना सुनते ही अमोघ सोते हुए मनुष्यकी भाँति जल्दीसे उठकर खड़ा हो गया और 'श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे! हे नाथ नारायण वासुदेव!!' आदि भगवान् के नामोंका जोरोंसे उच्चारण करता हुआ नृत्य करने लगा। उसकी इस अद्भुत परिवर्तित दशाको देखकर सभी आश्चर्यचकित होकर प्रभुके श्रीमुखकी ओर निहारने लगे और इसे महाप्रभुका ही परम प्रसाद समझने लगे। अमोघने भी प्रभुके पैरोंमें पड़कर उनसे अपने पूर्वकृत अपराधके लिये क्षमा-याचना की। महाप्रभुने उसे गले लगाकर सान्त्वना प्रदान की। अमोघको अपने कुकृत्यपर बड़ा ही पश्चात्ताप होने लगा। वह अपने अपराधको स्मरण करके दोनों हाथोंसे अपने ही गालोंपर तमाचे मारने लगा। इससे उसके दोनों गाल सूज गये। तब आचार्य गोपीनाथने उसे इस कामसे निवारण किया। महाप्रभुने उसे कृष्ण-कीर्तनका उपदेश दिया। उसी दिनसे अमोघ परम भागवत वैष्णव बन गया और उसकी गणना प्रभुके अन्तरंग भक्तोंमें होने लगी। तब महाप्रभुने गोपीनाथाचार्यको आज्ञा दी कि तुम स्वयं जाकर भट्टाचार्य और उनकी पत्नीको भोजन कराओ। प्रभुकी आज्ञा पाकर आचार्य सार्वभौमको साथ लेकर घर गये और उन्हें भोजन कराया। प्रभुके कहनेपर सार्वभौमने अमोघको क्षमा कर दिया और उस दिनसे बहुत अधिक प्यार करने लगे। अमोघ भी महाप्रभुके चरणोंमें अधिकाधिक प्रीति करने लगा।
नित्यानन्द जी का गोड़-देश में भगवन्नाम-वितरण…….
नित्यानन्द जी का स्वभाव सदा से अबोध बालकों का-सा ही था। वे पुरी में सदा वाल्य-भाव में ही बने रहते। उनमें अनन्त गुण होंगे, किन्तु एक गुण उनमें सर्वश्रेष्ठ था। वे महाप्रभु को अपने प्राणों से भी अधिक प्यार करते थे। प्रभु के चरणों में की उन प्रगाढ़ प्रीति थी। प्रभु के अतिरिक्त वे और किसीको कुछ समझते ही न थे। उनके लिये भगवान, परमात्मा तथा ब्रह्मा जो भी कुछ थे, चैतन्य महाप्रभु ही थे। प्रभु से वे बालकों की भाँति बातें करते। घूमने का उनका पहले से ही स्वभाव था और बच्चों के साथ खेलने में वे सबसे अधिक आनन्द का अनुभव करते थे। सदा बच्चों के साथ खेलते रहते और उनसे जोरों से कहलाते-
'गौर हरि बोल, गौर हरि बोल, चैतन्यकृष्ण श्रीगौर हरि बोल।'
बच्चे इन नामोंकी धूम मचा देते तब ये उनके मुख से इस संकीर्तन को सुनकर बड़े ही प्रसन्न होते। एक दिन महाप्रभु ने इन्हें समीप बुलाकर कहा- 'श्रीपाद! मेरा आपके प्रति कितना स्नेह है, इसे मैं ही जानता हूँ। मैं आपको एक क्षण भी अपने से पृथक करना नहीं चाहता, किन्तु जीवों का दुःख मुझसे देखा नहीं जाता। गौड़-देश के मनुष्य तो भगवान को एकदम भूल गये हैं। जो कुछ थोड़े-बहुत पढ़े हैं, वे अपने विद्याभिमान में सदा चूर बने रहते हैं। उन्हें न्याय की शुष्क फक्किकाओं के घोखने से ही अवकाश नहीं मिलता। वे कृष्ण-कीर्तन को घृणा की दृष्टि से देखते हैं। आपके सिवा गौड़-देश का उद्धार और कोई नहीं कर सकता। यह काम आपके ही द्वारा हो सकेगा इसलिये जीवों के कल्याण के निमित्त आपको मुझसे पृथक् होकर गौड़-देश में भगवन्नाम-वितरण करनेके लिये जाना होगा। आप ही ऊँच-नीच का भेदभाव न रखकर सब लोगों को भगवन्नाम का उपदेश दे सकते हैं।'
प्रभु के इस मर्मवेधी वाक्य को सुनकर नित्यानन्द जी की आँखों में आंसू आ गये और वे रुँधे हुए कण्ठ से कहने लगे-'प्रभो! आप सर्व समर्थ हैं। आपकी लीला जानी नहीं जाती। पता नहीं किसके द्वारा आप क्या कराना चाहते हैं। भला, आपकी अनुपस्थिति में मैं कर ही क्या सकता हूँ। प्रभो! मैं आपके बिना कुछ भी न कर सकूँगा, मुझे अपने चरणों से पृथक न कीजिये।' महाप्रभु ने कहा- 'आप समय-समय पर मुझे यहाँ आकर दर्शन दे जाया करें और भगवान के दर्शन कर जाया करें। अब तो आपको गौड़-देश में जाना ही चाहिये।'
नित्यानन्द जी विवश हो गये, उन्होंने विवश होकर महाप्रभु की आज्ञा शिरोधार्य की और अभिरामदास, गदाधरदास, कृष्णदास और पुरन्दर पण्डित आदि भक्तों को साथ लेकर उन्होंने गौड़-देश के लिये प्रस्थान किया। उन्हें अब किसी बात का भय तो था नहीं। महाप्रभुने स्वयं कह दिया है कि मैं सदा आपके साथ रहूँगा, आप बिना किसी भेदभाव के निडर होकर सर्वत्र भवन्नाम-वितरण करें। इस बात पर पूर्ण विश्वास करते हुए नित्यानन्द जी प्रेम में विभोर हुए आगे बढ़ने लगे। वे आनन्द में झूमते हुए, मस्ती में नाचते और गौर की दया को स्मरण करते हुए भक्तों के साथ जा रहे थे। उन्हें अपने लिये कोई कर्तव्य नहीं था, वे जीवों के कल्याण के ही निमित्त अपने प्रभु की आज्ञा शिरोधार्य करके गौड़-देशमें आये थे।
नित्यानन्द जी का गोड़-देश में भगवन्नाम-वितरण…..
समस्त गौड़-देश भक्तिरसामृत-पान करने के लिये प्यासा-सा बैठा हुआ था। विशेषकर निम्न कहलाने वाले जातियों के लिये भगवद्-भजन का अधिकार ही नहीं था। बड़े-बड़े विद्वान पण्डित उन्हें परमार्थ का अनधिकारी बताकर साधन-भजन का उपदेश ही नहीं करते थे। सभी एक ऐसे मार्ग की खोज में थे, जिसके द्वारा सभी श्रेणी के लोग प्रभु के पादपद्मों तक पहुँचने के अधिकारी हो सकें। ऐसे ही सुन्दर अवसर के समय नित्यानन्द जी ने गौड़-देश में प्रवेश किया। इनकी वाणी में जादू था, चेहरे पर ओज था, शरीर में स्फूर्ति थी और था महाप्रभु के प्रेम का अनन्य दृढ़ विश्वास। इन्हीं सब बातों से गौड़-देश में प्रवेश करते ही इनके उपदेश का असर जादू की भाँति थोड़े ही दिनों में सर्वत्र फैल गया। ये भगवन्नामोपदेश में किसी प्रकार का भेदभाव तो रखते ही नहीं थे। जो चाहे वही इनके पास से आकर त्रितापहारी भगवन्नाम का उपदेश ग्रहण कर सकता है। विशेषकर ये नीची कहलाने वाली जातियों के ऊपर ही सबसे अधिक कृपा करते थे। उच्च जाति के लोग तो अपने श्रेष्ठपने के अभिमान में इनकी बातों पर ध्यान ही नहीं देते थे। निम्नश्रेणी के ही लोग इनकी बातों को श्रद्धापूर्वक सुनते थे, इसलिये ये उन्हें ही अधिक उपदेश करते। इस प्रकार ये लोगों में भगवन्नाम की निरन्तर वर्षा करते हुए और उस कृष्ण-संकीर्तनरूपी अपूर्व रससे लोगों को सुखी बनाते हुए पानीहाटी ग्राम में आये और वहाँ अपने सभी भक्तों के सहित राघव पण्डित के घर ठहरे।
राघव पण्डित स्वयं महाप्रभु के अनन्य भक्त थे, उन्होंने साथियोंसहित नित्यानन्द जी का खूब सत्कार किया और उनके साथ प्रचार के लिये भी बाहर ग्रामों में जाने लगे।नित्यानन्द जी वहाँ तीन महीने ठहरकर लोगों को श्रीकृष्ण-संकीर्तन का उपदेश करते रहे।
क्रमशः
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