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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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वे अपने साथियों के सहित गंगा जी के किनारे-किनारे गाँवों में जाते और वहाँ सभी से श्रीकृष्ण-कीर्तन करने के लिए लिए कहते। ये विशेष पुस्तकी विद्या तो पढ़े नही थे, सीधी-सादी भाषा में सरलतापूर्वक ग्रामीण लोगों को समझाते, इनके समझाने का लोगों पर बड़ा ही अधिक असर होता और वे उसी दिन से कीर्तन करने लग जाते। इसी बीच में आप अम्बिकानगरमें भी संकीर्तन का प्रचार करने गये थे, वहाँ सूर्यदास पण्डित ने खूब आदर-सत्कार किया। ये भक्तों के सहित उनके घर पर रहे। सूर्यदास का समस्त परिवार नित्यानन्द जी के चरणों में बड़ी भारी श्रद्धा रखने लगा।
इस प्रकार पानीहाटी में भगवन्नाम और भगवद्भक्ति की आनन्दमय और प्रेममय धारा बहाकर नित्यानन्द जी अपने परिकर के सहित एड़दह में गदाधरदास के घर ठहरे। इसी गांव में एक मुसलमान क़ाज़ी संकीर्तन का बड़ा भारी विरोधी था। नित्यानन्द जी के प्रभाव से वह भी स्वयं संकीर्तन में आकर नाचने लगा। इससे इनका प्रभाव और भी अधिक बढ़ गया। लोग इनके श्रीचरण में अनन्य श्रद्धा रखने लगे।चारों ओर 'श्रीकृष्ण-चैतन्य की जय,' 'नित्यानन्द की जय,' 'गौरनिताई की जय' यही ध्वनि सुनायी देने लगी। एड़दह से चलकर नित्यानन्द जी खड़दह में पहुँचे। वहाँ चैतन्यदास और पुरन्दर पण्डित इन दोनों भक्तों ने इनका खूब आदर-सत्कार किया और इनके प्रचार-कार्य में योगदान दिया। इसी प्रकार लोगों को प्रभुप्रेम में प्लावित बनाते हुए महामहिम नित्यानन्द जी सप्तग्रा में पहुँचे।उस समय बंगाल में सुवर्णवणिक् जाति के लोग अत्यन्त ही नीचे समझे जाते थे। उनके हाथ का जल पीना तो दूर रहा, बड़े-बड़े पण्डित विद्वान उन्हें स्पर्श करने में घृणा करते थे। नित्यानन्द जीने सबसे पहले इन्हीं लोगों को अपनाया। ये लोग सम्पत्तिशाली थे, इस बात के लिये बड़े लालायित बने हुए थे कि किसी प्रकार हमारा भी परमार्थ-पथ में प्रवेश हो सके। नित्यानन्द जी ने इनके अछूतपने को एकदम हटा दिया। वे उद्धरण दत्त नामक एक धनी स्वर्णवणिक्के घर पर जाकर ठहरे और सभी स्वर्णवणिकों को भगवद्भक्ति का उपदेश देने लगे। इनके प्रभाव से स्वर्णवणिकों में बड़ी भारी जागृति हो उठी। यह इनके लिये बड़े ही साहस का काम था। इस बात से उच्च जाति के लोग इन्हें भाँति-भाँति से धिक्कारने लगे, किन्तु इन्होंने किसी की परवा नहीं की। पीछे से इनकी निर्भीकता और सच्ची लगनके सामने सभी लोगों ने इनके चरणों में सिर नवा दिया।
स्वर्णविणकों के अपनाने से इनका नाम चारों ओर फैल गया और लोग भाँति-भाँति से इनके सम्बन्ध में आलोचना-प्रत्यालोचना करने लगे। सप्तग्राम के आस-पास के गांवों में भगवन्नाम का प्रचार करते हुए ये शान्तिपुर में अद्वैताचार्य के घर आये। आचार्य इन्हें देखते ही पुलकित हो उठे और जल्दीसे इनका दृढ़ आलिंगन करते हुए प्रेम के अश्रु बहाने लगे। दोनों ही महापुरुष प्रेम में विभोर हुए एक-दूसरे का जोरों से आलिंगन कर रहे थे। बहुत देरके अनन्तर प्रेम का आवेग कम होने पर आचार्य कहने लगे- 'निताई! आपने ही वास्तव में महाप्रभु के मनोगत भावों को समझा है, आप महाप्रभु के बाहरी प्राण हैं।' इस प्रकार नित्यानन्द जी की स्तुति करके आचार्य ने उनसे कुछ काल ठहरने का आग्रह किया। अद्वैताचार्य के आग्रहसे नित्यानन्द जी कुछ काल शान्तिपुर में ठहरकर भगवन्नाम और संकीर्तन का प्रचार करते रहे।

आचार्य से विदा होकर नित्यानन्द जी नवद्वीप में आये। नवद्वीप में इनके प्रवेश करते ही कोलाहाल-सा मच गया। चारों ओर से भक्त आ-आकर उनके पास जुटने लगे। इन्होंने सबसे पहले प्रभु के घर जाकर शचीमाता की चरण-वन्दना की। बहुत दिनों के पश्चात् अपने निताई को पाकर माता के सुखकी सीमा न रही। वह इतने बड़े निताईको गोदीमें बिठाकर बच्चों की भाँति उनके मुख पर हाथ फेरती हुई कहने लगी- 'बेटा निताई! निमाई मुझे भूल गया तो भूल गया, तैंने भी मेरी सुधि बिसार दी। बेटा! आज इतने दिनों के पश्चात् तेरे मुख को देखकर मुझे परमानंद हुआ है। अब मैं विश्वरूप और निमाई के संन्यास सभी का भूल गयी। मेरे प्यारे बेटा! अब तू यहीं मेरे पास रहकर संकीर्तन का प्रचार कर और भक्तों के साथ कीर्तन कर। मैं सदा तुझे अपनी आँखों के सामने देखकर सुखी हो सकूँगी।
नित्यानन्द जी ने माता की आज्ञा को प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार कर लिया और वे नवद्वीप में ही हिरण्य पण्डित के घर रहने लगे। नित्यानन्द जी के नवद्वीप में रहने से शिथिल हुई संकीर्तन की ध्वनि फिर जोरों से शब्दायमान होती हुई आकाश में गूंजने लगी। सभी लोग महाप्रभु के सामने जिस प्रकार संकीर्तन में पागल हो जाते थे, उसी प्रकार फिर बेसुध होकर उद्दण्ड नृत्य करने लगे।

नित्यानन्द जी का प्रभाव बहुत अधिक बढ़ गया। अब इनके रहन-सहन में भी परिवर्तन हो गया।वे सुन्दर वस्त्राभूषण धारण करने लगे। खान-पान में भी विविध व्यंजन आ गये। इससे उनकी निन्दा भी हुई। इस प्रकार एक ओर जहाँ इनकी इतनी अधिक ख्याति हुई वहाँ निन्दा भी कम नहीं हुई। यह तो संसार का नियम ही है। जितने मुख होते हैं, उतने ही प्रकार की बातें होती हैं, कार्यार्थी धीर पुरुष लोगों की निन्दा-स्तुति की परवा न करके अपने काम में ही लगे रहते हैं। पीछे से निन्दा करने वाले स्वयं ही निन्दा करने से थककर चुप होकर बैठ जाते हैं। महापुरुषों के कामों में लोक-निन्दा से विध्न न होकर उलटी सहायता ही मिलती है। यदि महापुरुषों के कार्यों की इस प्रकार जोरों से आलोचना और निंदा न हुआ करें तो उन्हें आगे बढ़ने में प्रोत्साहन ही न मिले। निन्दा उन्हें उन्नत बनाने के लिये एक प्रकार की औषधि है। किन्तु जो जानबूझकर निन्दित काम करते हैं, ऐसे दम्भी पुरुष कभी भी उन्नत नहीं हो सकते। इसलिये प्रयत्न तो ऐसा ही करते रहना चाहिये कि जहाँ तक हो सके निन्दित कामों से बचते रहें। यदि सच्चे और श्रेष्ठ मार्ग का अनुसरण करते-करते स्वतः ही लोग निन्दा करने लगें, जैसा कि लोगों का स्वभाव है तो उनकी परवा भी न करनी चाहिये। यही बड़े बनने का महान गुरुमंत्र है।

नित्यानन्द जी का गृहस्थाश्रम में प्रवेश…

महापुरुषोंके जीवनमें कहीं-कहीं धर्म-व्यतिक्रम पाया जाता है; इनका क्या कारण है ? इसका ठीक-ठीक उत्तर दिया नहीं जाता है; परन्तु उनके वैसे कार्योंके अनुकरण न करनेकी आज्ञा शास्त्रोंमें मिलती है।
क्रमशः

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