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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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ब्रह्मातक पहुँचे हुए निर्मलचेता ऋषि-महर्षियोंने वेदमें स्पष्ट रूपसे अपने अनुयायी शिष्योंसे कहा है-

यान्यस्माकं सुचरितानि तानि त्वयोपासितव्यानि नो इतराणि।

हमारे जो अच्छे काम हों तुम्हें उन्हीं का आचरण करना चाहिये। अन्य जो हमारे जीवन में निषिद्ध आचरण दीखें उनका अनुकरण कभी भी न करना चाहिये। परन्तु ईश्वर और महापुरुषोंके कार्योंकी निन्दा भी नहीं करनी चाहिये। महर्षियों ने महापुरुषों के कार्यों की आलोचना और निन्दा करने को पाप बताया है। जो महापुरुषों के कार्यों की निन्दा किया करते हैं वे अबोध बन्धु भूल करते हैं। साथ ही वे भी भूल करते हैं जो निन्दकों को सदा कोसा करते हैं। निन्दकों का स्वभाव तो निन्दा करने का है ही। उनकी निन्दा करके तुम अपने सिर पर दूसरा पाप क्यों लेते हो ? निन्दक तो सचमुच उपकारी है। संसार में यदि बूरे कामों की निन्दा होनी बंद हो जाय, तो यह जगत सचमुच रौरव नरक बन जाय। महापुरुष और निन्दा से डरते नहीं, उनका तो लोकनिन्दा कुछ बिगाड़ नहीं सकती। नीच प्रकृति के लोग लोकनिन्दा के भय से बुरे कामों को छिपाकर करते हैं और सर्वधारण लोग लोकनिन्दा के ही भयसे पाप-कर्मों में प्रवृत्त नहीं होती। इसलिये लोकनिन्दा समाजरूपी वृक्ष को सुरक्षित बनाये रहनेके लिये उसके आसपास में लगे हुए काँटों के समान है। इससे पापरूपी पशु उस पेड़को एकदम नष्ट नहीं कर सकते। इसलिये परमार्थ-पथके पथिक को न तो महापुरुषों के ही बुरे आचरणों की निन्दा करनी चाहिये और न उनकी निन्दा करने वाले निन्दकों की ही निन्दा करनी चाहिये। निन्दा-स्तुति से एकदम उदासीन होना ही परम श्रेयस्कर है। यदि कुछ कहे बिना रहा ही न जाय, तो सदा दूसरे के गुणों का ही कथन करना चाहिये और लोगों के छोटे गुणों को भी बढ़ाकर कहना चाहिये और उसे अपने जीवन में परिणत करना चाहिये। अस्तु।

नित्यानन्द जी के रहन-सहन की खूब आलोचना होने लगी। लोग उनकी निन्दा करने लगे। निन्दा का विषय ही था, एक अवधूत त्यागी को ऐसा आचरण करना लोकदृष्टि में अनुचित समझा जाता है। जब वे संन्यास छोड़कर गृहस्थी हो गये तब तो उनकी निन्दा और भी अधिक होने लगी। मालूम पड़ता है, उसी निन्दा के खण्डन में 'चैतन्य-भागवत' की रचना हुई है। चैतन्य-भागवत में श्रीचैतन्य-चरित को प्रधानता नहीं दी है, उनमें तो नित्यानन्द जी के गुणों का विशेष रीति से वर्णन है और नित्यानन्द जी पर विश्वास न करने वाले लोगों को भरपेट कोसा गया है।
गोस्वामी श्रीवृन्दावनदास जी नित्यानन्द जी के मंत्र-शिष्य थे। उनके लिये नित्यानन्द जी ही सर्वस्व थे। नित्यानन्द जी के आशीर्वाद से ही गोस्वामी वृन्दावनदास जी का जन्म हुआ था। ये सदा नित्यानन्द जी के ही समीप रहते थे। जिन्हें हम अपना सर्वस्व समझते हैं उनकी साधारण लोग मनमानी निन्दा करें इसे प्रतिभावन पुरुष बहुत कम सह सकते हैं। इसलिये उनकी इस प्रकार की सुन्दर कविता से इनकी अनन्य गुरु-भक्ति ही प्रकट होती है।

नित्यानन्द जी की शिकायत महाप्रभु तक पहुँची थी। प्रभु के एक सहपाठी पण्डित ने नित्यानन्द जी की उनसे भरपेट निन्दा की; किन्तु महाप्रभु ने इस पर विश्वास नहीं किया।

गौड़-देश से दूसरी बार भक्त  भी पहले की ही भाँति रथयात्रा के समय महाप्रभु के दर्शनों को गये। उस समय भी नित्यानन्द जी के सम्बन्ध में बहुत-सी बातें होती रहीं। श्रीवास पण्डित ने चलते समय कह दिया कि नित्यानन्द जी अबोधावस्था में ही घर से निकल आये थे। उन्होंने स्वेच्छा से संन्यास नहीं लिया था।
महाप्रभु ने कह दिया- 'उन्होंने चाहे स्वेच्छा से संन्यास लिया हो या परेच्छा से, उनके लिये कोई विधि निषेध नहीं है।' रोज ही लोगों के मुख से भाँति-भाँति की बातें सुनकर नित्यानन्द जी को भी कुछ क्षोभ हुआ। उन्होंने अपनी मनोव्यथा शचीमाता से कही। माता ने आज्ञा दी कि नीलाचल जाकर निमाई से मिल आ, वह जैसा कहे वैसा करना। माता की अनुमति से नित्यानन्द जी अपने दस-पांच अन्तरंग भक्तों  को साथ लेकर नीलाचल पहुँचे। उन्हें महाप्रभु के सम्मुख जाने में बड़ी लज्जा मालूम पड़ती थी। इसलिये संकोचवश वे महाप्रभु के स्थान पर नहीं गये। बाहर ही एक बागमें बैठे हुए वे पश्चात्ताप के आंसू बहा रहे थे कि उसी समय समाचार पाते भी प्रभु वहाँ दौड़े आये और वे नित्यानन्द जी की प्रशंसा करते हुए उनकी प्रदक्षिणा करने लगे।प्रभु को प्रदक्षिणा करते देखकर नित्यानन्द जी जल्दी से प्रभु को प्रणाम करने के लिये उठे, किन्तु प्रेम के आवेश में वहीं मूर्च्छित होकर गिर पड़े। उनकी मूर्च्छित दशा में ही प्रभु ने उनकी चरण-धूलि को अपने मस्तक पर चढ़ाया। महाप्रभु के पश्चात् सभी भक्तों ने नित्यानन्द जी की चरण-रज मस्तक पर चढ़ायी। प्रभु उनका पैर पकड़कर बैठ गये। बाह्यज्ञान होने पर नित्यानन्द जी उठे; वे कुछ कहना ही चाहते थे किन्तु प्रेम के आवेश में कुछ भी न कह सके, उनका सिर आप-से-आप ही लुढ़ककर महाप्रभु की गोदी में गिर पड़ा। महाप्रभु उनके मस्तक को बार-बार सूंघने लगे और अपने कर-कमलों से उनके पुलकित हुए अंगों पर धीरे-धीरे हाथ फेरने लगे। दोनों भाई बड़ी देर तक इसी प्रकार प्रेम में बेसुध बने उसी स्थान पर बैठे रहे। फिर महाप्रभु उन्हें हाथ पकड़कर अपने यहाँ ले गये और वे अब पुरी में ही रहने लगे।

नित्यानन्द जी का गृहस्थाश्रम में प्रवेश….

गदाधर जी क्षेत्र-संन्यास लेकर यमेश्वर के निर्जन मन्दिर में रहते थे। नित्यानन्द जी उन्हीं के पास ठहरे। गदाधर के लिये वे गौड़-देश से एक मन सुन्दर सुगन्धित अरवा चावल और एक बहुत बढि़या लाल वस्त्र उपहार में देने के लिये साथ लाये थे। गदाधर ने उन सुगन्धित चावलों को सिद्ध किया, इमली के पत्तों की चटनी भी बनायी, सभी सोच रहे थे कि इस समय महाप्रभु न हुए। किसी का इतना साहस नहीं हुआ कि प्रभु को निमंत्रण करें। ये लोग सोच ही रहे थे कि इतने में ही किसी ने द्वार खटखटाया। गदाधर ने जल्दी से किवाड़ खोले। देखा, महाप्रभु खड़े हैं; सभी महाप्रभु की इस भक्तवत्सलता की मन-ही-मन सराहना करने लगे।
महाप्रभु जल्दी से स्वयं ही भोजन करने बैठ गये। सभी को साथ ही बैठकर प्रसाद पाने की आज्ञा हुई। महाप्रभु की आज्ञा सभी ने पालन की, सभी प्रभु के साथ बैठकर प्रसाद पाने लगे।
क्रमशः

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