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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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नित्यानन्द आदि सभी भक्त इस बात को सोच रहे थे, कि ‘नवद्वीप में प्रभु के प्रत्यागमन का समाचार किस प्रकार पहुँचे। नवद्वीप के सभी भक्त प्रभु के वियोग दु:ख में व्याकुल बने हुए हैं, शचीमाता अपने प्यारे पुत्र का कुछ भी समाचार न पाने के कारण अधीर हो रही होगी, विष्णुप्रिया जी का तो एक एक दिन युग की भाँति कटता होगा, इसलिये कृष्णदास को ही नवद्वीप क्यों न भेज दें। इससे प्रभु की आज्ञा का भी पालन हो जायगा और शोकसागर में डूबे हुए सभी भक्तों को भी परम आनन्द हो जायगा।’ यह सोचकर उन्होंने अपने मनोगत भावों को प्रभु के सम्मुख प्रकट किया। प्रभु ने उत्तर दिया- ‘श्रीपाद ! मैं तो आपका नर्तक हूँ, जैसे नचायेंगे वैसे ही नाचूँगा। आपकी इच्छा के विरुद्ध मैं कुछ नहीं कर सकता। जो आपको अच्छा लगे वही कीजिये।’
नित्यानन्द जी ने दीनभाव से कहा- ‘प्रभो ! हम आपकी आज्ञा का उल्लघंन नहीं करना चाहते। आप जिस प्रकार की आज्ञा करेंगे, उसी का हम सहर्ष पालन करेंगे। आपकी अनुमति हो, तभी हम इसे नवद्वीप भेज सकते हैं अन्यथा नहीं।’
प्रभु ने कहा- ‘जब आपकी इच्छा है तब मेरी अनुमति ही समझें। आपकी इच्छा के विरुद्ध मेरी अनुमति हो ही नहीं सकती।’
प्रभु की आज्ञा पाकर नित्यानन्द जी ने कृष्णदास को जगन्नाथ जी का प्रसाद देकर नवद्वीप के लिये भेज दिया। कृष्णदास नित्यानन्द जी की आज्ञा पाकर और प्रभु के पादपद्मों में प्रणाम करके नवद्वीप के लिये चल दिया। इधर महाप्रभु पुरी में भक्तों के साथ रहकर नियमितरूप से भजन-कीर्तन करने लगे। बहुत से पुरी के भक्त आ आकर प्रभु के दर्शनों से अपने को कृतार्थ करने लगे। राय रामानन्द जी के पिता राजा भवानन्द जी ने जब प्रभु के आगमन का समाचार सुना तब वे अपने चारों पुत्रों के सहित महाप्रभु के दर्शन के लिये आये। प्रभु उनका परिचय पाकर अत्यन्त ही आनन्दित हुए और प्रसन्नता प्रकट करते हुए कहने लगे- जिनके रामानन्द जैसे भगवदभक्त पुत्र हों, वे महापुरुष तो देवताओं के वन्दनीय हैं, सचमुच आप धन्य हैं, आप तो साक्षात महाराज पाण्डु के समान हैं, पाँचों पुत्र ही आपके पाँचों पाण्डव हैं। राय रामानन्द युधिष्ठिर के समान सत्यप्रतिज्ञ, धर्मात्मा और भगवदभक्त हैं। आपकी गृहिणी साक्षात कुन्ती देवी के समान हैं। आपसे मिलकर मुझे बड़ी भारी प्रसन्नता हुई। आप मुझे रामानन्द जी की ही भाँति अपना पुत्र समझें।’
हाथ जोड़े हुए भवानन्द जी ने कहा- ‘मैं शुद्राधम, प्रभु की इस असीम कृपा का अपने को कभी भी अधिकारी नहीं समझता। आप भक्तवत्सल हैं, पतितपावन आपका प्रसिद्ध नाम है, उसी अपने नाम को सार्थक कर दिखाने के लिये आप मुझ जैसे संसारी विषयी पुरुष पर अपनी अहैतु की कृपा कर रहे हैं।
प्रभो ! आपके श्रीचरणों में मेरी यही बारम्बार प्रार्थना है कि इस अधम को अपने चरणों की शरण प्रदान कीजिये। मैं अपने परिवार के सहित आपके चरणों का दास हूँ। जिस समय जो भी आज्ञा हो उसे नि:संकोच भाव से कह दें।’ यह कहकर राजा भवानन्द जी ने अपने कनिष्ठ पुत्र श्रीवाणीनाथ जी को सदा प्रभु की सेवा करने के लिये नियुक्त किया। प्रभु ने वाणीनाथ को स्वीकार कर लिया और वाणीनाथ जी अधिकतर प्रभु की ही सेवा में रहने लगे।
इधर महाप्रसाद के साथ (काला) कृष्णदास नवद्वीप में शचीमाता के समीप पहुँचा। पुत्र का ही सदा चिन्तन करती रहने वाली माता अपने प्यारे दुलारे सुत का समाचार पाकर आनन्द में विभोर होकर अश्रुविमोचन करने लगी। विष्णुप्रिया जी भी अपनी सास के समीप आ बैठीं। माता एक एक करके पुत्र की सभी बातों को पूछने लगी। यह समाचार क्षणभर में ही सम्पूर्ण नगर में फैल गया। चारों ओर से भक्त आ आकर शचीमाता के आंगन में संकीर्तन करने लगे। बात की बात में ही शचीमाता का घर आनन्द भवन बन गया। हजारों भक्त ‘हरि हरि’ की गगनभेदी आनन्द ध्वनि से दिशा विदिशाओं को गुंजाने लगे। कृष्णदास से कोई प्रभु के शरीर का समाचार पूछता, कोई यात्रा का वृत्तान्त सुनना चाहता, कोई नवद्वीप कब पधारेंगे, इसी बात को बीसों बार दुहराने लगता। इस प्रकार कृष्णदास से सभी लोग विविध भाँति के एक साथ ही प्रश्न पूछने लगे। कृष्णदास यथा शक्ति सबका उत्तर देता। प्रभु के कुशल समाचार सुनाता, उनकी यात्रा की दो चार बातें बताकर कह देता- ‘अब सब बातें फुरसत में सुनाऊंगा।’ सभी भक्त बड़े ही मनोयोग के साथ कृष्णदास की बातों को सुनते।
इस प्रकार वह दिन बात की बात में ही प्रभु का समाचार पूछते पूछते ही व्यतीत हो गया।
दूसरे दिन श्रीवास आदि भक्तवृन्द कृष्णदास को साथ लेकर शान्तिपुर में अद्वैताचार्य के घर गये और उन्होंने बड़े ही उल्लास के सहित प्रभु के पुरी में लौट आने का समाचार सुनाया और प्रभु का भेजा हुआ महाप्रसाद भी उन्हें दिया। प्रभु के समाचार और महाप्रसाद को पाते ही बूढ़े आचार्य के सभी अंग-प्रत्यंग मारे प्रेम के फड़कने लगे, वे लम्बी लम्बी सांसें खींचते हुए हा गौर ! कहकर प्रेम में निमग्न हो गये और उठकर जोरों से संकीर्तन करने लगे। कुछ समय के पश्चात प्रेम का तूफान समाप्त हुआ, तब अद्वैताचार्य अन्य सभी भक्तों के साथ पुरी चलकर प्रभु के दर्शन करने के सम्बन्ध में परामर्श करने लगे। सभी ने निश्चय किया कि शीघ्र ही प्रभु के दर्शनों के लिये चलना चाहिये।
प्रभु ने परमानंदजी से पुरी में आकर एक साथ रहने की प्रार्थना की थी और इन्होंने इसे सहर्ष स्वीकार भी कर लिया था। प्रभु से विदा होकर वे गंगा जी के दक्षिण किनारे-किनारे नवद्वीप आये थे और यहाँ आकर उन्होंने शचीमाता को प्रभु का संवाद सुनाया। संन्यासी के मुख से प्रभु का समाचार सुनकर माता को अत्यधिक आनन्द हुआ और उसने पुरी महाराज का यथोचित खूब सत्कार किया। पुरी महाराज भक्तों के आग्रह से कुछ काल नवद्वीप में ठहर गये थे।जब कृष्णदास प्रभु का समाचार लेकर नवद्वीप आया, तब आप वहीं थे, दूत के मूख से प्रभु के पुरी पधारने का समाचार पाकर परमानन्द पुरी सचमुच परमानन्द में निमग्न हो गये और जल्दी से जल्दी वे प्रभु के समीप पहुँचने का उद्योग करने लगे।
क्रमशः
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