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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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दर्शनार्थी प्रभु के चरणों के नीचे की धूलि उठा-उठाकर सिर पर चढ़ाते। भक्त वृन्द उस चरणरेणु को अपने अपने शरीर में मलते। इस प्रकार बड़ी देर तक महाप्रभु नृत्य करते रहे। नृत्य करते करते प्रभु थककर बैठ गये और स्वरूप को आज्ञा दी कि किसी पद का गायन करो। गायनाचार्य दूसरे गौरचन्द्र श्रीस्वरूपदामोदर गोस्वामी गाने लगे-
सेई त परान नाथ पाईनू।
याहा लागि मदन दहन झूरि गेनू।।
पद के साथ ही साथ वाद्य बजने लगे। हरि, हरि करके भक्त नाचने लगे। जगन्नाथ जी का रथ आगे बढ़ा और महाप्रभु भी नृत्य करते-करते उसके आगे चले। अब प्रभु राधाभाव से भावान्वित हो गये। उन्हें भान होने लगा मानो श्रीश्यामसुन्दर बहुत दिनों के बिछोह के बाद मिलने के लिये आये हैं। इसी भाव से वे जगन्नाथ जी की ओर भाँति-भाँति के प्रेम भावों को हाथों द्वारा प्रदर्शित करते हुए नृत्य करने लगे। अब उन्हें प्रतीत होने लगा मानो श्रीकृष्ण आकर मिल गये हैं, किन्तु इस मिलन में सुख नहीं है, जो वृन्दावन के पुलिन कुंजों में आता था। इसी भाव में विभोर होकर वे इस श्लोक को पढ़ने लगे-
य कौमारहर: स एव हि वरस्ता एव चैत्रक्षपा।
स्ते चोन्मीलितमालतीसुरभय: प्रौढा: कदम्बानिला:
सा चैवास्मि तथापि तत्र सुरतव्यापारलीलाविधौ।
रेवारोधसि वेतसीतरुतले चेत: समुत्कण्ठते।
नायिका पुनर्मिलन के समय कह रही है, ‘जिस कौमार-काल में रेवानदी के तट पर जिन्होंने हमारे चित्त को हरण किया था, वे ही इस समय हमारे पति हैं। वही मधुमास की मनोहारिणी रजनी हैं, वही उन्मीलित मालती पुष्प की मन को मस्त कर देने वाली भीनी भीनी सुगन्ध आ रही है, वही कदम्ब-कानन से स्पर्श की हुई शीतल-मन्द-सुगन्धित वायु बह रही है, पति के साथ सुरत-व्यापार लीला करने वाली नायिका भी मैं वही हूँ और मन को हरण करने वाले नायक भी ये वे ही हैं, तो भी मेरा चंचरीक के समान चंचल चित्त सन्तुष्ट नहीं हो रहा है, यह तो उसी रेवा के रमणीय तट के लिये उत्कण्ठित हो रहा है।’ हाय रे ! विरह! बलिहारी है तेरे पुनर्मिलन की।
इस श्लोक को महाप्रभु किस भाव से कह रहे हैं इसे स्वरूपदामोदर के सिवा और कोई समझ ही न सका। सबों के समझने की बात भी नहीं थी, उनके बाहर चलने वाले प्राण श्रीस्वरूप दामोदर ही समझ भी सकते थे। इस भाव को एक दिन श्लोकबद्ध करके महाप्रभु के सम्मुख भी उपस्थित किया था। महाप्रभु उस श्लोक को सुनकर बड़े ही चकित हुए औश्र बड़े ही स्नेह के साथ स्वरूपदामोदर की पीठ पर हाथ फेरते हुए कहने लगे- ‘स्वरूप! श्रीजगन्नाथ जी के रथ के सम्मुख नृत्य करते समय के हमारे भाव को तुम कैसे जान गये? यह श्लोक तो तुमने मेरे मनोभावों का एकदम प्रतिबिम्ब ही बनाकर रख दिया है।’ कुछ लज्जित स्वर में धीरे से स्वरूप दामोदर ने कहा- ‘प्रभो ! आपकी कृपा के बिना कोई आपके मनोगत भाव को समझ ही कैसे सकता है?’ महाप्रभु उस श्लोक की बार बार प्रशंसा करते हुए कहने लगे- ‘अहो ! कितने सुन्दर भाव हैं, सचमुच कतित्व की, भाव-प्रदर्शन की पराकाष्ठा ही कर दी है।’ वाह-
प्रिय सोऽयं कृष्ण: सहचरि कुरुक्षेत्रमिलित
स्तयाहं सा राधा तदिदमुभयो: संगमसुखम।
तथाप्यन्त खेलन्मधुरमुरलीपञ्चमजुषे
मनो मे कालिन्दीपुलिनविपिनाय स्पृहयति।।
कुरुक्षेत्र में पुन: मिलने पर राधिका जी कह रही हैं- ‘हे सहचरि ! मेरे वे ही प्राणनाथ हृदयमण श्रीकृष्ण मुझे कुरुक्षेत्र में मिल हैं, मैं भी वही वृषभानुनन्दिनी कीर्तिसुता राधा हूँ और दोनों के परस्पर मिलने से संगमसुख भी प्राप्त हुआ। किन्तु प्यारी सखी ! हृदय की सच्ची बात कहती हूँ, जिस वन में मुरली मनोहर की पंचम स्वर में बजती हुई मुरली की मन मोहक तान सुनी थी उस कालिन्दी कूलवाले वन के लिये मेरा मनमधुप अत्यन्त ही लालायति हो रहा है।’ यह भाव प्रभु के मनोगत भाव के एकदम अनुरूप ही था। इस प्रकार श्रीराधिका जी के अनेक भावों को प्रकट करते हुए प्रभु रथ के आगे आगे नृत्य करते हुए चलने लगे। उनके आज के नृत्य में जगत को मोहित करने वाली शक्ति थी। नृत्य करते-करते एक बार महाप्रभु महाराज प्रतापरुद्र के बिलकुल ही समीप पहुँच गये। महाराज ने इस सुअवसर को पाकर प्रभु के चरण पकड़ लिये। उसी समय प्रभु को नाह्यज्ञान हुआ और यह कहते हुए कि ‘राजा ने मेरा स्पर्श कर लिया, मेरे जीवन को धिक्कार है।’ वे वहाँ से आगे चले गये। इससे राजा को बड़ा क्षोभ हुआ। सार्वभौम भट्टाचार्य ने कहा- ‘आप क्षोभ न करें। यह तो प्रभु की आपके ऊपर असीम कृपा ही है, प्रभु आपको कृतार्थ करने ही यहाँ तक आये थे।’ इस बात से महाराज को सन्तोष हो गया।महाप्रभु अब रथ के चारों ओर परिक्रमा करने लगे। वे स्वयं ही अपने हाथों से रथ को ढकेलने लगे। रथ घर घर, हड़ हड़ करता हुआ जोरों से आगे बढ़ने लगा। महाप्रभु कभी बलभद्र जी के रथ के सम्मुख नृत्य करते, कभी सुभद्रा जी के रथ के सामने और कभी फिर जगन्नाथ जी के रथ के सम्मुख आ जाते। इस प्रकार रथ के साथ नृत्य करते बलगण्डि पहुँच गये। बलगण्डि जाकर रथ खड़ा हो गया। अब भगवान के भोग की तैयारियाँ होने लगीं।
श्रद्धावालू और अर्धासनी देवी के बीच में बालगण्डि नामक एक स्थान है। वहाँ पर भोग लगने का नियम है। उस स्थान पर जगन्नाथ जी करोड़ों प्रकार की वस्तुओं का रसास्वादन लेते हैं। राजा प्रजा, धनी गरीब, स्त्री पुरुष जो भी वहाँ होते हैं, सभी अपनी-अपनी श्रद्धा के अनुसार भगवान का भोग लगाते हैं। जैसी जिसकी इच्छा हो, जो जिस चीज का भी लगा सकता है, उसी चीज का लगाता है। मन्दिर की भाँति सिद्ध अन्न का भोग नहीं लगाता। रास्ते के दायें, बायें, आगे, पीछे वाटिका में जहाँ भी जिसे स्थान मिलता है वहीं भोग रख देता है। उस समय लोगों की बड़ी भारी भीड़ हो जाती है। उसे नियन्त्रण में रखना महा कठिन हो जाता है। महाप्रभु भीड़ को देखकर समीप के ही बगीचे में विश्राम करने के लिये चले गये। भक्तवृन्द भी प्रभु के पीछे पीछे चले। वाटिका में जाकर प्रभु एक सुन्दर से वृक्ष की शीतल छाया में पृथ्वी पर लेट गये। मन्द-सुगन्धित-शीतल पवन के स्पर्श से प्रभु को अत्यन्त ही आनन्द हुआ। वे सुखपूर्वक एक पैर पर दूसरे पैर को रखे हुए लेटे थे।
क्रमशः
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