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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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उन्‍होंने सोचा ‘हमें भक्‍तों के चलने की प्रतीक्षा न करनी चाहिये। ये सब घर गृहस्‍थी के काम करने वाले हैं। तैयारियाँ करते करते इन्‍हें महीनों लग जायँगे।’ इसलिये हमें इनसे पहले ही पहुँचकर प्रभु के दर्शन करना चाहिये।’ यह सोचकर वे कमलाकान्‍त नामक महाप्रभु के एक ब्राह्मण भक्त को साथ लेकर पुरी के लिये चले दिये और रास्‍ते के सभी तीर्थों के दर्शन करते हुए पुरी पहुँच गये।
पुरी पहुँचकर परमानन्‍द जी महाराज प्रभु की खोज करने लगे। फिर उन्‍होंने सोचा- ‘पहले श्रीजगन्‍नाथ जी के मन्दिर में चलकर भगवान के दर्शन कर लें, वहीं प्रभु का पता भी मिल जायगा।’ यह सोचकर वे सीधे श्रीजगन्‍नाथ जी के मन्दिर की ओर चले। मन्दिर में प्रवेश करते ही उन्‍हें अनेक लोगों से घिरे हुए प्रभु दिखायी दिये। पुरी महाराज उसी ओर बढ़े। दूर से ही पुरी को आते देखकर प्रभु ने उठकर उनके चरणों में प्रणाम किया और पुरी ने उन्‍हें प्रेमपूर्वक गले से लगाया। दोनों ही महापुरुष एक दूसरे से मिलकर परम प्रसन्‍न हुए और आनन्‍द में विभोर होकर एक दूसरे की स्‍तुति करने लगे। प्रभु ने कहा- ‘भगवन ! अब आपको वहीं रहकर हमें अपनी संगति से आनन्दित करते रहना चाहिये।’
पुरी महाराज ने प्रसन्‍नता प्रकट करते हुए कहा- ‘यहाँ आने का हमारा और प्रयोजन ही क्‍या है, हम तो यहाँ केवल आपकी संगति से लाभ उठाने के ही निमित्त आये हैं।’ यह सुनकर महाप्रभु पुरी महाराज को साथ लिये हुये भीतर मन्दिर में श्रीजगन्‍नाथ जी के दर्शनों के लिये गये और दर्शन करके प्रदक्षिणा करते हुए अपने निवास स्‍थान पर आये। वहाँ आकर प्रभु ने अपने समीप ही एक स्‍वतन्‍त्र कुटिया श्रीपरमानन्‍द जी महाराज के रहने के लिये दी और उनकी सेवा शुश्रूषा के लिये एक स्‍वतन्‍त्र सेवक भी दिया।प्रभु के आगमन का समाचार काशी तक पहुँच गया था। प्रभु के जो अत्‍यन्‍त ही अन्‍तरंग भक्‍त थे, वे प्रभु का समाचार पाते ही उनकी सेवा में उपस्थित होने के लिये पुरी आने लगे। नवद्वीप के एक पुरुषोत्तमाचार्य नामक प्रभु के अत्‍यन्‍त ही प्रिय भक्‍त और विद्वान ब्राह्मण थे। महाप्रभु के चरणों में उनकी बहुत ही अधिक प्रीति थी। जब महाप्रभु ने संन्‍यास लिया, तब उन्‍हें अत्‍यन्‍त ही दु:ख हुआ। वे अपने दु:ख के आवेश को रोक नहीं सके, प्रभु के बिना उन्‍हें सम्‍पूर्ण नदिया नगरी सूनी सूनी सी दिखायी देने लगी। घर बार तथा संसारी सभी वस्‍तुएं उन्‍हें काटने के लिये दौड़ती-सी दिखायी देने लगीं। वे प्रभु के वियोग से दु:खी होकर श्रीकाशीधाम में चले गये और वहाँ पर स्‍वामी चैतन्‍यानन्‍द जी महाराज से उन्‍होंने संन्‍यास की दीक्षा ले ली। इनके गुरु ने इनका संन्‍यास का नाम रखा ‘स्‍वरूप’। प्रभु ने उसमें पीछे से दामोदर और मिला दिया था, इसलिये भक्‍तों में स्‍वरूप दामोदर के नाम से इनकी ख्‍याति है।

स्‍वामी चैतन्‍यानन्‍द जी जिस प्रकार मस्तिष्‍क प्रधान विचारवान संन्‍यासी हुआ करते हैं, उसी प्रकार के थे, किन्‍तु उनके शिष्‍य स्‍वरूपदामोदर परम सहृदय, हृदय प्रधान और भक्‍त हृदय के पुरुष थे। इसीलिये वे गुरु के पथ का अनुसरण नहीं कर सके। गुरुदेव ने जैसा कि शिष्‍यों को उपदेश करना चा‍हिये वैसा ही अद्वैतवेदान्‍त के विचार और प्रचार का उपदेश किया; किन्‍तु उनका हृदय तो साकार प्रेमस्‍वरुप श्रीकृष्‍ण की भक्ति के लिये तड़प रहा था, इसीलिये वे अपने गुरुदेव की आज्ञा का पालन कर सके। जब उन्‍होंने सुना कि दक्षिण की यात्रा समाप्‍त करके प्रभु पुन: पुरी में आकर निवास करने लगे हैं, तब तो उनसे वाराणसी में नहीं रहा गया और वे अपने गुरुदेव से आज्ञा लेकर पुरी के लिये चल दिये। काशी से पैदल चलकर वे सीधे प्रभु के समीप पहुँचे उन्‍हें देखते ही प्रभु के आनन्‍द का ठिकाना नहीं रहा। महाप्रभु इनसे लिपट गये और और अत्‍यन्‍त ही स्‍नेह के साथ इनका बार बार आलिंगन करने लगे। तब से ये प्रभु के सदा साथ ही रहे।
डस्‍वरूपदामोदर की प्रभु के चरणों में अलौकिक भक्ति थी। इन्‍हें गौरभक्‍त दूसरा विग्रह ही मानते हैं। सचमुच इनमें सभी गुण महाप्रभु के ही अनुरूप थे। इनके शरीर का वर्ण भी महाप्रभु की भाँति गौर था। शरीर इकहरा और मन को स्‍वत: ही अपनी ओर आकर्षित करने वाला था। ये बड़े ही विनयी, सदाचारी और सरस हृदय के थे। विशेष भीड़-भाड़ इन्‍हें पसंद नहीं थी। एकान्‍तवास इन्‍हें बहुत प्रिय था, किन्‍तु प्रभु को छोड़कर ये एक क्षण के लिये भी कहीं नहीं जा सकते थे। ये किसी से भी विशेष बातचीत नहीं करते थे। विद्वान होने के साथ ही ये महान गम्‍भीर थे। महाप्रभु के साथ खाते, उन्‍हीं के साथ बैठते और उन्‍हीं के सेवा में अपना सभी समय व्‍यतीत करते। बारह वर्ष तक जब महाप्रभु सदा विरहावस्‍था में बेसुध बने रहे, तब ये सदा महाप्रभु के सिर को गोद में रखकर सोते थे।महाप्रभु जब राधाभाव में विरह-वेदना से व्‍याकुल होकर रुदन करने लगते तब उन्‍हें ललिताभाव से मनाते और इनके गले में अपनी भुजाओं को डालकर रात भर तक प्रलाप करते रहते। सचमुच गौर भक्‍तों में स्‍वरूपदामोदर का जीवन बड़ा ही भावामय, प्रेममय और प्रणयमय था। यदि निरन्‍तरूप से छाया की तरह ये महाप्रभु के साथ न रहते, तो महाप्रभु की बारह वर्ष की गम्‍भीरा-लीला आज संसार में अप्रकट ही बनी रहती। ये महाप्रभु की नित्‍य की अवस्‍था को कड़चा (दैनन्दिनी) में लिखते गये। वही आज भक्‍तों को परम सुखकारी और मधुरभाव की पराकाष्‍ठा समझाने वाला ग्रन्‍थ स्‍वरूपदामोदर के कड़चा के नाम से प्रसिद्ध है।

महाप्रभु इनके प्रति अत्‍यधिक स्‍नेह था। महाप्रभु के मनोगत भावों को जिस उत्तमता के साथ ये समझ लेते थे, उस प्रकार कोई भी उनके भावों को नहीं समझ सकता था। ‘अमुक विषय में महाप्रभु की क्‍या सम्‍मति होगी।’ इसे ये यों ही सरलतापूर्वक बता देते थे और इसमें प्राय: भूल होती ही नहीं थी। महाप्रभु को भक्तिविहीन भजन, काव्‍य अथवा पद सुनने से घृणा थी, इसलिये महाप्रभु को कुछ सुनाने के पूर्व वह स्‍वरूपदामोदर को सुना दिया जाता। उनकी आज्ञा प्राप्‍त होने पर ही वह पीछे से प्रभु को सुनाया जाता। जैसे ये गम्‍भीर-प्रकृति, शान्‍त और एकान्‍तप्रिय थे वैसे ही इनका कण्‍ठ भी बड़ा मधुर और सुरीला था। ये महाप्रभु को विद्यापति ठाकुर, महाकवि चण्‍डीदास के पद तथा गीत-गोविन्‍द आदि भक्ति सम्‍बन्‍धी ग्रन्‍थों के श्‍लोक गा गाकर सुनाया करते थे।
क्रमशः

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