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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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प्रभु जब तक इनके पदों को नही सुन लेते थे। तब तक उनकी तृप्ति नहीं होती थी। इनके गुण अनंत हैं। महाप्रभु उन्हें ही जान सकते थे। उन्‍हें महाप्रभु ही जान सकते थे। इसीलिये महाप्रभु को इनके आगमन से सबसे अधिक प्रसन्‍नता हुई। प्रभु कहने लगे- ‘तुम आ गये, इससे मुझे कितनी प्रसन्‍नता हूई, उसे व्‍यक्‍त करने में मैं असमर्थ हूँ, सचमुच तुम्‍हारे बिना मैं अन्‍धा था। तुमने आकर ही मुझे आलोक प्रदान किया है। मैं सदा तुम्‍हारे विषय में स्‍वप्‍न में देखा था कि तुम आ गये हो और खड़े खड़े मुसकरा रहे हो, सो सचमुच ही आज तुम आ गये। तुमने यह बड़ा ही उत्तम कार्य किया जो यहाँ चले आये। अब मुझे छोड़कर मत चले जाना।’
प्रेमपूर्ण स्‍वर से धीरे धीरे स्‍वरूपदामोदर ने कहा- ‘प्रभो ! मैं स्‍वयं आपके चरणों में आ ही कैसे सकता हूँ। जब मेरे पाप उदय हुए तभी तो आपके चरणों से पृथक होकर मैं अन्‍यत्र चला गया। अब जब आपने अनुग्रह करके बुलाया है, तो बरबस आपके प्रेमपाश में बँधा हुआ चला आया हूँ और जब तक चरणों में रखेंगे, तब तक मैं कहीं अन्‍यत्र जा ही कैसे सकता हूँ?’ यह कहकर स्‍वरूप प्रभु के चरणों में गिर पड़े। महाप्रभु उन्‍हें उठाकर उनकी पीठ पर धीरे धीरे हाथ फेरते रहे। उस दिन से स्‍वरूपदामोदर सदा प्रभु के समीप ही बने रहे।
एक दिन एक सरल से पुरुष ने आकर प्रभु के चरणों में प्रणाम किया और वह हटकर हाथ जोड़े हुए खड़ा हो गया। महाप्रभु के समीप उस समय सार्वभौम भट्टाचार्य, नित्‍यानन्‍द और बहुत से भक्‍त बैठे हुए थे। महाप्रभु ने उस विनयी पुरुष से पूछा- ‘भाई ! तुम कौन हो और कहाँ से आये हो?’

उस पुरुष ने बड़ी ही सरलता के साथ धीरे धीरे उत्तर दिया- ‘प्रभो ! मैं पूज्‍य श्री ईश्‍वरी पुरी महाराज का भृत्‍य हूँ। पुरी महाराज मुझे ‘गोविन्‍द’ के नाम से पुकारते थे। सिद्धि लाभ करते समय मैंने उनसे प्रार्थना की कि मेरे लिये क्‍या आज्ञा होती है। तब उन्‍होंने मुझे अपनी सेवा में रहने की आज्ञा दी। उनकी आज्ञा शिरोधार्य करके मैं आपके श्रीचरणों में उपस्थित हुआ हूँ। मेरे एक दूसरे गुरुभाई काशीश्‍वर और हैं। वे तीर्थयात्रा करने के निमित्त चले गये हैं। तीर्थयात्रा करके वे भी श्रीचरणों के समीप ही आकर रहेंगे। अब मुझे जैसी आज्ञा हो।’

इतना सुनते ही प्रभु का गला भर आया। उनकी आँखों की कोर अश्रुओं से भीग गयी। पुरी महाराज के प्रेम का स्‍मरण करके वे कहने लगे- ‘पुरी महाराज का मेरे ऊपर सदा वात्‍सल्‍य स्‍नेह रहा है। यद्यपि मुझे मन्‍त्र-दीक्षा देकर न जाने वे कहाँ चले गये; तब से उनके फिर मुझे दर्शन ही नहीं हुए। फिर भी वे मुझे भूले नहीं। मेरा स्‍मरण उन्‍हें अन्‍त तक बना रहा। अहा! अन्‍त समय में उन महापुरुष ने मेरा स्‍मरण किया, इससे अधिक मेरे ऊपर उनकी और कृपा हो ही क्‍या सकती है? मैं अपने भाग्‍य की कहाँ तक प्रशंसा करूँ, मैं अपने सौभाग्‍य की किस प्रकार सराहना करूँ जो अन्‍तर्यामी गुरुदेव ने शरीर त्‍यागते समय भी अपनी वाणी से मेरा नामोच्‍चार किया। सार्वभौम महाशय ! आप ही मुझे सम्‍मति दें कि मैं इनके बारे में क्‍या करूँ। ये मेरे गुरु महाराज के सेवक रहे हैं, इसलिये मेरे भी पूज्‍य हैं, इनसे मैं अपने शरीर की सेवा कैसे करवा सकता हूँ और यदि इन्‍हें अपने समीप नहीं रखता हूँ तो गुरु-आज्ञा का भंग होता है। अब आप ही बताइये मुझे ऐसी दशा में क्‍या करना चाहिये?’

सार्वभौम ने कहा- ‘प्रभो ! ‘गुरोराज्ञा गरीयसी’ गुरु की आज्ञा ही श्रेष्‍ठ है। गोविन्‍द सुशील हैं, नम्र हैं, आपके चरणों में इनका स्‍वाभाविक अनुराग हैं। सेवाकार्य में ये प्रवीण हैं। इसलिये इन्‍हें अपने शरीर की सेवा का अप्राप्‍य सुख प्रदान करके अपने गुरु महाराज की भी इच्‍छापूर्ति कीजिये और इन्‍हें भी आनन्‍द दीजिये।
भट्टाचार्य के इस सम्‍मति को प्रभु ने स्‍वीकार कर लिया और गोविन्‍द को अपने शरीर की सेवा का कार्य सौंपा। उसी दिन से गोविन्‍द सदा प्रभु की सब प्रकार की सेवा करते रहते थे। वे प्रभु से कभी भी पृथक नहीं हुए। बारह वर्ष तक जब प्रभु को शरीर का बिलकुल भी होश नहीं रहा, तब गोविन्‍द जिस प्रकार माता छोटे पुत्र की सब प्रकार की सेवा करती है, उसी प्रकार की सभी सेवा किया करते थे। इनका प्रभु के प्रति वात्‍सल्‍य और दास्‍य दोनों ही प्रकार का स्‍नेह था। ये सदा प्रभु के पैरों को अपनी छा‍ती पर रखकर सोया करते थे। गौड़-देश से भक्त नाना प्रकार की बढ़िया-बढ़िया वस्‍तुएँ प्रभु के लिये बनाकर लाते थे। वे सब गोविन्‍द को ही देते थे और उन्‍हीं की सिफारिश से वे प्रभु के पास तक पहुँचती थीं। वे सब चीजों को बता-बताकर और यह कहते हुए कि अमुक वस्‍तु अमुक ने भेजी हैं, प्रभु को आग्रहपूर्वक खिलाते थे। इनके जैसा सच्‍चा सेवक त्रिलोकी में बहुत ही दुर्लभ है।

एक दिन प्रभु भीतर बैठे हुए थे। उसी समय मुकुन्‍द ने आकर धीरे से कहा- ‘प्रभो ! श्रीमत् केशव भारती जी महाराज के गुरुभाई श्रीब्रह्मानन्‍द जी भारती महाराज आपसे मिलने के लिये बाहर खड़े हैं, आज्ञा हो तो उन्‍हें यहाँ ले आऊँ।’

प्रभु ने जल्‍दी से कहा- ‘वे हमारे गुरुतुल्‍य हैं, उन्‍हें लेने के लिये हम स्‍वयं ही बाहर जायँगे।’ यह कहकर प्रभु अस्‍त व्‍यस्‍त से जल्‍दी जल्‍दी बाहर आये। वहाँ उन्‍होंने मृगचर्म ओढ़े हुए ब्रह्मानन्‍द जी भारती को देखा। महाप्रभु चारों ओर देखते हुए जल्‍दी जल्‍दी मुकुन्‍द से पूछने लगे- ‘मुकुन्‍द, मुकुन्‍द! भारती महाराज कहाँ हैं ? तुम कहते थे, भारती महाराज पधारे हैं, जल्‍दी से मुझे उनके दर्शन कराओ।’
मुकुन्‍द इस बात को सुनकर आश्‍चर्य चकित हो गये। भारती महाप्रभु के सामने ही खड़े हैं, फिर भी महाप्रभु भारती जी के सम्‍बन्‍ध में पूछ रहे हैं। इसलिये उन्‍होंने कहा- ‘प्रभो ! ये भारती महाराज आपके सामने ही तो खडे़ हैं!’

महाप्रभु ने कुछ दृढ़ता के स्‍वर में कहा- ‘नहीं, कभी नहीं; तुम झूठ कह रहे हो। भला, भारती महाराज इस प्रकार मृगचर्म ओढ़कर दिखावा कर सकते हैं।’ प्रभु की इस बात को सुनकर सभी चकित भाव से प्रभु की ओर निहारने लगे। भारती महाराज समझ गये कि प्रभु को मेरा यह मृगचर्माम्‍बर रुचिकर प्रतीत नहीं हुआ है, इसीलिये उन्होंने उसे उसी समय फेंक दिया।
क्रमशः

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