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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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प्रभु ने उसी समय उनके चरणों में प्रणाम किया। वे लज्जितभाव से कहने लगे- ‘आप हमें प्रणाम न करें। आप तो साक्षात ईश्वर हैं।’
प्रभु ने कहा- ‘आप हमारे गुरु हैं, आपको भी प्रणाम न करेंगे तो और किसे करेंगे। हमारे तो साकार भगवान आप ही हैं।’
भारती जी ने कहा- ‘विधि-निषेध तो साधारण लोगों के लिये हैं। आपका गुरु हो ही कौन सकता है?
आप स्वयं ही जगत के गुरु हैं।’ इस प्रकार परस्पर एक दूसरे की स्तुति करने लगे। भारती जी वहीं महाप्रभु के समीप ही रहने लगे। प्रभु ने उनकी भिक्षा आदि की सभी व्यवस्था कर दी।
इसके थोड़े ही दिनों बाद श्रीईश्वरपुरी जी के शिष्य काशीश्वर गोस्वामी भी तीर्थ यात्रा करके महाप्रभु के समीप आ गये। वे शरीर से हृष्ट पुष्ट तथा बलवान थे। प्रभु के प्रति उनका अत्यधिक स्नेह था। उनको भी प्रभु ने अपने समीप ही रखा। इस प्रकार चारों ओर से भक्त आ आकर प्रभु की सेवा में उपस्थित होने लगे।
श्रीजगन्नाथ जी के मन्दिर में नित्यप्रति हजारों आदमियों की भीड़ लगी रहती है। पर्व के दिनों में तो लोगों को दर्शन मिलने दुर्लभ हो जाते हैं। महाप्रभु जब दर्शनों के लिये जाते थे, तब काशीश्वर आगे-आगे चलकर भीड़ को हटाते जाते। महाप्रभु ब्रह्मानन्द भारती, परमानन्द पुरी,नित्यानन्द जी, जगदानन्द जी, स्वरूपदामोदर तथा अन्य सभी भक्तों को साथ लेकर दर्शनों के लिये जाया करते थे। उस समय की उनकी शोभा अपूर्व ही होती थीं। प्रभु अपने सम्पूर्ण परिकर के मध्य में नृत्य करते हुए बड़े ही सुन्दर मालूम होते थे। दर्शनार्थी श्रीजगन्नाथ जी के दर्शनों को भूलकर इन्हीं के दर्शन करते रह जाते थे।
महाराज प्रतापरुद्र को प्रभु दर्शन के लिये आतुरता….
सार्वभौम भट्टाचार्य द्वारा महाप्रभु का परिचय पाकर कटकाधिपति महाराज प्रतापरुद्र जी के हृदय में प्रभु के प्रति प्रगाढ़ भक्ति उत्पन्न हो गयी थी। महाराज वैसे धर्मात्मा थे, विद्याव्यासंगी थे और साधु ब्राह्मणों के प्रति श्रद्धा-भक्ति भी रखते थे; किन्तु कैसे भी सही, थे तो राजा ही। संसारी विषय भोगों में फंसे रहना तो उनके लिये एक साधारण सी बात थी। किन्तु ज्यों ज्यों उनका महाप्रभु के चरणों में भक्ति बढ़ने लगी, त्यों-ही-त्यों उनकी संसारी विषय-भोगों की लालसा कम होती गयी। हृदय की कोठरी में बहुत ही छोटी हैं; जहाँ विषयों की भक्ति हैं, वहाँ साधु महात्माओं के प्रति भक्ति रह ही नहीं सकती और जिनके हृदय में साधु-महात्मा तथा भगवद्भक्तों के लिये श्रद्धा है, वहाँ काम रह ही नहीं सकता। तभी तो तुलसीदास जी ने कहा है-
जहाँ राम तहँ काम नहिं, जहाँ काम नहिं राम।
तुलसी कैसे रहि सकैं, रबि-रजनी इक ठाम।
साधु-चरणों में ज्यों-ज्यों प्रीति बढ़ती जायगी, त्यों ही त्यों अभिमान, बड़प्पन और अपने को सर्वश्रेष्ठ समझने के भाव को होते जायँगे। महाराज के पास बहुत से साधु, पण्डित तथा विद्वान स्वयं ही दर्शन देने और उन्हें आशीवार्द प्रदान करने के लिये उनके दरबार में आते थे, इसीलिये उनकी इच्छा थी कि महाप्रभु भी आकर उन्हें दर्शन दे जायँ; किन्तु महाप्रभु को न तो स्वादिष्ट पदार्थ खाने की इच्दा थी, न वे अपना सम्मान ही चाहते थे और न उन्हें रुपये पैसे की अभिलाषा थी। फिर वे राजदरबार में क्यों जाते। प्राय: लोग इन्हीं तीन कामों से राजा के यहाँ जाते हैं। महाप्रभु इन तीन विषयों को त्यागकर वीतरागी संन्यासी बन चुके थे। संन्यासी के लिये शास्त्रों में राजदर्शनतक निषेध बताया गया है। हाँ, कोई राजा भक्तिभाव से संन्यासियों के दर्शन कर ले यह दूसरी बात है, उस समय उसकी स्थिति राजा की न होकर श्रद्धालु भक्त की ही होगी। स्वयं त्यागी-संयासी राजा से उसकी राजापने की स्थिति में मिलने न जायगा। महाराज को इस बात का क्या पता था। अभी तक उन्हें ऐसा सच्चा संन्यासी कभी मिला ही नहीं था। इसीलिये प्रभु के पुरी में पधारने का समाचार पाकर महाराज ने सार्वभौम भट्टाचार्य के समीप पत्र भिजवाया और उसमें उन्होंने महाप्रभु के दर्शन की इच्छा प्रकट की।
महाराज के आदेशानुसार भट्टाचार्य महाप्रभु के समीप गये और कुछ डरते हुए से कहने लगे- ‘प्रभो ! मैं एक निवदेन करना चाहता हूँ, आज्ञा हो तो कहूँ? आप अभय-दान देंगे तभी कह सकूँगा।’
प्रभु ने हंसते हुए कहा- ‘ऐसी कौन सी बात हैं, कहिये, आप कोई मेरे अहित की बात थोड़े ही कह सकते हैं? जिसमें मेरा लाभ होगा उसे ही आप कहेंगे।’ भट्टाचार्य ने कुछ प्रेमपूर्वक आग्रह के साथ कहा- ‘आपको मेरी प्रार्थना स्वीकार करना पड़ेगी।’
प्रभु ने हंसते हुए कहा- ‘वाह, यह खूब रही, अभी से वचनबद्ध कराये लेते हैं, माननेयोग्य होगी तो मानूँगा, नहीं तो ‘ना’ कर दूँगा और फिर आप ‘ना’ करने योग्य बात कहेंगे ही क्यों?’
प्रभु के इस प्रकार के चातुर्ययुक्त उत्तर को सुनकर कुछ सहमत हुए भट्टाचार्य महाशय कहने लगे- प्रभो ! महाराज प्रतापरुद्र आपके दर्शन के लिये बड़े ही उत्कण्ठित हैं, उन्हें दर्शन देकर अवश्य कृतार्थ कीजिये।’ प्रभु ने कानों पर हाथ रखते हुए कहा- ‘श्रीविष्णु, श्रीविष्णु, आप शास्त्रज्ञ पण्डित होकर भी ऐसी धर्मविहीन बात कैसे कह रहे हैं? राजा के दर्शन करना तो संन्यासी के लिये पाप बताया है। जब आप अपने होकर भी मुझे इस प्रकार धर्मच्युत होने के लिये सम्मति देंगे, तब मैं यहाँ अपने धर्म की रक्षा कैसे कर सकूँगा? तब तो मुझे पुरी का परित्याग ही करना पड़ेगा। भला, संसारी विषयों में फँसे हुए राजा के दर्शन? कैसी दु:ख की बात है? सुनिये-
निष्किञ्चनस्य भगवद्भजनोन्मुखस्य
पारं परं जिगमिषोभवसागरस्य।
संदर्शनं विषयिणामथ योषिताञ्च
हा हन्त हन्त विषभक्षणतोऽप्यसाधु:।
अर्थात ‘जो भगवद्भजन के लिये उत्सुक और अकिंचन होकर इस अपार भवसागर को सम्पूर्ण रूप पार करना चाहते हैं ऐसे भगवान की ओर बढ़ने वाले भक्तों के लिये विषय भोगों में फँसे हुए लोगों का और स्त्रियों का दर्शन, हाय! हाय! विषभक्षण से भी अधिक असाधु है।’ विषभक्षण करने पर तो मनुष्य का इहलोक ही नष्ट होता है, किन्तु इन दोनों के संसर्ग से तो लोक परलोक दोनों ही नष्ट हो जाते हैं। इसलिये भट्टाचार्य महाशय! आप मुझे क्षमा करें।
अत्यन्त ही विनीभाव से भट्टाचार्य सार्वभौम ने कहा- ‘प्रभो ! आपका यह वचन शास्त्रानुकूल ही है किन्तु महाराज परमभक्त हैं। जगन्नाथ जी के सेवक हैं, आपके चरणों में उनका दृढ़ अनुराग है। इन सभी कारणों से वे प्रभु के कृपापात्र बनने के योग्य हैं।
क्रमशः
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