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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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सभी अपने अपने घरों का चार महीने का प्रबन्‍ध करके पुरी जाने के लिये तैयार हो गये।श्रीवास आदि सभी भक्‍तों ने शचीमाता से प्रभु के समीप जाने के लिये विदा मांगी। वात्‍सल्‍यमयी जननी ने अपने संन्‍यासी पुत्र के लिये भाँति-भाँति की वस्‍तुएँ भेजीं। भक्तों ने उन सभी वस्‍तुओं को सावधानीपूर्वक अपने साथ रख लिया और वे माता की चरण-वन्‍दना करके पुरी के लिये चल दिये। लगभग 200 भक्‍त गौरगुण गाते हुए और ढोल करताल के साथ संकीर्तन करते हुए पैदल ही चले। आगे आगे वृद्ध अद्वैताचार्य युवा पुरुष की भाँति प्रभु के दर्शन की उत्‍सुकता के कारण जल्‍दी जल्‍दी चल रहे थे, उनके पीछे सभी भक्‍त नवीन उत्‍साह के साथ-

हरिहरये नम: कृष्‍णयादवाय नम:।
गोपाल गोविन्‍द राम श्रीमधुसूदन।

-इस पद का संकीर्तन करते हुए चल रहे थे। इस प्रकार चलते चलते 20 दिन में वे पुरी के निकट पहुँच गये।इधर भगवान की स्‍नान-यात्रा का समय समीप आ पहुँचा। महाप्रभु बड़ी ही उत्‍सुकता से स्‍नान यात्रा की प्रतीक्षा करने लगे। स्‍नान यात्रा के दिन महाप्रभु अपने भक्‍तों सहित मन्दिर में दर्शन करने के लिये गये। उस दिन के उनके आनन्‍द का वर्णन कौन कर सकता है। महाप्रभु प्रेम में बेसुध होकर उन्‍मत्त पुरुष की भाँति मन्दिर में ही कीर्तन करने लगे। लोगों की अपार भीड़ महाप्रभु के चारों ओर एकत्रित हो गयी। जैसे तैसे भक्त उन्‍हें स्‍थान पर लाये।
स्‍नान यात्रा के अनन्‍तर 14 दिन तक भगवान अन्‍त:पुर में रहते हैं, इसलिये 14 दिनों तक मन्दिर के फाटक एकदम बंद रहते हैं, किसी को भी भगवान के दर्शन नहीं हो सकते। महाप्रभु के लिये यह बात असह्य थी, वे भगवान के दर्शन के लोभ से ही तो पुरी में निवास करते हैं, जब भगवान के दर्शन ही न होंगे, तो वे फिर पुरी में किसके आश्रय से ठहर सकते हैं। फाटक बन्‍द होते ही महाप्रभु की वियोग-वेदना बढ़ने लगी और वह इतनी बढ़ी कि फिर उनके लिये पुरी में रहना असह्य हो गया, वे गोपियों की भाँति विरह के भावावेश में पुरी को छोड़कर अकेले ही अलालनाथ चले गये। वे अपने प्‍यारे के दर्शन न पाने से इतने दु:खी हुए कि उन्‍होंने भक्‍तों की अनुनय विनय की कुछ भी परवाह न की। प्रभु के पुरी परित्‍याग के कारण सभी भक्‍तों को अपार दु:ख हुआ। महाराज प्रतापरुद्र जी ने भी प्रभु के अलालनाथ चले जाने का समाचार सुना। उन्‍होंने भट्टाचार्य सार्वभौम से प्रभु को लौटा लाने के लिये भी कहा। उसी समय गौड़ीय भक्‍तों के आगमन का समाचार सुना। इस संवाद को सुनकर सभी को बड़ी भारी प्रसन्‍नता हुई।

सार्वभौम भट्टाचार्य नित्‍यानन्‍द जी आदि भक्‍तों को साथ लेकर प्रभु को लौटा लाने के लिये अलालनाथ गये। वहाँ जाकर इन लोगों ने प्रभु से प्रार्थना की कि पुरी के भक्‍त तो आपके दर्शन के लिये व्‍याकुल हैं ही, गौड़-देश से भी बहुत से भक्‍त केवल प्रभु के दर्शन के निमित्त आये हैं। यदि वे प्रभु के पुरी में दर्शन न पावेंगे, तो उन्‍हें अपार दु:ख होगा; इसलिये भक्‍तों के ऊपर कृपा करके आप पुरी लौट चलें।
प्रभु ने भक्‍तों की विनय को स्‍वीकार कर लिया। गौड़ीय भक्‍तों के आगमन संवाद से उन्‍हें अत्‍यधिक प्रसन्‍नता हुई और वे उसी समय भक्‍तों के साथ पुरी लौट आये। ‘महाप्रभु पुरी लौट आये हैं’ इस संवाद को सुनाने के निमित्त सार्वभौम भट्टाचार्य महाराज प्रतापरुद्रदेव जी के समीप गये। उसी समय पुरुषोत्तमचार्य जी महाराज के समीप पहुँच गये। आचार्य ने कहा- ‘महाराज ! गौड़ देश के लगभग 200 गौर-भक्‍त पुरी आये हुए हैं। उनके ठहरने की और महाप्रसाद की व्‍यवस्‍था करनी चाहिये क्‍योंकि वे सब के सब महाप्रभु के चरणों में अत्‍यधिक अनुराग रखते हैं और इसीलिये वे आये हैं।’
महाराज ने प्रसन्‍नता प्रकट करते हुए कहा- ‘इसमें मुझसे पूछने की क्‍या बात है? आप स्‍वयं ही सबका प्रबन्‍ध कर दें। मन्दिर के प्रबन्‍धक को मेरे पास बुलाइये। मैं उनसे सबके महाप्रसाद की व्‍यवस्‍था करने के लिये कह दूँगा। जितने भी भक्‍त हों उन सबके प्रसाद का प्रबन्‍ध जब तक वे रहें मन्दिर की ही ओर से होगा। आप काशी मिश्र जी से कह दें। वे ही सब भक्‍तों के ठहरने की व्‍यवस्‍था कर दें।’ इतना कहकर महाराज ने उसी समय सेवकों द्वारा सभी व्‍यवस्‍था करा दी।
महाराज ने भट्टाचार्य से कहा- ‘भट्टाचार्य महाशय ! मैं महाप्रभु के सभी भक्‍तों के दर्शन करना चाहता हूँ, आप उन सबका मुझे परिचय करा दीजिये।

भट्टाचार्य ने कहा- ‘महाराज ! मैं स्‍वयं सब भक्‍तों से परिचित नहीं हूँ। नवद्वीप में मेरा बहुत ही कम रहना हुआ है। हाँ, ये आचार्य गोपीनाथ जी प्राय: सभी भक्‍तों से परिचित हैं, ये आपको सभी भक्‍तों का भलीभाँति परिचय करा देंगे। आप एक काम कीजिये, अट्टालिका पर चलिये, वहीं से सबके दर्शन भी हो जायँगे और आचार्य सबको बताते भी आयेंगे।’
भट्टाचार्य सार्वभौम की यह सम्‍मति महाराज को बहुत पसंद आयी, वे उसी समय अट्टालिका पर चढ़कर कृष्‍ण-प्रेम में विभोर होकर संकीर्तन और नृत्‍य करते करते आती हुई और गौर-भक्‍त-मण्‍डली को देखने लगे। सभी भक्‍त प्रेम में पागल बने हुए थे। सभी के कंधों पर उनके ओढ़ने-बिछाने के वस्‍त्र थे। किसी के गले में ढोल लटक रही है, तो किसी के हाथ में करतालें ही हैं। कोई झाँझो को ही बजा रहा है, तो कोई ऊपर हाथ उठा उठाकर नृत्‍य ही कर रहा है। इस प्रकार भक्‍तों की पृथक-पृथक 14 मण्‍डलियाँ बनी हुई हैं। चौदहों ढोल जब एक साथ बजते हैं तब उनकी गगनभेदी ध्‍वनि से दिशाएँ गूजने लगती हैं।

महाराज अनिमेष दृष्टि से उस गौर-भक्‍त-मण्‍डली की छबि निहारने लगे।

गौड़ीय भक्‍तों ने आगमन का संवाद सुनकर महाप्रभु ने स्‍वरूपदामोदर और गोविन्‍द को चन्‍दन माला लेकर भक्‍तों के स्‍वागत के निमित्त पहले से ही भेज दिया था। उन लोगों ने जाकर भक्‍ताग्रणी श्रीअद्वैताचार्य का सबसे पहले स्‍वागत किया। पहले श्रीस्‍वरूपदामोदर आचार्य के गले में माला पहनायी और फिर गोविन्‍द ने भी श्रद्धापूर्वक आचार्य को माला पहनाकर उनकी चरण वन्‍दना की। आचार्य ने गोविन्‍द को पहले कभी नहीं देखा था, इसलिये वे स्‍वरूपगोस्‍वामी से पूछने लगे- ‘स्‍वरुपगोस्‍वामी ! ये महाभाग भक्‍त कौन है, इन्‍हें तो मैंने पहले कभी नहीं देखा। क्‍या ये पुरी के ही कोई भक्‍त हैं?’
स्‍वरूपगोस्‍वामी ने कहा- ‘नहीं, ये पुरी के नहीं हैं? श्रीईश्‍वरपुरी महाराज के सेवक हैं।
क्रमशः

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