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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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जब वे सिद्धि प्राप्‍त करने लगे तो उन्‍होंने इन्‍हें प्रभु की सेवा में रहने की आज्ञा दी थी। उनकी आज्ञा शिरोधार्य करके ये प्रभु के समीप आ गये और सदा उनकी सेवा में ही लगे रहते हैं। इनका नाम गोविन्‍द है। बड़े ही विनयी, सुशील और सरल है।’ गोविन्‍द परिचय पाकर आचार्य ने उनका आलिंगन किया और सभी को साथ लेकर वे सिंहद्वार की ओर चलने लगे।
महाराज प्रतापरुद्र जी ने आचार्य गोपीनाथ जी से भक्‍तों का परिचय कराने के लिये कहा। आचार्य सभी भक्‍तों का परिचय कराने लगे। वे अंगुली के संकेत से बताने लगे- ‘जिन्‍होंने इन तेजस्‍वी वृद्ध भक्त को माला पहनायी है, ये महाप्रभु के दूसरे स्‍वरूप श्रीस्‍वरूपदामोदर गोस्‍वामी हैं, इनके साथ यह महाप्रभु के सेवक गोविन्‍द हैं। ये आगे आगे जो उत्‍साह के साथ नृत्‍य कर रहे हैं, ये परम भागवत अद्वैताचार्य हैं। इनके पीछे जो ये चार गौरवर्ण के सुन्‍दर से पण्डित हैं, वे श्रीवास, वक्रेश्‍वर, विद्यानिधि और गदाधर हैं। ये चन्‍द्रशेखर आचार्य हैं। महाप्रभु के पूर्वाश्रम के ये मौसा होते हैं। महाप्रभु के चरणों में इनका दृढ़ अनुराग है। ये शिवानन्‍द, वासुदेवदत्त, राघव, नन्‍दन, श्रीमान और श्रीकान्‍तपण्डित हैं।’ इस प्रकार एक एक करके आचार्य सभी भक्‍तों का परिचय कराने लगे। भक्‍तों का परिचय पाकर महाराज को बड़ी प्रसन्‍नता हुई।
उसी समय उन्‍होंने देखा, गौड़ीय भक्‍त श्रीमन्दिर की ओर न जाकर प्रभु के वासस्‍थान की ओर जा रहे हैं और भवानन्‍द के पुत्र वाणीनाथ बहुत सा प्रसाद लिये हुए जल्‍दी-जल्‍दी भक्‍तों से पहले प्रभु के पास पहुँचने का प्रयत्‍न कर रहे हैं। यह देखकर महाराज ने पूछा- ‘आचार्य महाशय!‘ इन लोगों का प्रभु के प्रति कितना अधिक स्‍नेह है। बिना प्रभु को साथ लिये ये लोग अकेले भगवान के दर्शन के लिये भी नहीं जाते हैं। हाँ, ये वाणीनाथ इतना प्रसाद क्‍यों लिये जा रहे हैं?’
आचार्य ने कहा- ‘महाप्रभु प्रसाद द्वारा स्‍वयं इन सबका स्‍वागत करेंगे।’

महाराज ने कहा- ‘तीर्थ में आकर सबसे प्रथम क्षौर उपवास का विधान है, क्‍या उसे ये लोग न करेंगे?’
आचार्य ने कहा- ‘करेंगे क्‍यों नहीं, किन्‍तु प्रभु के प्रेम के कारण उनका सबसे पहले क्षौर ही हो तब प्रसाद पावें ऐसा आग्रह नहीं है। महाप्रभु के हाथ के प्रसाद से ये लोग अपना उपवास भंग नहीं समझते।’
महाराज ने कहा- ‘आप ठीक कहते हैं, प्रेम में नेम नहीं होता।’

इतना कहकर महाराज अट्टालिका से नीचे उतर आये और मन्दिर के प्रबन्‍धक से बहुत सा प्रसाद जल्‍दी से प्रभु के पास और पहुँचाने के लिये कहा। उन लोगों ने पहले से ही सब प्रबन्‍ध कर रखा था। महाराज की आज्ञा पाते ही उन्‍होंने और भी प्रसाद पहुँचा दिया।महाप्रभु अपने भक्‍तों से मिलने के लिये व्‍याकुल हो रहे थे, आज दो वर्ष के पश्‍चात वे अपने सभी प्राणों से भी प्‍यारे भक्‍तों से पुन: मिलेंगे, इस बात का स्‍मरण आते ही प्रभु प्रेम सागर मे डुबकियाँ लगाने लगते। इतने में ही उनके कानों में संकीर्तन की सुमधुर ध्‍वनि सुनायी पड़ी। उस नवद्वीपी ध्‍वनि को सुनते ही, प्रभु को श्रीवास पण्डित के घर की एक एक करके सभी बातें स्‍मरण होने लगीं। प्रभु के हृदय में उस समय भाँति-भाँति के विचार उठ रहे थे, उसी समय उन्‍हें सामने से आते हुए अद्वैताचार्य जी दिखायी दिये। प्रभु ने अपने परिकर के सहित आगे बढ़कर भक्‍तों का स्‍वागत किया। आचार्य ने प्रभु के चरणों में प्रणाम किया, प्रभु ने उनका गाढ़ालिंगन किया और बड़े ही प्रेम से अश्रु-विमोचन करते हुए वे आचार्य से लिपट गये। उस समय उन दोनों के सम्मिलन-सुख का उनके सिवा दूसरा अनुभव ही कौन कर सकता है? इसके अनन्‍तर श्रीवास, मुकुन्‍ददत्त, वासुदेव तथा अन्‍य सभी भक्‍तों ने प्रभु के चरणों में प्रणाम किया। प्रभु सभी को यथायोग्‍य प्रेमालिंगन प्रदान करते हुए सभी की प्रशंसा करने लगे। इसके अनन्‍तर आप वासुदेव जी से कहने लगा- ‘वसु महाशय ! आप लोगों के लिये मैं बड़े ही परिश्रम के साथ दक्षिण देश से दो बहुत ही अदभुत पुस्‍तकें लाया हूँ। उनमें भक्तितत्त्व का सम्‍पूर्ण रहस्‍य भरा पड़ा है।’ इस बात से सभी को बड़ी प्रसन्‍नता हुई और सभी ने उन दोनों पुस्‍तकों की प्रतिलिपी कर ली। तभी से गौरभक्‍तों में उन पुस्‍तकों का अत्‍यधिक प्रचार होने लगा। महाप्रभु सभी भक्‍तों को बार बार निहार रहे थे, उनकी आँखें उस भक्‍त मण्‍डली में किसी एक अपने अत्‍यन्‍त ही प्रिय पात्र की खोज कर रही थीं। जब कई बार देखने पर भी अपने प्रिय पात्र को न पा सकी तब तो आप भक्‍तों से पूछने लगे- ‘हरिदास जी दिखायी नहीं पड़ते, क्‍या वे नहीं आये हैं?’ प्रभु के इस प्रकार पूछने पर भक्‍तों ने कहा- ‘वे हम लोगों के साथ आये तो थे, किन्‍तु पता नहीं बीच में कहाँ रह गये।’ इतना सुनते ही दो चार भक्‍त हरिदास जी की खोज करने चले। उन लोगों ने देखा महात्‍मा हरिदास जी राजपथ से हटकर एक एकान्‍त स्‍थान में वैसे ही जमीन पर पड़े हुए हैं। भक्‍तों ने जाकर कहा- ‘हरिदास! चलिये, आपको महाप्रभु ने याद किया है।’

भक्‍तों के साथ महाप्रभु की भेंट….

अत्‍यन्‍त ही दीनता के साथ कातर स्‍वर में हरिदास जी ने कहा- ‘मैं नीच पतित भला मन्दिर के समीप किस प्रकार जा सकता हूँ? मेरे अपवित्र अंग से सेवा पूजा करने वाले महानुभावों का कदाचित स्‍पर्श हो जायगा, तो यह मेरे लिये असह्य बात होगी।’ मैं भगवान के राजपथ पर पैर कैसे रख सकता हूँ? महाप्रभु के चरणों में मेरा बार बार प्रणाम कहियेगा और उनसे मेरी ओर से निवदेन कर दीजियेगा कि मैं मन्दिर के समीप न जा सकूँगा यहीं कहीं टोटा के समीप पड़ा रहूँगा।’ भक्‍तों ने जाकर यह समाचार महाप्रभु को सुनाया। इस बात को सुनते ही महाप्रभु के आनन्‍द का ठिकाना नहीं रहा। वे बार बार महात्‍मा हरिदास जी के शील, चरित्र तथा अमानी स्‍वभाव की प्रशंसा करने लगे। वे भक्‍तों से कहने लगे- ‘सुन लिया आप लोगों ने, जो इस प्रकार अपने को तृण से भी अधिक नीचा समझेगा, वही कृष्‍णकीर्तन का अधिकारी बन सकेगा।’ इतना कहकर महाप्रभु हरिदास जी के ही सम्‍बन्‍ध में सोचने लगे। उसी समय मन्दिर के प्रबन्‍धक के साथ काशी मिश्र भी वहाँ आ पहुँचे।
क्रमशः

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