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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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मिश्र को देखते ही प्रभु ने कहा- ‘मिश्र जी ! इस घर के समीप जो पुष्‍पोद्यान है उसमें एक एकान्‍त कुटिया आप हमें दे सकते हैं?’
हाथ जोड़े हुए काशी मिश्र ने कहा- ‘प्रभो ! यह आप कैसी बात कह रहे हैं। सब आपका ही तो है, देना कैसा? आप जिसे जहाँ चाहें ठहरा सकते हैं। जिसे निकालने की आज्ञा दें वह उसी समय निकल सकता है। हम तो आपके दोस्‍त हैं, जैसी आज्ञा हमें आप देंगे उसी का पालन हम करेंगे।’

ऐसा कह काशी मिश्र ने पुष्‍पोद्यान में एक सुन्‍दर सी कुटिया हमें आप देंगे उसी का पालन हम करेंगे।’ सभी भक्‍तों के निवास स्‍थान की व्‍यवस्‍था करने लगे। वाणीनाथ, काशी मिश्र तथा अन्‍यान्‍य मन्दिर के कर्मचारी भक्‍तों के लिये भाँति-भाँति का बहुत सा प्रसाद लदवाकर लाने लगे। महाप्रभु जल्‍दी से उठकर हरिदास जी के समीप आये।

हरिदास जी जमीन पर पड़े हुए भगवन्‍नामों का उच्‍चारण कर रहे थे। दूर से ही प्रभु को अपनी ओर आते देखकर हरिदास ने भूमि पर लेटकर प्रभु के लिये साष्‍टांग प्रणाम किया। महाप्रभु ने जल्‍दी से हरिदास जी को अपने हाथों से उठाकर गले से लगा लिया।

हरिदास जी बड़ी ही कातर वाणी में विनय करने लगे- ‘प्रभो ! इस नीच अधम को स्‍पर्श न कीजिये। दयालो ! इसीलिये तो मैं वहाँ आता नहीं था। मेरा अशुद्ध अंग आपके परम पवित्र श्रीविग्रह के स्‍पर्श करने योग्‍य नहीं है।’
महाप्रभु ने अत्‍यन्‍त ही स्‍नेह के साथ कहा- ‘हरिदास! आपका ही अंग परम पावन है, आपके स्‍पर्श करने से करोड़ों यज्ञों का फल मिल जाता है। मैं अपने को पावन करने के निमित्त ही आपका स्‍पर्श कर रहा हूँ। आपके अंग-स्‍पर्श से मेरे कोटि जन्‍मों के पापों का क्षय हो जायगा। आप जैसे भागवत वैष्‍वण का अंग स्‍पर्श देवताओं के लिये भी दुर्लभ है।’ इतना कहकर प्रभु हरिदास जी को अपने साथ लेकर उद्यान वाटिका में पहुँचे और उन्‍हें कुटिया दिखाते हुए कहने लगे- यहीं एकान्‍त में रहकर निरन्‍तर भगवन्‍नाम का जप किया करें। अब आप सदा मेरे ही समीप रहें। यहीं आपके लिये महाप्रसाद आ जाया करेगा। दूसरे भगवान के चक्र के दर्शन करके मन में जगन्‍नाथ जी के दर्शन का ध्‍यान कर लिया करें। मैं नित्‍यप्रति समुद्र स्‍नान करके आपके दर्शन करने यहाँ आया करूँगा।’

महाप्रभु की आज्ञा शिरोधार्य करके हरिदास जी उस निर्जन एकान्‍त स्‍थान में रहने लगे। महाप्रभु जगदानन्‍द, नित्‍यानन्‍द आदि भक्‍तों को साथ लेकर समुद्र स्‍नान निमित्त गये। प्रभु के स्‍नान कर लेने के अनन्‍तर सभी भक्‍तों ने समुद्र स्‍नान किया और सभी मिलकर भगवान के चूड़ा-दर्शन करने लगे। दर्शनों से लौटकर सभी भक्‍त महाप्रभु के समीप आ गये। तब तक मन्दिर से भक्‍तों के लिये प्रसाद भी आ गया था। महाप्रभु ने सभी को एक साथ प्रसाद पाने के लिये बैठाया और स्‍वयं अपने हाथों से भक्‍तों को परोसने लगे। महाप्रभु के परोसने का ढंग अलौकिक ही था। एक एक भक्‍तों के सम्‍मुख दो दो, चार चार मनुष्‍यों के खाने योग्‍य प्रसाद परोस देते। प्रभु के परोसे हुए प्रसाद के लिये मनाही कौन कर सकता था, इसलिये प्रभु अपने इच्‍छानुसार सबको यथेष्‍ट प्रसाद परोसने लगे। परोसने के अनन्‍तर प्रभु ने प्रसाद पाने की आज्ञा दी, किंतु प्रभु के बिना किसी ने पहले प्रसाद पाना स्‍वीकार ही नहीं किया। तब तो महाप्रभु पुरी, भारती तथा अन्‍य महात्‍माओं को साथ लेकर प्रसाद पाने के लिये बैठे।

जगदानन्‍द, दामोदर, नित्‍यानन्‍द जी तथा गोपीनाथाचार्य आदि बहुत से भक्‍त सब लोगों को परोसने लगे। प्रभु ने आज अन्‍य दिनों की अपेक्षा बहुत अधिक प्रसाद पाया तथा भक्‍तों को भी आग्रहपूर्वक खिलाते रहे।
प्रसाद पा लेने के अनन्‍तर सभी ने थोड़ा-थोड़ा विश्राम किया, फिर राय रामानन्‍द जी तथा सार्वभौम भट्टाचार्य आकर भक्‍तों से मिले।प्रभु ने परस्‍पर एक-दूसरे का परिचय कराया। भक्‍त एक दूसरे का परिचय पाकर परम प्रसन्‍न हुए। फिर महाप्रभु सभी भक्‍तों को साथ लेकर जगन्‍नाथ जी के मन्दिर के लिये गये। मन्दिर में पहुँचते ही महाप्रभु ने संकीर्तन आरम्‍भ कर दिया। पृथक पृथक चार सम्‍प्रदाय बनाकर भक्‍तवृन्‍द प्रभु को घेरकर संकीर्तन करने लगे।महाप्रभु प्रेम में विभोर होकर संकीर्तन के मध्य में नृत्य करने लगे। आज महाप्रभु को संकीर्तन में बहुत ही अधिक आनन्द आया। उनके शरीर में प्रेम के सभी सात्त्विक विकार उदय होने लगे। भक्तवृन्द आनन्द में मग्न होकर संकीर्तन करने लगे। पुरी-निवासियों ने आज से पूर्व ऐसा संकीर्तन कभी नहीं देखा था। सभी आश्‍चर्य के साथ भक्‍तों का नाचना, एक दूसरे को आलिंगन करना, मूर्च्छित होकर गिर पड़ना तथा भाँति-भाँति के सात्त्विक विकारों का उदय होना आदि अपूर्व दृश्‍यों को देखने लगे। महाराज प्रतापरुद्र जी भी अ‍ट्टालिका पर चढ़कर प्रभु का नृत्‍य संकीर्तन देख रहे थे। प्रभु के उस अलौकिक नृत्‍य को देखकर महाराज की प्रभु से मिलने की इच्‍छा और अधिकाधिक बढ़ने लगी।

महाप्रभु ने कीर्तन करते करते ही भक्‍तों के सहित मन्दिर की प्रदक्षिणा की और फिर शाम को आकर भगवान की पुष्‍पांजलि के दर्शन किये। सभी भक्‍त एक स्‍वर में भगवान के स्‍तोत्रों का पाठ करने लगे। पुजारी ने सभी भक्‍तों को प्रसादी-माला, चन्दन तथा प्रसादान्‍न दिया। भगवान की प्रसादी पाकर प्रभु भक्‍तों के सहित अपने स्‍थान पर आये। काशी मिश्र ने सायंकाल के प्रसाद का पहले से ही प्रबन्‍ध कर रखा था, इसलिये प्रभु ने सभी भक्‍तों को साथ लेकर प्रसाद पाया और फिर सभी भक्‍त प्रभु की अनुमति लेकर अपने अपने ठहरने के स्‍थान में सोने के लिये चले गये। इस प्रकार गौड़ीय भक्‍त जितने दिनों तक पुरी में रहे, महाप्रभु इसी प्रकार सदा उनके साथ आनन्‍द-विहार और कथा-कीर्तन करते रहे। 

राजपुत्र को प्रेम दान…

मनुष्‍य का एक स्‍वभाव होता है कि वह रहस्‍य की बातें जानने के लियेबड़ा उत्‍कण्ठित रहता है। जो बात सर्वसाधारण को सुलभ है, उसके लिये किसी की उत्‍कण्‍ठा नहीं होती, किन्‍तु यदि वही एकान्‍त में रखकर सर्वसाधारण की दृष्टि से हटा दी जाय तो लोगों की उसके प्रति जिज्ञासा बढ़ती ही जायगी। एक बात और है, जो वस्‍तु जितने ही अधिक परिश्रम से जितनी ही अधिक प्रतीक्षा के पश्‍चात प्राप्‍त होती है उसके प्रति उतनी ही अधिक प्रीति भी होती हैं। वस्‍तुएँ स्‍वयं मूल्‍यवान या अमूल्‍यवान नहीं हैं। उनकी प्राप्ति की सुलभता दुर्लभता देखकर देखकर ही लोगों ने उसका मूल्‍य स्‍थापित कर दिया है।
क्रमशः

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