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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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हमारी ऐसी इच्छा है, आप जल्दी से इसका प्रबन्ध करें।’
महाप्रभु की आज्ञा शिरोधार्य करके काशी मिश्र ने उद्यान के मार्जन के निमित्त झाडू, टोकरी तथा और भी आवश्यकीय वस्तुएँ का प्रबन्ध कर दिया। अब महाप्रभु अपने सभी भक्तों के सहित गुण्टिचा मार्जन के लिये चले। सार्वभौम भट्टाचार्य, राय रामानन्द तथा वाणीनाथ जैसे प्रमुख-प्रमुख गण्यमान्य पुरुष भी प्रभु के साथ हाथ में झाडू तथा खुरापियों को लेकर चले। सबसे पहले तो महाप्रभु ने वहाँ इधर उधर जमी हुई घास को छिलवाया। फिर आपने सभी भक्तों से कहा- ‘सभी एक-एक झाड़ू ले लीजिये और झाड़कर अपना अपना कूड़ा अलग एकत्रित करते जाइये। कूड़े को देखकर ही सबको पुरस्कार अथवा तिरस्कार मिलेगा।’ बस, इतना सुनते ही सभी भक्त उद्यान साफ करने में जुट गये। सभी एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा कर रहे थे, सभी चाहते थे कि मेरा ही नम्बर सर्वश्रेष्ठ रहे। सभी भक्तों के शरीरों से पसीना बह रहा था। महाप्रभु तो यन्त्र की भाँति काम में लगे हुए थे। उनके गौरवर्ण के अरुण कपोल गर्मी और परिश्रम के कारण और भी अधिक अरुण हो गये थे। उनमें से स्वेद-बिन्दु निकल निकलकर प्रभु के सम्पूर्ण शरीर को भिगो रहे थे।महाप्रभु झाड़ू हाथ में लिये कूड़े को इकट्ठा करने में लगे हुए थे। कोई भक्त सफाई करने में प्रमाद करता या सुस्ती दिखाता तो प्रभु उसे मीठा मीठा उलाहना देते। एक पत्ते को भी पड़ा हुआ नहीं देख सकते थे। बीच-बीच में प्रभु भक्तों को प्रोत्साहित भी करते जाते थे। महाप्रभु के प्रोत्साहन को पाकर सभी भक्त दूने उत्साह से काम करने लगते। इस प्रकार बात-की-बात में उद्यान तथा मन्दिर का सभी कूड़ा साफ हो गया। सबके कूड़े का महाप्रभु ने भक्तों के साथ निरीक्षण किया। हिसाब लगाने पर महाप्रभु का ही कूड़ा सबसे अधिक निकला और सबसे कम अद्वैताचार्य का। इस पर हंसी होने लगी। महाप्रभु कहने लगे- ‘ये तो भोलेबाबा हैं। इन्हें एकत्रित करने से प्रयोजन ही क्या? ये तो संहारकारी हैं।’
इस पर खूब हंसी हुई। और भी भाँति-भाँति के विनोद होते रहे।उद्यान तथा मन्दिरों का मार्जन होने के अनन्तर अब धोने की बारी आयी। बहुत से नये घोड़े मन्दिर को धोने के लिये मंगाये गये। सभी भक्त जल से भरे हुए घड़ों को लिये महाप्रभु के पास आने लगे। महाप्रभु अपने हाथों से मन्दिर को धोने लगे। उस समय का दृश्य बड़ा ही चित्ताकर्षक और मनोहर था। बंगाली भक्त वैसे ही शरीर से दूबले पतले थे, तिस पर भी झाड़ू देते देते थक गये थे। वे अपनी ढीली धोती को संभालते हुए एक हाथ से घड़े को लेकर आते। किसी के हाथ में से घड़ा गिर पड़ता, वह फूट जाता है और जल फैल जाता है, उसी समय दूसरा भक्त उसे फौरन नया घड़ा दे देता। कोई कोई जल लाते समय गिरे हुए जल में फिसलकर धड़ाम से गिर पड़ते सभी भक्त उन्हें देखकर ताली बजा बजाकर हंसने लगते। बहुत-से केवल तालाब में से जल भी भरकर लाते थे। बहुत से ख़ाली घड़ों को देने पर नियुक्त थे। बहुत से महाप्रभु के साथ नीचे ऊपर तथा पक्की दीवालों को वस्त्रों से धो रहे थे। सभी भक्त हुंकार के साथ हरि-हरि पुकारते हुए जल भरकर लाते, और जल्दी से नीचे उड़ेल देते। बहुत-से जान-बूझकर प्रभु के पैरों पर ही जल डाल देते और उसे पान कर जाते। महाप्रभु का इसकी ओर ध्यान ही नहीं था, वे अपने ओढ़ने के वस्त्र से भगवान के सिंहासन को धो रहे थे। उसी समय एक सरल से भक्त ने एक घड़ा जल लाकर प्रभु के पैरों पर डाल दिया और सबों के देखते ही-देखते उस पादोदक का पान करने लगा। महाप्रभु की भी दृष्टि पड़ी। उन्होंने उस पर क्रोध प्रकट करते हुए कहा– ‘यह मेरे साथ कैसा अन्याय कर रहे हैं। मुझे पतित करना चाहते हैं।’ इतना कहकर आपने अत्यन्त ही दु:खी होकर स्वरूप दामोदर को बुलाया और उनसे कहने लगे- ‘देखो, तुम्हारे भक्त ने मेरे साथ कैसा घोर अन्याय किया है। मेरे ऊपर भगवत अपराध चढ़ा दिया है। भगवान के मन्दिर में मेरा पादोदक पीया है।’ स्वरूप दामोदर इसे अपराध ही नहीं समझते थे। उनकी दृष्टि में जगन्नाथ जी में और महाप्रभु में किसी प्रकार का अन्तर ही नहीं था, फिर भी प्रभु को शान्त करने के निमित्त उन्होंने उस भक्त पर बनावटी क्रोध प्रकट करते हुए उसे डाँटा और उसका गला पकड़कर बाहर निकाल दिया। इस पर भक्त को बड़ी प्रसन्नता हुई।भगवान के मन्दिर में मेरा पादोदक पीया है।’ स्वरुप दामोदर इसे अपराध ही नहीं समझते थे। उनकी दृष्टि में जगन्नाथ जी में और महाप्रभु में किसी प्रकार का अन्तर ही नहीं था, फिर भी प्रभु को शान्त करने के निमित्त उन्होंने उस भक्त पर बनावटी क्रोध प्रकट करते हुए उसे डाँटा और उसका गला पकड़कर बाहर निकाल दिया। इस पर भक्त को बड़ी प्रसन्नता हुई।
पीछे से भक्तों के कहने पर उसने प्रभु के पैरों में पड़कर क्षमा याचना की। महाप्रभु ने हंसकर उसके गाल पर धीरे से एक चपत जमा दिया। प्रेम के जपत का पाकर वह अपने भाग्य को सराहना करने लगा। इस प्रकार दोनों मन्दिरों को तथा मन्दिर के आंगनों का भलीभाँति साफ किया। जब सफाई हो गयी तब प्रभु ने संकीर्तन करने की आज्ञा दी। सभी भक्त अपने अपने ढोल करतालों को लेकर संकीर्तन करने लगे। सभी भक्त कीर्तन के वाद्यों के साथ उद्दण्ड नृत्य करने लगे। भक्तवृन्द अपने आपे को भूलकर संकीर्तन के साथ नृत्य कर रहे थे। नृत्य करते करते अद्वैताचार्य के पुत्र गोविन्द मूर्च्छित होकर गिर पड़े। उन्हें मूर्च्छित देखकर महाप्रभु ने संकीर्तन को बंद कर देने की आज्ञा दी। सभी भक्त गोविन्द को सावधान करने के लिये भाँति-भाँति के उपचार करने लगे, किन्तु गोविन्द की मूर्छा भंग ही नहीं होती थी। सभी ने समझा कि गोविन्द का शरीर अब नहीं रह सकता। अद्वैताचार्य भी पुत्र को मूर्च्छित देखकर अत्यन्त दु:खी हुए। तब महाप्रभु ने उसकी छाती पर हाथ रखकर कहा- ‘गोविन्द ! उठते क्यों नहीं ! बहुत देर हो गयी, चलो स्नान के लिये चलें।’
बस, महाप्रभु के इतना कहते ही गोविन्द हरि हरि करके उठ पड़े और फिर सभी भक्तों को साथ लेकर प्रभु स्नान करने के लिये गये।
क्रमशः
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