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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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घंटों सरोवर में सभी भक्‍त जलक्रीडा करते रहे। महाप्रभु भक्‍तों के ऊपर जल उलीचते थे और सभी भक्‍त साथ ही मिलकर प्रभु के ऊपर जल की वर्षा करते। इस प्रकार स्‍नान कर लेने के अनन्‍तर सभी ने आकर नृसिंह भगवान को प्रणाम किया और मन्दिर के जगमोहन मे बैठ गये।
उसी समय महाराज ने चार-पाँच आदमियों के लिये जगन्‍नाथ जी का महाप्रसाद भिजवाया। महाप्रभु सभी भक्‍तों के सहित प्रसाद पाने लगे। महाप्रसाद में छूतछात का तो विचार ही नहीं था, सभी एक पंक्ति में बैठकर साथ ही साथ प्रसाद पाने लगे। सार्वभौम भट्टाचार्य भी अपने आचार-विचार और पण्डितप ने के अभिमान को भुलाकर भक्‍तों के साथ बैठकर प्रसाद पा रहे थे। इस पर उनके बहनोई गोपीनाथर्चा ने कहा- ‘कहो, भट्टाचार्य महाशय ! आपका आचार-विचार और चौका-चूल्‍हा कहाँ गया?’
भट्टाचार्य ने प्रसन्‍नता के स्‍वर में कहा- ‘आचार्य महाशय! आपकी कृपा से मेरे चौके-चूल्‍हे पर चौका फिर गया। आपने मेरे सभी पापों को धुला दिया।’

इतने में ही महाप्रभु कहने लगे- ‘भट्टाचार्य के ऊपर अब भगवान की कृपा हो गयी है और इनकी संगति से हम लोगों के हृदय में भी कुछ कुछ भक्ति का संचार होने लगा है।’
इतना सुनते ही भट्टाचार्य जल्‍दी से कहने लगे- ‘भगवत्‍कृपा न होती तो भगवान इस अभिमानी को अपनी चरण सेवा का सौभाग्‍य ही कैसे प्रदान करते? भगवत्‍कृपा का यह प्रत्‍यक्ष प्रमाण है कि साक्षात भगवान अपने समीप बिठाकर भोजन करा रहे हैं।’ इस प्रकार परस्‍पर एक दूसरे की गुप्‍त प्रशंसा करने लगे। भोजन के अनन्‍तर सभी हरिध्‍वनि करते हुए उठे। महाप्रभु का उच्छिष्‍ट प्रसाद गोविन्‍द ने हरिदास जी को दिया और भक्‍तों ने भी थोड़ा थोड़ा बाँट दिया। इसके अनन्‍तर महाप्रभु ने स्‍वयं अपने करकमलों से सभी भक्‍तों को माला प्रदान की और उनके मस्‍तकों पर चन्‍दन लगाया। इस प्रकार उस दिन इस अदभुत लीला को करके भक्‍तों के सहित प्रभु अपने स्‍थान पर आ गये।

श्री जगन्‍नाथ जी की रथ यात्रा….

गुण्टिचा (उद्यान मन्दिर) के मार्जन के दूसरे दिन नेत्रोत्‍सव था। महाप्रभु अपने सभी भक्‍तों को साथ लेकर जगन्‍नाथ जी के दर्शन के लिये गये। पंद्रह दिनों के अनवसर के अनन्‍तर आज भगवान के दर्शन हुए हैं, इससे महाप्रभु को बड़ा ही हर्ष हुआ। वे एकटक लगाये श्रीजगन्‍नाथ जी के मुखारविन्‍द की ओर निहार रहे थे। उनकी दोनों आखों में से अश्रुओं की दो धाराएँ बह रही थीं। उनके दोनों अरुण ओष्‍ठ नवपल्‍लवों की भाँति हिल रहे थे और वे धीरे-धीरे जगन्नाथ जी से कुछ कह रहे थे, मानो इतने दिन के वियोग के लिए प्रेमपूर्वक उलाहना दे रहे हों। दोपहर तक महाप्रभु अनिमेष भाव से भगवान के दर्शन करते रहे। फिर भक्‍तों के सहित आप अपने स्‍थान पर आये और महाप्रसाद पाकर फिर कथा-कीर्तन में लग गये।

दूसरे दिन जगन्‍नाथ जी की रथ यात्रा का दिवस था। प्रभु के आनन्‍द की सीमा नहीं थी। वे प्रात:काल होने के लिये बड़े ही आकुल बने हुए थे। मारे हर्ष के उन्‍हें रात्रिभर नींद ही नहीं आयी।

रात भर वे प्रेम में बेसुध हुए जागरण ही करते रहे। दो घड़ी रात्रि रहते ही आप उठकर बैठ गये और सभी भक्‍तों को भी जगा दिया। शौच स्‍नानादि से निवृत्त होकर सबके साथ महाप्रभु ‘पाण्‍डुविजय’ के दर्शन के लिये चले।

ज्‍येष्‍ठ की पूर्णिमा से लेकर आषाढ़ की अमावस्‍या तक भगवान महालक्ष्‍मी के साथ एकान्‍त में वास करते हैं। प्रतिपदा के दिन नेत्रोत्‍सव होता है तभी जगन्‍नाथ जी के दर्शन होते हैं। द्वि‍तीया या तृतीया को रथ पर चढ़कर भगवान श्रीराधिका जी के साथ एक सप्‍ताह से अधिक निवास करने के लिये सुन्‍दराचल को प्रस्‍थान करते हैं। वही रथ यात्रा कहलाती है! जिस समय रथ जाता है उसे ‘रथ यात्रा’ कहते हैं और विश्राम के पश्‍चात जब रथ लौटकर मन्दिर की ओर आता है उसे ‘उलटी रथ-यात्रा’ कहते हैं।

रथ-यात्रा के समय तीन रथ होते हैं। सबसे आगे जगन्‍नाथ जी का रथ होता है, उनके पीछे बलराम जी तथा सुभद्रा जी के रथ होते हैं। भगवान का रथ बहुत विशाल होता है, मानो छोटा-मोटा पर्वत ही हो। सम्‍पूर्ण रथ सुवर्णमण्डित होती है। उसमें हजारों घण्टा, टाल, किंकिणी तथा घागर बँधे रहते हैं। उसकी छतरी बहुत ऊँची और विशाल होती है। उसमें भाँति-भाँति की ध्‍वजा-पताकाएँ फहराती रहती हैं। वह एक छोटे मोटे नगर के ही समान होता है। सैकड़ों आदमी उसमें खड़े हो सकते हैं। चारों ओर बड़े बड़े शीशे लटकते रहते हैं। सैकड़ों मनुष्‍य स्‍वच्‍छ सफेद चंवरों को डुलाते रहते हैं। उसके चंदवें मूल्‍यवान रेशमी वस्‍त्रों के होते हैं तथा सम्‍पूर्ण रथ विविध प्रकार के चित्रपटों से बहुत ही अच्‍छी तरह से सजाया जाता है। उसमें आगे बहुत ही लम्‍बे और मजबूत रस्‍से बँधे होते हैं, जिन्‍हें मनुष्‍य ही खींचते हैं। भगवान के रथ को गुण्टिचा भवन तक मनुष्‍य ही खींचकर ले जाते हैं। उस समय का दृश्‍य बड़ा ही अपूर्व होता है।प्रात:काल रथ सिंह द्वार पर खड़ा होता है, उसमें ‘दयितागण’ भगवान को लाकर पधारते हैं, जिस समय सिंहासन से उठाकर भगवान रथ में पधराये जाते हैं, उसे ही ‘पाण्‍डु विजय’ कहते हैं। ‘दयिता’ जगन्‍नाथ जी के सेवक होते हैं। ‘दयिता’ वैसे तो एक निम्‍न श्रेणी की जाति है, किन्‍तु भगवान की सेवा के अधिकारी होने के कारण सभी लोग उनका विशेष सम्‍मान करते हैं। उनमें दो श्रेणी हैं, साधारण दयिता तो शूद्रतुल्‍य ही होते हैं, किन्‍तु उनमें जो ब्राह्मण होते हैं, वे ‘दयितापति’ कहलाते हैं। अनवसर के दिनों में वे ही भगवान को बाल भोग में मिष्‍टान्‍न अर्पण करते हैं और भगवान की तबीयत खराब बताकर ओषधि भी अर्पण करते हैं। स्‍नान आदि से लेकर रथ के लौटने के दिन तक उनका श्रीजगन्‍नाथ जी की सेवा में विशेष अधिकार होता है। वे ही किसी प्रकार रस्सियों द्वारा भगवान को सिंहासन पर रथ पर पधराते हैं। उस समय कटक के महाराजा वहाँ स्‍वयं उपस्थित रहते हैं।
महाप्रभु अपने भक्‍तों के सहित ‘पाण्‍डुविजय’ के दर्शन के लिये पहुँचे। महाराज प्रभु के दर्शन की अच्‍छी व्‍यवस्‍था कर दी थी, इसीलिये प्रभु ने भलीभाँति सुविधापूर्वक भगवान के दर्शन किये। दर्शन के अनन्‍तर अब रथ चलने के लिये तैयार हुआ। भारत वर्ष के विभिन्‍न प्रान्‍तों के लाखों नर नारी रथ यात्रा देखने के लिये उपस्थित थे।
क्रमशः

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