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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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चारों ओर गगनभेदी जय ध्वनि ही सुनायी देती थी।भगवान के रथ पर विराजमान होने के अनन्तर महाराज प्रतापरुद्र जी ने सुवर्ण की बुहारी से पथ को परिष्कृत किया और अपने हाथ से चन्दन मिश्रित जल छिड़का। असंख्यों इन्द्र, मनु, प्रजापति तथा ब्रह्मा जिनकी सेवा में सदा उपस्थित रहते हैं, उनकी यदि नीच सेवा को करके महाराज अपने यश और प्रताप को बढ़ाते हैं, तो इसमें कौन सी आश्चर्य की बात है? उनके सामने राजा महाराजाओं की तो बात ही क्या है, ब्रह्मा जी भी एक साधारण जीव हैं। मान सम्मान के सहित उनकी सेवा कोई कर ही क्या सकता है, क्योंकि संसार भर की सभी प्रतिष्ठा उनके सामने तुच्छ से भी तुच्छ है। मान, प्रतिष्ठा, कीर्ति और यश के वे ही उदगम स्थान हैं। ऐश्वर्य से, पदार्थों से तथा अन्य प्रकार की वस्तुओं से कोई उनकी पूजा कर ही कैसे सकता है? वे तो केवल भाव के भूखे हैं।महाराज के पूजा-अर्चा तथा पथ-परिष्कार कर लेने पर गौड़देशीय भक्तों ने तथा भारतवर्ष के विभिन्न प्रान्तों से आये हुए नर नारियों ने भगवान के रथ की रज्जु पकड़ी। सभी ने मिलकर जोरों से ‘जगन्नाथ जी की जय’ बोली। जयघोष के साथ ही असंख्यों घण्टा किंकिणियों तथा टालों को एक साथ बजाता हुआ और घर घर शब्द करता हुआ भगवान का रथ चला। उनके पीछे बलभद्र जी तथा सुभद्रा जी के रथ चले। चारों ओर जयघोष हो रहा था। सम्पूर्ण पथ सुन्दर बालुकामय बना हुआ था। राजपथ के दोनों पार्श्वों में नारियल के सुन्दर सुन्दर वृक्ष बड़े ही भले मालूम पड़ते थे। सुन्दराचल जाते हुए भगवान के रथ की छटा उस समय अपूर्व ही थी। रथ कभी तो जोरों से चलता, कभी धीरे धीरे चलता, कभी एकदम ठहर जाता और लाख प्रयत्न करने पर भी फिर आगे नहीं बढ़ता। भला, जिनके पेट में करोड़-दो-करोड़ नहीं, असंख्यों ब्रह्माण्ड भरे हुए हैं, उन्हें ये कीट पतंग की तरह बल रखने वाले पुरुष खींच ही क्या सकते हैं? भगवान स्वयं इच्छामय हैं, जब उनकी मौज होती है तो चलते हैं, नहीं तो जहाँ के-तहाँ ही खड़े रहते हैं। लोग कितना भी जोर लगावें, रथ आगे को चलता ही नहीं, तब उड़िया भक्त भगवान को लाखों गालियाँ देते हैं। पता नहीं गालियों से भगवान क्यों प्रसन्न हो जाते हैं, गाली सुनते ही रथ चलने लगता है।
महाप्रभु रथ के आगे आगे नृत्य करते हुए चल रहे थे। रथ चलने से पूर्व उन्होंने अपने हाथों से सभी भक्तों को मालाएँ पहनायीं तथा उनके मस्तकों पर चन्दन लगाया। इसके अनन्तर प्रभु ने संकीर्तन मण्डलियों को सात भागों में बाँट दिया।
पहली मण्डली के प्रधान गायक महाप्रभु के दूसरे स्वरूप स्वनामध्य श्रीस्वरूपदामोदर जी थे, उनके दामोदर (दूसरे), नारायण, गोविन्ददत्त, राघव पण्डित और गोविन्दनन्द ये पांच सहायक प्रभु ने बनाये। उस मण्डली के मुख्य नृत्यकारी महामहिम श्रीअद्वैताचार्य थे। बूढ़े होने पर संकीर्तन के नृत्य में वे अच्छे अच्छे भक्तों से बहुत अधिक बढ़ जाते। उनका नृत्य बड़ा ही मधुर होता और वे अपने श्वेत बालों को हिलाते हुए मण्डली के आगे आगे श्रीशंकर जी का-सा ताण्डव-नृत्य करते जाते। दूसरी मण्डली के प्रधान गायक थे श्रीवास पण्डित। उनका शरीर स्थूल था, चेहरे पर से रोब टपकता था और वाणी में गम्भीरता तथा सरसता थी। वे हाथ में मंजीरा लिये हुए सिंह के समान खड़े थे। महाप्रभु ने उनके गंगादास, हरिदास (दूसरे), श्रीमान पण्डित शुभानन्द और श्रीराम पण्डित ये पांच सहायक बनाये। उस मण्डली के प्रधान नर्तक थे श्रीपाद नित्यानन्द जी। अवधूत नित्यानन्द जी अपने लम्बे इकहरे शरीर से नृत्य करते हुए बड़े ही भले मालूम पड़ते थे।तीसरी मण्डली के प्रधान गायक थे गन्धर्वावतार श्रीमुकुन्ददत्त पण्डित। उनके सहायक थे वासुदेव, गोपीनाथ, मुरारी, गुप्त, श्रीकान्त और बल्लभसेन। इस मण्डली में महामहिम महात्मा हरिदास जी प्रधान नृत्यकारी थे। वे अपनी छोटी सी दाढ़ी को हिलाते हुए कूद कूदकर मनोहर नृत्य कर रहे थे। उनका गोल गोल स्थूल शरीर नृत्य में गेंद की भाँति उछल रहा था। वे सिर हिलाकर ‘हरि हरि’ कहते जाते थे। चौथी मण्डली के प्रधान गायक थे श्रीगोविन्द घोष हरिदास, विष्णुदास, दाघव, माधव और वासुदेव उनके सहायक थे। इस मण्डली को नृत्य से टेढ़ी बनाने वाले श्रीवक्रेश्वर पण्डित थे। इनका नृत्य तो अपूर्व ही होता था। ये नृत्य करते करते जमीन में लोट पोट हो जाते। इस प्रकार चार मण्डलियों का तो महाप्रभु ने उसी समय से संगठन किया। तीन मण्डलियाँ पहले से ही बनी हुई थीं। एक तो कुलीन ग्राम की मण्डली थी, जिसके प्रधान गायक थे रामानन्द जी और सत्यराव जी के सहित नृत्य भी करते थे। उनके सहायक कुलीन ग्रामवासी सभी भक्त थे। दूसरी शान्तिपुर की एक मण्डली थी, जिसके प्रधान थे श्री अद्वैताचार्य के स्वनामधन्य पुत्र श्रीअच्युतानन्द जी। वे ही उसमें नृत्यकारी भी थे और शान्तिपुर के सभी भक्त उनके सहायक थे।
तीसरे सम्प्रदाय के प्रधान गायक और नर्तक थे श्रीनरहरि और रघुनन्दन। खण्डवासी सभी उनके अनुगत थे। इस प्रकार सात सम्प्रदायों का सम्मिलित संकीर्तन हो रहा था। चार मण्डलियां तो भगवान के रथ के आगे-आगे संकीर्तन कर रही थीं। एक दायीं ओर, एक बायीं ओर और एक रथ के पीछे पीछे अपनी तुमुल ध्वनि से रथ को आगे बढ़ाने में सहायक हो रही थी।
सातों सम्प्रदायों में साथ ही चौदह ढोल या मादल बजने लगे। असंख्यों मँजीरों की मीठी मीठी ध्वनि उन ढोल-करतालों की ध्वनि में मिल-मिलकर एक प्रकार का विचित्र रस पैदा करने लगी। ढोल बजाने वाले भक्त ढोलों को बजाते-बजाते दुहरे जो जाते थे। उनके पैर पृथ्वी पर टिके रहते और ढोलों को बजाते बजाते पीछे की ओर झुक जाते। नृत्य करने वाले भक्त उछल उछलकर, कूद कूदकर, भावों को दिखा-दिखाकर भाँति-भाँति से नृत्य करने लगे।
महाप्रभु सभी मण्डलियों में नृत्य करते। वे-बात की-बात में एक मण्डली से दूसरी मण्डली में आ जाते और वहाँ नृत्य करने लगते। वे किस समय दूसरी मण्डली में जाकर नृत्य करने लगे, इसका किसी को भी पता नहीं होता। सभी समझते महाप्रभु हमारी ही मण्डली में नृत्य कर रहे हैं। यात्रीगण आश्चर्य के सहित प्रभु के नृत्य को देखते। जो भी देखता वही देखता-का-देखता ही रह जाता। महाप्रभु की ओर से नेत्र हटाने को किसी का जी ही नहीं चाहता।
क्रमशः
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