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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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पीछे से इनकी निर्भीकता और सच्ची लगनके सामने सभी लोगों ने इनके चरणों में सिर नवा दिया।
स्वर्णविणकों के अपनाने से इनका नाम चारों ओर फैल गया और लोग भाँति-भाँति से इनके सम्बन्ध में आलोचना-प्रत्यालोचना करने लगे। सप्तग्राम के आस-पास के गांवों में भगवन्नाम का प्रचार करते हुए ये शान्तिपुर में अद्वैताचार्य के घर आये। आचार्य इन्हें देखते ही पुलकित हो उठे और जल्दीसे इनका दृढ़ आलिंगन करते हुए प्रेम के अश्रु बहाने लगे। दोनों ही महापुरुष प्रेम में विभोर हुए एक-दूसरे का जोरों से आलिंगन कर रहे थे। बहुत देरके अनन्तर प्रेम का आवेग कम होने पर आचार्य कहने लगे- 'निताई! आपने ही वास्तव में महाप्रभु के मनोगत भावों को समझा है, आप महाप्रभु के बाहरी प्राण हैं।' इस प्रकार नित्यानन्द जी की स्तुति करके आचार्य ने उनसे कुछ काल ठहरने का आग्रह किया। अद्वैताचार्य के आग्रहसे नित्यानन्द जी कुछ काल शान्तिपुर में ठहरकर भगवन्नाम और संकीर्तन का प्रचार करते रहे।

आचार्य से विदा होकर नित्यानन्द जी नवद्वीप में आये। नवद्वीप में इनके प्रवेश करते ही कोलाहाल-सा मच गया। चारों ओर से भक्त आ-आकर उनके पास जुटने लगे। इन्होंने सबसे पहले प्रभु के घर जाकर शचीमाता की चरण-वन्दना की। बहुत दिनों के पश्चात् अपने निताई को पाकर माता के सुखकी सीमा न रही। वह इतने बड़े निताईको गोदीमें बिठाकर बच्चों की भाँति उनके मुख पर हाथ फेरती हुई कहने लगी- 'बेटा निताई! निमाई मुझे भूल गया तो भूल गया, तैंने भी मेरी सुधि बिसार दी। बेटा! आज इतने दिनों के पश्चात् तेरे मुख को देखकर मुझे परमानंद हुआ है। अब मैं विश्वरूप और निमाई के संन्यास सभी का भूल गयी। मेरे प्यारे बेटा! अब तू यहीं मेरे पास रहकर संकीर्तन का प्रचार कर और भक्तों के साथ कीर्तन कर। मैं सदा तुझे अपनी आँखों के सामने देखकर सुखी हो सकूँगी।

नित्यानन्द जी ने माता की आज्ञा को प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार कर लिया और वे नवद्वीप में ही हिरण्य पण्डित के घर रहने लगे। नित्यानन्द जी के नवद्वीप में रहने से शिथिल हुई संकीर्तन की ध्वनि फिर जोरों से शब्दायमान होती हुई आकाश में गूंजने लगी। सभी लोग महाप्रभु के सामने जिस प्रकार संकीर्तन में पागल हो जाते थे, उसी प्रकार फिर बेसुध होकर उद्दण्ड नृत्य करने लगे।

नित्यानन्द जी का प्रभाव बहुत अधिक बढ़ गया। अब इनके रहन-सहन में भी परिवर्तन हो गया।वे सुन्दर वस्त्राभूषण धारण करने लगे। खान-पान में भी विविध व्यंजन आ गये। इससे उनकी निन्दा भी हुई। इस प्रकार एक ओर जहाँ इनकी इतनी अधिक ख्याति हुई वहाँ निन्दा भी कम नहीं हुई। यह तो संसार का नियम ही है। जितने मुख होते हैं, उतने ही प्रकार की बातें होती हैं, कार्यार्थी धीर पुरुष लोगों की निन्दा-स्तुति की परवा न करके अपने काम में ही लगे रहते हैं। पीछे से निन्दा करने वाले स्वयं ही निन्दा करने से थककर चुप होकर बैठ जाते हैं। महापुरुषों के कामों में लोक-निन्दा से विध्न न होकर उलटी सहायता ही मिलती है।यदि महापुरुषों के कार्यों की इस प्रकार जोरों से आलोचना और निंदा न हुआ करें तो उन्हें आगे बढ़ने में प्रोत्साहन ही न मिले। निन्दा उन्हें उन्नत बनाने के लिये एक प्रकार की औषधि है किन्तु जो जानबूझकर निन्दित काम करते हैं, ऐसे दम्भी पुरुष कभी भी उन्नत नहीं हो सकते। इसलिये प्रयत्न तो ऐसा ही करते रहना चाहिये कि जहाँ तक हो सके निन्दित कामों से बचते रहें। यदि सच्चे और श्रेष्ठ मार्ग का अनुसरण करते-करते स्वतः ही लोग निन्दा करने लगें, जैसा कि लोगों का स्वभाव है तो उनकी परवा भी न करनी चाहिये। यही बड़े बनने का महान गुरुमंत्र है।

प्रकाशानन्द जी के साथ पत्र-व्यवहार….

मनसि वचसि काये प्रेमपीयूषपूर्णा-
स्त्रिभुवनमुपकारश्रेणिभिः प्रीणयन्तः।
परगुणपरमाणून् पर्वतीकृत्य नित्यं, 
निजहृदि विकसन्तः सन्ति सन्तः कियन्त।

जो मन, वाणी और शरीर में प्रेमरूपी अमृत से भरे हुए हैं, उपकार-परम्पराओं से जो त्रिभुवन को प्रसन्न करते हैं और दूसरों के छोटे-से-छोटे गुण को भी पर्वत के समान विशाल मानकर जो मन-ही-मन प्रफुल्लित होते हैं, ऐसे सच्चे संत इस वसुधातलपर कितने हैं? अर्थात पृथ्वी को अपनी पदधूलि से पावन बनाने वाले ऐसे संत महापुरुष लाखों में कोई बिरले ही होते हैं।

महाप्रभु गौरांगदेव के सार्वभौम भट्टाचार्य ने एक स्रोत में एक सौ आठ नाम बताये हैं। उनमें से एक नाम मुझे अत्यन्त ही प्रिय है वह है 'अदोष-दर्शी'। सचमुच महाप्रभु अदोष-दर्शी थे, वे मुख से ही दूसरों की बुराई न करते हों, यही नहीं, किन्तु वे लोगोंके दोषों की ओर ध्यान नही नहीं देते थे। उनके जीवन मे कटुता कहीं भी नहीं पायी जाती। वे बड़ो के सामने सदा सुशील बने रहते। संन्यासी होने पर भी उन्होंने कभी संन्यासीपने का अभिमान नहीं किया, सदा अपने से ज्ञानवृद्ध और वयोवृद्ध पुरुषों के सामने वे नम्रतापूर्वक बर्ताव करते। सदा उनके लिये सम्मानसूचक सम्बोधन का प्रयोग करते। छोटे भक्तों से अत्यन्त ही स्नेह के साथ और अपने बड़प्पन को भुलाकर इस प्रकार बातें करते कि उस समय अपने में और उसमें किसी प्रकार का भेद-भाव न रहने देते। इन्हीं सब कारणों से तो भक्त इन्हें प्राणों से अधिक प्यार करते और अपने को सदा प्रभु की इतनी असीम कृपा के भार से दबा हुआ-सा समझते।

जहाँ अत्यन्त ही प्रेम होता है, वहीं भगवान प्रकट हो जाते हैं। भगवान का न कोई एक निश्चित रूप है, न कोई एक ही नियत नाम। नाम-रूप से परे होने पर भी उनके असंख्यों रूप हैं और अगणित नाम हैं। जिसे जो नाम प्रिय हो उसी नामरूप द्वारा प्रभु प्रकट हो जाते हैं। भगवान प्रेममय तथा भावमय हैं। जहाँ भी प्रेम हो जाय, जिसमें भी दृढ़ भावना हो जाय, उसके लिये वही सच्चा ईश्वर का स्वरूप है, तभी तो गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा है-

जिन्ह कें रही भावना जैसी। प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी।

जब प्रेमपात्र अपने प्यारे के असीम अनुकम्पा के भार से दबने लगता है, तब उसकी स्वतः ही इच्छा होती है कि मैं अपने प्यारे के गुणों का बखान करूँ। वह ऐसा करने के लिये विवश हो जाता है। उससे उसकी बिना प्रशंसा किये रहा ही नहीं जाता। प्रेम में यही तो विशेषता है।
 क्रमशः

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