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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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प्रेमी अपने आनन्द को सब में बाँटना चाहता है। वह स्वार्थी पुरुष के समान स्वयं अकेला ही उसकी मधुमय मिठास से तृप्त होना नहीं चाहता। दूसरों को भी उस अद्भुत रस का आस्वादन कराने के लिये व्यग्र हो उठता है। उसी व्यग्रता में वह विवश होकर अपने उपास्यदेव के गुण गाने लगता है।
भक्त लोग महाप्रभु में भगवत-भावना रखते थे। इन सबके अग्रणी थे परम शास्त्रवेत्ता श्रीअद्वैताचार्य। इसलिये उन्होंने ही पहले-पहल नीलाचल में ही गौर-संकीर्तन का श्री गणेश किया। तब तक गौरांग के सम्बन्ध के पदों की रचना नहीं हुई थी; इसलिये अद्वैताचार्य ने स्वयं ही निम्न पद बनाया-
श्रीचैतन्य नारायण करुणासागर।
दुःखितेर बन्धु प्रभु मोर दयाकर।।
इस पद की रचना करके सभी भक्तों से उन्होंने इस ताल-स्वर में गवाया। सभी भक्त प्रेम में विभोर होकर इस पद का संकीर्तन करने लगे। महाप्रभु भी कीर्तन की उल्लासमय आनन्दमय सुमधुर ध्वनि सुनकर वहाँ आ पहुँचे। जब उन्होंने अपने नाम का कीर्तन सुना तब तो वे उलटे पैरों ही लौट पड़े।
पीछे कुछ प्रेमयुक्त क्रोध प्रकट करते हुए महाप्रभु श्रीवास पण्डित से कहने लगे- 'आपलोग यह क्या अनर्थ कर रहे हैं, कीर्तनीय तो वे ही श्रीहरि हैं, उनके कीर्तन को भुलाकर अब आपलोग ऐसा आचरण करने लगे हैं, जिससे लोगों में मेरा अपयश हो और परलोक में मैं पाप का भागी बनूँ' इतनेमें ही कुछ गौड़ीय भक्त संकीर्तन करते हुए जगन्नाथ जी के दर्शनों से लौटकर प्रभुके दर्शनों के लिये आ रहे थे।वे जोरों से 'जय चैतन्य की' 'जय सचल जगन्नाथ की' 'जय संन्यासी-वेषधारी कृष्ण की' आदि जय-जयकार करते आ रहे थे। तब श्रीवास ने कहा- 'प्रभो! हमें तो आप जो आज्ञा देंगे वही करेंगे। किन्तु हम संसार का मुख थोड़े ही बंद कर सकते हैं। आप ही बतावें इन्हें किसने सिखा दिया है ?'
इससे महाप्रभु कुछ लज्जित-से होकर चुपचाप बैठे रहे, उन्होंने इस बात का कुछ भी उत्तर नहीं दिया। पीछे ज्यों-ज्यों लोगों का उत्साह बढ़ता गया, त्यों-त्यों भगवान के नामों के साथ निताई-गौर का नाम भी जुड़ता गया। पीछे से तो निताई-गौर का ही कीर्तन प्रधान बन गया।अधिकांश भक्तों का भाव इनके प्रति सचमुच ईश्वरप ने का था। इतने पर भी ये सावधान ही बने रहते। अपने को सदा दासानुदास ही समझते और कभी किसी के सामने अपनी भगवत्ता स्वीकार नहीं करते। इनके भक्त भिन्न-भिन्न प्रकृति के थे। बहुत-से तो इन्हें वात्सल्य भाव से ही प्यार करते, ये भी उन्हें सदा पितृभाव से पूजते तथा मानते थे।
दामोदर पण्डित को प्रभु ने उन्हें घर पर माता की सेवा-शुश्रूषा के निमित्त नवद्वीप भेज दिया था। एक बार जब वे पुरी में प्रभु से मिलने आये तो वैसे ही बातों-ही-बातोंमें माता का कुशल समाचार पूछते-पूछते प्रभु ने कहा- 'पण्डित जी! माता कृष्ण-भक्ति करती हैं न ?' बस फिर क्या था, दामोदर पण्डित का क्रोध आवश्यकता से अधिक बढ़ गयावे माता के चरणों में बड़ी श्रद्धा रखते थे और स्पष्ट वक्ता ऐसे थे कि प्रभु का जो भी कार्य उन्हें अशास्त्रीय या अनुचित प्रतीत होता उसे उसी समय सबके सामने ही कह देते। प्रभु के ऐसा पूछने पर उन्होंने रोष के साथ कहा- 'प्रभो! माता की भक्ति के सम्बन्ध में आप पूछते हैं ? तो सच्ची बात तो यह है कि आप में जो कुछ थोड़ी-बहुत भगवद्-भक्ति दीखती है, यह सब माता की ही कृपा का फल है।'
प्रकाशानन्द जी के साथ पत्र-व्यवहार…
दामोदर पण्डित के ऐसे उत्तर को सुनकर प्रभु प्रेम में विभोर हो गये और प्रेममयी माता के स्नेह का स्मरण करते हुए गद्गदकण्ठ से कहने लगे- पण्डित जी! आपने बिलकुल सत्य बात कह दी। अहा, माता की भक्ति को कोई क्या समझ सकेगा? आपने ही यथार्थ में माता को समझाया है। सचमुच मेरे हृदय में जो भी कुछ कृष्ण-भक्ति है वह माता का ही प्रसाद है। हाय! ऐसी प्रेममयी जननी को भी छोड़कर मैं चला गया।' इतना कहते-कहते प्रभु वस्त्र से मुख ढककर रुदन करने लगे।
यह महापुरुषकी दशा है, जिन्हें भक्त साक्षात 'सचल जगन्नाथ' समझते थे। उन्होंने दामोदर पण्डित के इस रूखे उत्तर को कुछ भी बुरा न मानकर उलटी उनकी प्रशंसा ही की। तभी तो आज असंख्यों पुरुष गौर-चरणों का आश्रय ग्रहण करके असीम आनन्द का अनुभव कर रहे हैं और अपने मनुष्य-जीवन को धन्य बना रहे हैं।महाप्रभु की ख्याति दूर-दूर तक फैल गयी थी। साधारण जनता में ही नहीं, किन्तु विद्वन्मण्डली में भी इनके अद्भुत प्रभाव की चर्चा होने लग गयी थी। सार्वभौम भट्टाचार्य की विद्वत्ता, धारणा शक्ति और पढ़ाने की सुगम और सरल शैली की सर्वत्र प्रसिद्धि हो चुकी थी। काशी के विद्वत्समाज में उनका नाम गौरव के साथ लिया जाता था। उन दिनों काशी में प्रकाशान्द सरस्वती नामक एक दण्डी संन्यासी परम विद्वान और वेदान्त-शास्त्र के प्रकाण्ड पण्डित थे। वे सार्वभौम की अलौकिक प्रतिभा और प्रचण्ड पाण्डित्य से परिचित थे।
उन्होंने जब सुना कि पुरी में एक नवीन अवस्था का युवक संन्यासी विराजमान है और सार्वभौम-जैसे विद्वान अपने वेदान्त-ज्ञान को तुच्छ समझकर उनके चरणों में भक्ति करते हैं और उसे साक्षात ईश्वर समझते हैं, तब तो उन्हें बड़ा कुतूहल हुआ। तब तक उनकी अद्वैत-वेदान्त में निष्ठा थी, वैसे वे सरस और प्रेमी हृदय के थे, किन्तु अभी तक उनकी सरसता छिपी ही हुई थी, उसे किसी भारी चीज की ठेस नहीं लगी थी, जिससे वह छलकर प्रस्फुटित हो सकती। उन्होंने कौतुकवश एक श्लोक लिखकर जगन्नाथ जी आने वाले किसी गौड़ीय भक्त के हाथों प्रभु के पास भेजा। वह श्लोक यह था-
यत्रास्ते मणिकर्णिका मलहरी स्वर्दीर्घिका दीर्घिका,
रत्नं तारकमोक्षदं मृततनौ शम्भुः स्वयं यच्छति।
एतत्त्वद्भुतमेव यत् सुरपुरान्निर्वाणमार्गस्थितान्
मूढोऽन्यत्र मरीचिकासु पशुवत् प्रत्याशया धावति।
इस श्लोक में ज्ञान को प्रधानता दी गयी और मोक्ष को ही परम पुरुषार्थ बताकर उसी की प्राप्ति के लिये संकेत किया गया है। इसका भाव यह है- 'जिस स्थान पर मर्णिकर्णिका कुण्ड और पाप-ताप-हारिणी स्वर्दीर्घिका भगवती भागीरथी हैं, जहाँ मुर्दे को देवाधिदेव भगवान शूलपाणि स्वयं मोक्ष देने वाले तारकरत्नको प्रदान करते हैं, मूर्खलोग ऐसी परमपावन मोक्ष के मार्ग में स्थित सुरपुरी का परित्याग करके पृथ्वी पर पशु के समान इधर-उधर भटकते फिरते हैं, यही आश्चर्य है।'
क्रमशः
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