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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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उन्होंने प्रभु से यह वचन ले लिया कि यहाँ आकर जो कोई भी आप से अपने पूर्वकृत अपराधों के लिये क्षमा-याचना करेगा, उसे आप कृपापूर्वक क्षमा-दान दे देंगे।महाप्रभु के विशाल हृदय में किसी के पूर्वकृत अपराधों का स्मरण ही नहीं था, वे महापुरुष थे। वे संसारी लोगों के स्वभाव से विवश होकर कहे हुए वचनों का बुरा ही क्यों मान ने लगे ? वे तो जानते थे- 'सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि'  ज्ञान पुरुष भी अपनी प्रकृति के अनुसार ही सभी चेष्टाएँ करता है, इसलिये किसी की कैसी भी बात को बुरा न मानना चाहिये। फिर भी उन्होंने देवानन्द जी की प्रसन्नता के निमित्त अपराध-भंजन की स्वीकृति दे दी। सभी ने प्रभु के चरणों में आत्म-समर्पण किया और प्रभु ने उन्हें गले से लगाया।

प्रभु के छोटे-बड़े सभी भक्त तथा भक्तों की स्त्रियां-बच्चे यहाँ कुलिया में आकर उन के दर्शन कर गये थे। शचीमाता  शान्तिपुर में ही मिल आयी थीं। कोई भी भक्त प्रभुदर्शनों से वंचित नहीं रहा। महाप्रभु पांच-सात दिन कुलिया में ठहरे। इतने दिनों तक कुलिया में मेला-सा ही लगा रहा। इतने पर भी एकान्त में प्रभु का चिन्तन करती हुई विष्णुप्रिया जी अपने घर के भीतर ही बैठी रहीं। वे एक सती-साध्वी कुलवधू की भाँति घर से बाहर नहीं निकलीं, मानों उन्हीं को अप ने दर्शनों से कृतार्थ कर ने के निमित्त प्रभु ने नवद्वीप जा ने की इच्छा प्रकट की। भक्तों के आनन्द का ठिकाना नहीं रहा। उसी समय नौका मंगायी गयी और प्रभु अपने दस-पांच अन्तरंग भक्तों के साथ गंगापार कर के नवद्वीप घाट पर पहुँचे।घाट की सीढ़ियों पर चढ़कर प्रभु शुक्लाम्बर ब्रह्मचारी की कुटिया पर पहुँचे। ब्रह्मचारी जी अपने भाग्य की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए प्रभु के पैरों में लोट-पोट होने लगे। क्षणभर में ही यह समाचार सम्पूर्ण नगर में फैल गया। लोग चारों ओर से आ-आकर प्रभु के दर्शनों से अपने को कृतार्थ मानने लगे। समाचार पाते ही शचीमाता भी जैसे बैठी थीं, वैसे ही दौड़ी आयीं। प्रभु ने माता की चरण-वन्दना की। माता अपने अश्रुओं से प्रभु के वस्त्रों को भिगो ने लगी। प्रभु चुपचाप खड़े कुछ सोच रहे थे, किसी की कुछ कहने की हिम्मत नहीं हुई।

तब प्रभु पैरों में खड़ाऊं पहने धीरे-धीरे शचीमाता के साथ घर की ओर चल ने लगे। एक-एक करके उन्हें सभी बातें स्मरण हो ने लगीं। पांच-छः वर्ष पूर्व जिस घाट पर वे स्नान करते थे वह घाट इतने आदमियों के रहने पर भी सूना-सा प्रतीत हुआ। सभी पूर्व- परिचित वृक्ष हिल-हिलकर मानो प्रभु का स्वागत कर रहे हों। वे ही भवन, वे ही अट्टालिकाएं, वे ही प्राचीन पथ, वे ही देवस्थान प्रभु की स्मृति को फिर से नूतन बना ने लगे।महाप्रभु नीची निगाह किये हुए आगे-आगे जा रहे थे। पीछे से लोगों की अपार भीड़ हरिध्वनि करती हुई आ रही थी। घर के सामने आकर प्रभु खड़े हो गये। विष्णुप्रिया जी का दिल धड़क ने लगा। वे अपने प्रेम के इतने भारी वेग को सहन करने में समर्थ न हो सकीं। झरोखे में से उन्होंने अपने जीवनसर्वस्व की झांकी की। सिर मुंड़े हुए और गेरूए वस्त्र धारण किये प्रभु को विष्णुप्रिया जी ने अभी सर्वप्रथम देखा है। उनके प्रकाशमान चेहरे को देखकर विष्णुप्रिया जी चित्र में लिखी मूर्ति के ही समान बन गयीं। उनके नेत्रों में से निकलने वाले निरन्तर के अश्रुकण ही उन की सजीवकता का समर्थन कर रहे थे।
विष्णुप्रिया जी की इच्छा अपने प्राणेश के पाद-पद्यों में प्रणत होकर कुछ प्रार्थना करने की थी, किन्तु इतनी अपार भीड़ में कुल-वधू बाहर कैसे जाय, यही सोचकर वे दुविधा में पड़ गयीं। फिर उन्होंने सोचा, जब वे यहाँ तक आये हैं, संन्यासी होकर भी उन्होंने इतनी अनुकम्पा की है, तब मुझे बाहर जाने में अब क्या लाज? लोक-लाज सब इन्हीं के चरणों की प्राप्ति के ही निमित्त तो हैं, जब ये चरण साक्षात सम्मुख ही उपस्थित हैं, तब इन के स्पर्श-सुख से अपने को वंचित क्यों रखूं? यह सोचकर विष्णुप्रिया जी जैसे बैठी थीं वैसे ही प्रभु के पादपद्यों का स्पर्श करने चलीं।उन्होंने वेणी बांधना बन्द कर दिया था, शरीर के सभी अंगों के आभूषण उतार दिये थे, आहार भी बहुत ही कम कर दिया था। नित्य के कम आहार से उनका शरीर क्षीण हो गया था। वे निरन्तर प्रभु का ही ध्यान किया करती थीं।प्रभु-दर्शनों की लालसा से क्षीण काय, मलिनवसना विष्णुप्रिया जी अपने सम्पूर्ण शरीर को संकुचित बनाती हुई जल्दी से प्रभु की ओर चलीं। प्रभु दृष्टि उठाकर किसी की ओर नहीं देखते थे, वे पृथ्वी की ही ओर खड़े-खड़े ताक रहे थे। उसी समय उन्होंने देखा, मलिन वस्त्र पहने एक स्त्री उन के चरणों में आकर गिर पड़ी। स्त्री-स्पर्श से भयभीत होकर प्रभु दो कदम पीछे हट गये। विष्णुप्रिया जी सुबकियां भर-भरकर धीरे-धीरे रुदन कर ने लगीं। प्रभु ने भर्राई हुई आवाज में पूछा- 'तुम कौन हो?'

हाय रे वैराग्य! तेरी ऐसी कठोरता को बार-बार धिक्कार है, जो अप ने शरीर का आधा अंग कही जाती है, जिस के लिये स्वामी को छोड़कर दूसरा कोई है ही नहीं, उसी का निर्दयी स्वामी, उस के जीवन का सर्वस्व, उस का इष्टदेव उस से पूछता है- तुम कौन हो? आकाश! तू गिर क्यों नहीं पड़ता? पृथ्वी! तू फट क्यों नहीं जाती? विष्णुप्रिया जी चुप नहीं, सोचा, कोई दूसरा ही मेरा परिचय करा दे, किन्तु दूसरे किस की हिम्मत थी? सभी की वाणी बंद हो गयी थी। इतनी भारी भीड़ उस समय बिलकुल शान्त हो गयी थी, चारों ओर सन्नाटा छाया हुआ था। विष्णुप्रिया जी ने जब देखा, कोई भी कुछ नहीं कहता, तब वे स्वयं ही धीरे-धीरे करूण-स्वर में कहने लगीं- 'मैं आप के चरणों की अत्यन्त ही क्षुद्र दासी हूँ!'

महाप्रभु को अब चेत हुआ, उन्होंने कुछ ठहरकर कहा- 'तुम क्या चाहती हो।' अत्यन्त ही कातरवाणी में उन्होंने कहा- 'मैं आपकी कृपा चाहती हूँ।' 
प्रभु ने नीची दृष्टि किये हुए कहा- 'विष्णुप्रिये! तुम अप ने नाम को सार्थक करो। संसार में विष्णु-भक्ति ही सार है, उसी को प्राप्त कर के इस जीवन को सफल बनाओ।' 
क्रमशः

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