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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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रोते-रोते विष्णुप्रिया जी ने कहा- 'आप के अतिरिक्त कोई दूसरे विष्णु हैं, इस बात को मैं नहीं जानती, और जानने की इच्छा भी नहीं हैं। मेरे तो विष्णु, कृष्ण, शिव जो भी कुछ हैं आप ही हैं। आपके चरणों के अतिरिक्त मुझे कोई दूसरा आश्रय नहीं।'
इन हृदय विदारक वचनों को सुनकर वहाँ खड़े हुए सभी स्त्री-पुरुषों का हृदय फट ने लगा। सभी के नेत्रों से जल-धारा बहने लगी।
विष्णुप्रिया जी ने फिर कहा- 'प्रभो! सुना है, आप जगत का उद्धार करते हैं, फिर अभागिनी विष्णुप्रिया को जगत से बाहर क्यों निकाल दिया गया हैं, इस के उद्धार की बारी क्यों नहीं आती?'
प्रभु ने कहा-'तुम्हारी क्या अभिलाषा है?'
सुबकियाँ भरते हुए ठहर-ठहरकर विष्णुप्रिया जी ने कहा- 'मुझे जीवन-यापन कर ने के लिये कुछ आधार मिलना चाहिये। आपके चरणों में यह कंगालिनी भिखारिणी उसी की भीख मांगती है।'
थोड़ी देर सोचकर प्रभु ने अपने पैरों के दोनों खड़ाउओं को उतारते हुए कहा- 'देवि! हम संन्यासियों के पास तुम्हें देने के लिये और है ही क्या? यह लो तुम इन पादुकाओं के ही सहारे अपने जीवन को बिताओ।'
इतने सुनते ही विष्णुप्रिया जी ने धूलि में सने हुए अपने मस्तक को ऊपर उठाया और कांपती हुई उँगलियों से उन दोनों खड़ाउओं को सिर पर चढ़ाकर वे रुदन करने लगीं। उस समय जनसमूह में हाहाकर मच गया, सभी चीत्कार मारकर रुदन कर ने लगें।प्रभु उसी समय माता को प्रणाम कर के लौट पड़े। माता अपने प्यारे पुत्र को जाते देखकर मूर्च्छित हो पृथ्वी पर गिर पड़ी, प्रभु पीछे की ओर बिना देखे हुए ही जल्दी से भीड़ को चीरते हुए आगे को चलने लगे। बहुत- से भक्त जल्दी से आगे चलकर लोगों को हटाने लगे। इस प्रकार थोड़ी देर ही नवद्वीप में ठहरकर प्रभु नाव से उस पार पहुँच गये और वृन्दावन जाने की इच्छा से गंगा जी के किनारे-किनारे ही आगे की ओर चलने लगे। सैकड़ों मनुष्य घर-बार की कुछ भी परवा न कर के उसी समय प्रभु के साथ-ही-साथ वृन्दावन जाने की इच्छा से उन के पीछे-पीछे चलने लगे। इस प्रकार तुमुल-हरिध्वनि करते हुए सागर के समान वह अपार भीड़ प्रभु के पथ का अनुसरण करने लगी।
वृन्दावन के पथ में…..
पुरी से बहुत- से भक्त प्रभु के साथ वृन्दावन जाने की इच्छा से आये थे और बहुत- से भक्त नवद्वीप से उन के साथ हो गये थे, इसलिये प्रभु के साथ वृन्दावन चलने वालों की एक खासी भीड़ हो गयी थी। जिस प्रकार राजा, महाराजा और सामन्तगण विजयलाभ करने के लिये दूसरे देश पर चढ़ाई करते हैं, उसी प्रकार श्रीकृष्ण प्रेम में विभोर हुए भक्त प्रभु के साथ आनन्द और उत्साह के साथ वृन्दावन की ओर जा रहे थे। गंगा जी के किनारे-किनारे कार्तिक मास की शरीर को सुहावनी लगने वाली धूप में सभी संकीर्तन करते हुए दौड़ लगा रहे थे। जिनके साथ साकार स्वरूप धारण कर के प्रेमदेव चल रहे हों उनके आनन्द का अनुमान लगा ही कौन सकता है? जिस गांव में मध्याह्न होता, वहीं पड़ाव पड़ जाता। बात- की-बात में ग्रामवासी प्रभु के सभी साथियों के भोजन आदि का प्रबन्ध कर देते।महाप्रभु भिक्षा कर के और ग्रामवासियों को श्रीकृष्णप्रेम प्रदान कर के आगे चल देते। इस प्रकार अनेक ग्रामों को अपनी पद-धूलि से पावन बनाते हुए तथा ग्रामवासियों को भगवन्नाम-सुधा पिलाते हुए अपने प्यारे की दर्शन-लालसा से प्रभु प्रेम में उन्मत्त हुए आगे बढ़ रहे थे।
एक दिन भिक्षा करने के अनन्तर मुख-शुद्धि के निमित्त प्रभु ने गोविन्दघोष की ओर हाथ बढ़ाया। घोष महाशय जानते थे कि प्रभु भिक्षा के अनन्तर मुख-शुद्धि के निमित्त कुछ अवश्य खाते हैं, इसलिये वे गाँव से एक हरीत की हरै मांग लाये थे। उन्होंने हरीतकी का एक टुकड़ा प्रभु के हाथ पर रख दिया, प्रभु उसे खा गये।
दूसरे दिन फिर प्रभु ने भिक्षा के अनन्तर हाथ बढ़ाया। घोष महोदय ने दूसरे दिन की बची हुई आधी हरीत की अपने वस्त्र के छोर में बांध रखी थी, प्रभु के हाथ बढ़ाते ही उन्हों ने जल्दी से उसे वस्त्र में से खोलकर उन के हाथ पर रख दी। हरीतकी के टुकड़े को देखकर प्रभु हाथ को ज्यों- का-त्यों ही किये रहे। उन्होंने उसे मुंह में नहीं डाला। थोड़ी देर सोचकर वे कहने लगे- 'गोविन्द! यह हरीत की तुम ने कहाँ पायी ?'
अत्यन्त ही नम्रता के साथ घोष महाशय ने कहा- प्रभो! कल की शेष बची हुई हरीत की हम ने बांध रखी थी, वही यह है।'
प्रभु ने कुछ गम्भीरता के साथ कहा-'तुम ने कल की आज के लिये क्यों बांध रखी?'
गोविन्द प्रभु की गम्भीर चेष्टा को देखकर डर गये, उन्होंने कुछ भी उत्तर नहीं दिया, वे उदास-भाव से पृथ्वी की ओर देखने लगे। तब प्रभु उसी स्वर में धीरे-धीरे कह ने लगे- 'जिनकी संग्रह करने की आदत हो जाती है, वे साधु हो ने पर भी अपनी आदत को नहीं छोड़ते। अभी तुम्हारी संग्रह कर ने की इच्छा कम नहीं हुई। साधु के लिये संग्रह करना दूषण है और गृहस्थ को थोड़ा-बहुत संग्रह करना भूषण है। इसलिये अब तुम मेरे साथ नहीं रह सकते। यहीं कहीं कुटिया बनाकर रह जाओ और विवाह कर के अनासक्त-भाव से भगवत-प्रीत्यर्थ कार्य करो।'
इस बात को सुनते ही गोविन्द जोरों से रुदन करने लगे। प्रभु ने उन की पीठ पर हाथ फेरते हुए कहा- मैंने तो वैसे ही कह दिया, तुम स्वयं बड़े भगवान हो, तुम ने मेरे स्नेह के वशीभूत होकर ही ऐसा आचरण किया। कोई बात नहीं है, तुम यहीं रहकर भगवान गोपीनाथ जी की सेवा-पूजा करो। भगवान की सेवा के लिये विवाह किया जाय, तो उस में हानि ही क्या है? गोविन्द घोष ने प्रभु की आज्ञा शिरोधार्य की और गंगा-किनारे कुटिया बनाकर वे रहने लगे। प्रभु-आज्ञानुसार उन्होंने विवाह भी किया। एक पुत्र को छोड़कर उन की पतिव्रता पत्नी परलोकगामिनी बन गयी। कुछ काल के अनन्तर पुत्र ने भी माता के पथ का अनुसरण किया।पुत्र शोक से दुःखी होकर भगवान की सेवा-पूजा छोड़कर वे प्राण त्यागने के लिये उद्यत हो गये।
क्रमशः
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