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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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उन्होंने न तो भगवान को ही भोग लगाया और न स्वयं ही कुछ खाया। तब एक दिन स्वप्न में भगवान ने कहा- 'तुमने हमारी सेवा व्यर्थ में ही स्वीकार की। एक पिता बहुत-से पुत्रों से प्यार करता है और उनका समानभाव से लालन-पालन भी करता है, किन्तु हम तो इकलौते पुत्र हैं। हम अपने दूसरे भाई को नहीं देख सकते। हम एक बेटे वाले बाप के ही पुत्र बनकर रह जाते हैं। हमारा बाप हमारे किसी दूसरे भाई की इच्छा करे यह हमें पसंद नहीं हैं। इसीलिये हमारे दूसरा पुत्र कैसे रह सकता था ? एक पुत्र तो मर ही गया, अब हमें भी मरना चाहते हो, तो तुम्हारी इच्छा।वैसे हम तुम्हारे पण्डिदान और श्राद्धादि कर्म करने के लिये स्वयं ही उपस्थित हैं, फिर दूसरे पुत्र का क्या करोगे?'
इस बात से गोविन्द जी को सन्तोष हुआ और वे फिर पूर्ववत भगवान की सेवा-पूजा करने लगे। गोविन्द घोष की मृत्यु के अनन्तर भगवान ने पुत्ररूप से स्वयं उन के सभी श्राद्धादि कर्म कराकर अपनी भक्तवत्सलता को सार्थक किया। धन्य है ऐसे गोपीनाथ को और धन्य है उन महाभाग गोविन्द घोष को जिन की भक्ति के कारण जगत-पिता ने पु़त्ररूप से उनके श्राद्धादि कर्म किये।

महाप्रभु चलते-चलते राम केलि नामक नगर के निकट पहुँचे। नगर में घुसते ही भक्तों ने हरि-ध्वनि की गूंज से आकाश मण्डल को गुंजा दिया।दिशा विदिशाओं में भगवान के सुमधुर नामों की प्रतिध्वनि सुनायी पड़ने लगी। भक्तों के हृदय से आनन्द-धारा निकल-निकलकर अपने वेग से लोगों को प्लावित करने लगी।सहस्रों नर-नारियों के झुंड- के-झुंड प्रभु के दर्शनों के लिये आने लगे और सभी भूत-बाधा की छूत लगने के समान एक-दूसरे का हाथ पकड़-पकड़कर नृत्य करने लगे। राम केलि-ग्राम गौड़देश की राजधानी के समीप ही था। उसे गौड़ देश के दो मंत्री भाइयों ने अपने रहने के लिये बसाया था। बादशाह ने भी भक्तों की गगनभेदी तुमुल ध्वनि सुनी। सुनते ही अपने महल की छत पर चढ़कर स्वयं उस ओर देखने लगा।

पापी को सदा अपने पाप का भय बना रहता है, उस के हृदय में शान्ति नहीं रहती। गौड़ देश का तत्कालीन बादशाह हुसेनशाह हिन्दू राजा सुबुद्धिराय को छल-बल से राज्यच्युत कर के स्वयं ही राजा बन गया था। इसलिये वह हिन्दुओं से बहुत शंकित रहता था।भक्तों की गगनभेदी हरि-ध्वनि को सुनकर उस के कान खड़े हो गये। वह सोच ने लगा- 'किसी ने गौड़ देश पर अकस्मात चढ़ाई तो नहीं कर दी।' इसलिये उसने जल्दी से अपने केशवसिंह नामक हिन्दु मंत्री को बुलाकर उसका कारण पूछा। केशवसिंह ने प्रभु की प्रशंसा पहले से ही सुन रखी थी।वह स्वयं हुसेनशाह से सन्तुष्ट नहीं था; किन्तु मंत्री होने के कारण काम करता ही था। 
उसने कहा- 'सरकार! भय की कोई बात नहीं। पुरी के दस-बीस वैष्णव साधु हैं, तीर्थयात्रा कर ने वृन्दावन जा रहे हैं, कल चले ही जायँगे। वे सभी निःशस्त्र हैं और उन्हें राजनीति से कोई प्रयोजन नहीं। वे सब-के-सब घर बार त्यागी वैरागी हैं।'

बादशाह उस समय तो हाँ-हूँ करके घर चला गया, किन्तु हिन्दु मंत्री की बातों से उसे विशेष सन्तोष नहीं हुआ। इसलिये उसने अपने 'दबिर खास' और 'शाकिर मल्लिक' नामक दोनों विश्वासी मंत्रियों को बुलाकर फिर इस सम्बन्ध में पूछताछ की। इधर बादशाह से पृथक होते ही केशवसिंह मंत्री ने चुपके-से एक विश्वासी ब्राह्मण सेवक के द्वारा प्रभु के पास यह समाचार भेज दिया कि आपको यहाँ से शीघ्र ही चले जाना चाहिये।मुसलमान बादशाह की बुद्धि का विश्वास नहीं, न जाने कब क्या सोचने लगे। दबिर खास और शाकिर मल्लिक वैसे तो जन्म के हिन्दू थे, किन्तु बादशाह के विशेष कृपापात्र हो ने से वे अपने हिन्दूपने को भूल से गये थे। बादशाह भी इन पर हिन्दू कर्मचारियों की भाँति अविश्वास नहीं करते थे। बादशाह के पूछने पर दबिर खास ने प्रभु की प्रशंसा करते हुए कहा- 'ये नवद्वीप के गौरांग महाप्रभु हैं, इन्होंने अब संन्यास ले लिया है।इन्हें राजनीति से कोई सम्बन्ध नहीं। ये तो धर्म-संस्थापनार्थ प्रकट हुए हैं। इन्हें आप साक्षात नारायण ही समझें। इनके आशीर्वाद से आपका कल्याण हो जायगा। ये कृपा करने में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं रखते। बादशाह को इनकी बातों से सन्तोष हुआ और वह महाप्रभु की भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगा।

इस प्रकार बादशाह को समझा-बुझाकर ये लोग अपने घर आये। अपने स्थान पर आकर इन दोनों भाइयों को शंका हुई कि न जाने बादशाह फिर कुछ सोच ने लगे, इसलिये चलकर प्रभु को समझा देना चाहिये कि ऐसे लड़ाई के समय में इस प्रकार भीड़-भाड़ के साथ वृन्दावन जाना उचित नहीं है।ये प्रभु के गुणों पर पहले ही मोहित हो चुके थे। प्रभु के दर्शनों की इन्हें चिरकाल से उत्कट इच्छा थी। आज स्वाभाविक ही ऐसा सुन्दर सुयोग पाकर ये परम प्रसन्न हुए और प्रभु के दर्शनों की इच्छा से रात्रि होने की प्रतीक्षा करने लगे।अत्यन्त ही एकान्त-प्रेमी से रात्रि के समय एकान्त में ही बातें की जाती हैं। ये दोनों भाई प्रभु के अत्यन्त ही एकान्त-प्रेमी भक्त, सेवक, शिष्य तथा सुहृद् थे। ये ही दोनों भाई वैष्णव-समाज में 'रूप और सनातन' के नाम के परम प्रसिद्ध हैं।

रूप और सनातन….

जिस मनुष्य के हृदय में पश्चात्ताप है, वह कैसी भी दशा में क्यों न पहुँच गया हो वहीं से परम उन्नति कर सकता है, किन्तु जिसे अपने बुरे कर्मों पर दुःख नहीं होता, जो अपनी गिरी दशा का अनुभव नहीं करता, जिसे समय के व्यर्थ बीत जाने का पश्चात्ताप नहीं वह चाहे कितना भी बड़ा विद्वान हो, कैसा ही ज्ञानी हो, कितना भी विवेकी हो, वह उन्नति के सुन्दर शिखर पर कभी भी नहीं पहुँच सकता।जहाँ पूर्वकृत कर्मों पर सच्चे हृदय से पश्चात्ताप हुआ, जहाँ सर्वस्व त्यागकर प्यारे के चरणों में जाने की इच्छा हुई, वहीं समझ लो उस की उन्नति का श्री गणेश हो गया। वह शीघ्र ही शैलशिखर पर बैठे हुए अपने प्यारे के पादपद्यों को चूमने में समर्थ हो सकेगा। रूप और सनातन- इन दोनों भाइयों का प्राथमिक जीवन विषयी पुरुषों का-सा होने पर भी अन्त में ये पश्चात्ताप के प्रभाव से प्रभु के पादपद्यों तक पहुँच सके।
क्रमशः

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