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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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प्रभु की भक्ति के प्रभाव से वे जगन्मान्य महापुरुष हो गये।रूप-सनातन के पूर्वज कर्नाटक देश के रहने वाले थे। इनके प्रपितामह पद्यनाभ किसी कारण विशेष से कर्नाटक देश को छोड़कर नवहाटी (नवहट्ट)- में आकर रहने लगे। उनके पाँच लड़के और अठारह कन्याएँ हुईं। सब से छोटे पुत्र का नाम मुकुन्ददेव था। मुकुन्ददेव के कुमार देव नामक परमभागवत पुत्र हुए। वे प्रायः लेन-देन और वाणिज्य-व्यापार का काम करते थे, इसी के निमित्त इन्हें यशोहर जिले के अन्तर्गत फतेहाबाद में जाना-आना पड़ता था। परस्पर में कुछ जातीय विरोध उत्पन्न होने पर कुमार देव नवहट्ट को छोड़कर फतेहाबाद में ही आकर रहने लगे। यहाँ आकर इन्होंने मधाईपुर के हरिनारायण विशारद की कन्या रेवतीदेवी के साथ अपना विवाह कर लिया।रेवतीदेवी के गर्भ से तीन पुत्र हुए, वे तीनों ही परमभागवत वैष्णव-समाज के सर्वोत्कृष्ट शिरोमणि के समान हुए। माता-पिता ने इनके नाम अमर, सन्तोष और अनूप रखे। पीछे से ये ही रूप, सनातन और वल्लभ-इन नामों से प्रसिद्ध हुए।पिता ने अपने तीनों पुत्रों को सुयोग्य पण्डित बनाना चाहा, इसलिये नवहाटी के प्रसिद्ध पण्डित श्रीसर्वानन्द सिद्धान्तवाचस्पति से उन्होंने इन लोगों को संस्कृत की शिक्षा दिलायी। उन दिनों फारसी राजभाषा थी। राजकीय कामों में फारसी का ही बोलबाला था। फारसी पढ़ा हुआ ही सभ्य और विद्वान समझा जाता था, उसे ही राज्य में बड़ी-बड़ी नौकरियां मिल सकती थी। फारसी पढ़ा-लिखा साधारण काम नहीं कर सकता था। मालूम पड़ता है, जब लोग बहुत अधिक संख्या में फारसी पढ़े-लिखे हो गये और उन की बेकदरी होने लगी तभी यह लोकोक्ति बनी होगी-'पढ़े फारसी बेचे तेल। यह देखो विधना का खेल।'
अस्तु, रूप-सनातन के पूज्य पिता जी ने अपने पुत्रों को संस्कृत के साथ-ही-साथ फारसी का भी पण्डित बनाना चाहा। इसलिये सप्तग्राम के भूम्यधिकारी सैयद फकरउद्दीन से इन लोगों को अरबी-फारसी की शिक्षा दिलायी। ये मेधावी और तीक्ष्णबुद्धि के तो बाल्य काल से ही थे, इसलिये थोड़े ही दिनों में संस्कृत, अरबी और फारसी के अच्छे पण्डित हो गये। उन दिनों मालाधर वंसु (गुणराज खाँ) गौड़ के बादशाह हुसेनशाह के राजमंत्री थे। वे गुणग्राही तथा कविहृदय के थे। उन्होंने 'श्रीकृष्णविजय' नामक एक बँगला काव्य की भी रचना की थी जिसका 'नन्दनन्दन कृष्ण मोर प्राणनाथ' यह पद महाप्रभु को बहुत ही पसंद था। उनसे इन लोगों का परिचय हो गया। वे इनकी कुशाग्रबुद्धि और प्रत्युत्पन्न मति से बहुत ही संतुष्ट हुए और इन्हें राजदरबार में नौकरी का काम दे दिया। ये अपनी बुद्धि की तीक्ष्णता और कार्यपटुता के कारण शीघ्र ही बादशाह के परम कृपापात्र बन गये और बादशाह ने प्रसन्न होकर इन्हें अपना राजमंत्री बनाया। पदवृद्धि के साथ इनकी वैभववृद्धि भी हो ने लगी, साथ ही हिन्दु-धर्म की कट्टरता भी कम होने लगी। इन्हें मुसलमानों से कोई परहेज नहीं था। ब्राह्मण होने पर भी इनका खान-पान तथा वेष-भूषा सब मुसलमान रईसों का सा ही था। यहाँ तक कि बादशाह ने इनके नाम भी मुसलमानों के से ही रख दिये।बादशाह सनातन को 'दबिर खास' और रूप को 'शाकिर मल्लिक' के नाम से पुकारता था। राज्य में ये इन्हीं नामों से प्रसिद्ध थे। इनके पुराने नाम को कोई जानता भी नहीं था। इन्होंने अपने रहने के निमित्त गौड़ के समीप ही राम केलि नाम से एक नया नगर बसाया और उसी में अपना सुन्दर-सा महल बनाकर खूब ठाट-बाट के साथ रहते थे। इनके आचरण चाहे कैसे भी हों, किन्तु ये संस्कृत के विद्वान पण्डितों को तथा साधु-वैष्णवों का सदा सम्मान करते रहते थे। राम केलि से थोड़ी दूर पर इन्होंने 'कन्हाई नाटशाला' नाम से एक मूर्ति-संग्रहालय बनवाया था। उसमें श्रीकृष्ण की लीला-सम्बन्धी अनेक प्रकार की बहुत-सी मूर्तियाँ थीं। उनमें से कुछ तो अब तक भी विद्यमान हैं।
निरन्तर के साधु-संग तथा शास्त्र-चिन्तन से इन लोगों को अपने अपार वैभव से वैराग्य हो ने लगा। इनका मन किसी को आत्मसमर्पण करने के लिये अत्यन्त ही व्याकुल होने लगा। अब इन की प्रवृत्ति धीरे-धीरे कर्म की ओर हो ने लगी। उसी समय इन लोगों ने महाप्रभु की प्रशंसा सुनी। उस समय महाप्रभु भगवन्नाम संकीर्तन एक नयी-ही-नयी वस्तु थी।अब तक लोगों की ऐसी धारणा थी कि जो समाज के बन्धनों को परित्याग कर देने के कारण एक बार समाज से पतित हो गया, वह सदा के लिये पतित बन गया। पीछे से उस के उद्धार का कोई उपाय नहीं हैं। महाप्रभु ने इस मान्यता का जोरों से खण्डन किया। वे इस बात पर जोर देने लगे कि चाहे कितना भी बड़ा पापी क्यों न रहा हो, जो अनन्यभाव से भगवान का भजन करता है वह परम साधु ही मानने योग्य है, क्योंकि अब उसने उत्तम निश्चय कर लिया। भगवान में जिसका मन लग गया है वह फिर पापी रह ही कैसे सकता है। एक बार प्रसन्न होकर प्रभु की शरण में जाने से ही सम्पूर्ण पाप जलकर भस्म हो जाते हैं। भगवन्नाम के प्रभाव से घोर पापी- से-पापी भी प्रभु के पादपद्यों तक पहुँचे सकते हैं।
प्रभु के ऐसे उदार और सर्वभूतहितकारी भावों को सुनकर इन लोगों को भी अपने पूर्व-जीवन पर पश्चात्ताप होने लगा और गौड़ेश्वर से छिपकर इन्होंने एक पत्र प्रभु के लिये नवद्वीप पठाया। उस में इन्होंने अपने पतितावस्था का वर्णन करके अपने उद्धार का उपाय जानना चाहा। प्रभु ने इनके पत्र के उत्तर में यह श्लोक लिखकर इनके पास भेज दिया-
परव्यसनिनी नारी व्यग्रापि गृहकर्मसु।
तमेवास्वादयत्यन्तर्नवसंगरसायनम्।।
अर्थात 'पर-पुरुष से सम्बन्ध रखने वाली व्यभिचारिणी स्त्री बाहर से घर के कार्यों में व्यस्त रहकर भी भीतर-ही-भीतर उस नूतन जार संगमरूपी रसायन का ही आस्वादन करती रहती है।' इसी प्रकार बाहर से तो तुम राज काजों को भले ही करते रहो, किन्तु हृदय से सदा उन्हीं हृदय-रमण के साथ क्रीड़ा-विहार करते रहो।
प्रभु के ऐसे अनुपम उपदेश को पाकर इन लोगों की प्रभु-दर्शन की लालसा और भी अधिक बढ़ ने लगी। जब इन्होंने सुना कि प्रभु तो संन्यास लेकर पुरी चले गये हैं, तब तो ये और भी अधिक व्याकुल हुए। हुसेनशाह इन्हें बहुत अधिक मानता था और इनके ऊपर पूर्ण विश्वास रखता था। उन दिनों कई राज्यों से युद्ध छिड़ा हुआ था।
क्रमशः
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