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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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ऐसी दशा में ये पुरी जा ही नहीं सकते थे।जब वृन्दावन जाने की इच्छा से प्रभु स्वयं ही राम केलि में पधारे तब तो इनके आनन्द की सीमा नहीं रही। ये मन-ही-मन प्रभु की भक्तवत्सलता की प्रशंसा कर ने लगे। सब लोगों के समक्ष ये लोग प्रभु से स्पष्ट तो मिल ही नहीं सकते थे इसलिये एकान्त में प्रभु के दर्शनों की बात सोचने लगे।जब सभी लोग सो गये और सम्पूर्ण नगर में सन्नाटा छा गया तब अर्धरात्रि के समय ये अपने प्यारे के संग-सुख की इच्छा से साधारण वेश में चले। उस समय अत्यन्त ही दीन होकर और दाँतों में तृण दबाकर ये लोग प्रभु के निवास स्थान के समीप पहुँचे। उस समय सभी भक्त मार्ग के परिश्रम से थककर घोर निद्रा में पड़े सो रहे थे। इन्होंने सब से पहले नित्यानन्द जी तथा हरिदास जी को जगाया और अपना परिचय दिया।इन दोनों भाइयों के आने का संवाद दिया। प्रभु ने उसी समय दोनों को अपने समीप बुला ने की आज्ञा दी। प्रभु की आज्ञा पाकर पुलकित शरीर से अत्यन्त दीनता के साथ ये लोग प्रभु के समीप पहुँचे और जाते ही व्याकुलता के साथ प्रभु के पैरों में गिरकर जोरों से रुदन कर ने लगे।
प्रभु अपने कोमल करों से बार-बार इन्हें उठाते थे, किन्तु वे प्रेम के कारण प्रभु के पादपद्यों को छोड़ना ही नहीं चाहते थे। अत्यन्त ही करुणा के स्वर में ये प्रभु से अपने उद्धार की प्रार्थना करने लगे। प्रभु ने इन्हें आश्वासन देते हुए कहा- 'तुम लोगों के रुदन से मेरा हृदय फटता है, तुम दोनों ही परम भागवत हो और मेरे जन्म-जन्मान्तरों के सुहृद् हो।मैं तुम्हारे दर्शनों के लिये व्याकुल था। राम केलि में आने का मेरा और दूसरा कोई अभिप्राय नहीं था, यहाँ तो मैं केवल तुम दोनों भाइयों के दर्शनों के ही लिये आया हूँ। आज से तुम्हारा नूतन जन्म हुआ। अब इन मुसलमानी नामों को त्याग दो, आज से तुम्हारे नाम रूप और सनातन हुए।'
प्रभु के इन प्रेमपूर्ण वचनों से दोनों भाइयों को परम सन्तोष हुआ और वे भाँति-भाँति से प्रभु की स्तुति कर ने लगे। अन्त में सनातन में प्रभु से कहा- 'प्रभो! इस युद्ध काल में और इतनी भीड़-भाड़ के साथ वृन्दावन-यात्रा करना ठीक नहीं है। वृन्दावन तो अकेल ही जाना चाहिये। रास्ते में इन सब का प्रबन्ध करना, देख-रेख रखना और सब की चिन्ता का भार उठाना ठीक नहीं है।इस समय आप लौट जायँ और फिर अकेले कभी वृन्दावन की यात्रा करें।' प्रभु ने सनातन के सत्परामर्श को स्वीकार कर लिया और प्रातः काल उन
दोनों भाइयों को प्रेमपूर्वक आलिंगन करके विदा किया और आप सभी भक्तों के साथ कन्हाई की नाटशाला होते हुए फिर शान्तिपुर में अद्वैताचार्य के घर आकर ठहर गये।
रघुनाथदास जी को प्रभु के दर्शन….
कितनी सुन्दर कल्पना है! उन महापुरुषों का हृदय कितना स्वच्छ और पवित्र होगा, जिन के हृदय में से काम, क्रोध और लोभ-ये तीनों राक्षस निकल गये हों, मन-मन्दिर को अपवित्र बनाने वाले इन दैत्यों के निकलते ही काँच का बना हुआ यह देवालय एकदम स्वच्छ बन जाता है, विषय-विकारों की धूलि से मलिन हुआ यह मन्दिर इन महापापी पेटुओं के चले जाने पर प्रेमरूपी अमृत में अपने आप ही धुलकर चमचमा ने लगता है, तब उस में प्राणप्यारे आकर विराजमान हो जाते हैं, मन्दिर में उन की प्राण-प्रतिष्ठा होते ही यह देहरूपी बाहरी बरामदा भी उसके दिव्य प्रकाश से चमकने लगता है। अहा! जिस महाभाग के हृदय में प्यारे की त्रैलोक्यपावनी मूर्ति की प्राणप्रतिष्ठा ही चुकी है, उसके चरणस्पर्श से ही विकार एकदम भाग जाते हैं, अहा! उन पतित पावन महानुभावों का जीवन धन्य है।
संसार में सुन्दर दीख ने वाले चमक-दमकयुक्त और स्वच्छ- से प्रतीत होने वाले सभी पदार्थ कामोद्दीपन करने वाले हैं। ये पुरुषों को हठात अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं। उनमें से मादक किरणें निकलकर मनुष्यों के मन को बरबस मोह में फँसा लेती हैं। कोई धीर पुरुष ही उनके आकर्षण से बच सकते हैं, वे मनुष्य नहीं साक्षात ईश्वर हैं, नररूप में नारायण हैं, शरीरधारी भगवान हैं, उनकी चरण-धूलि परम भाग्यवान पुरुषों को ही मिल सकती है। महात्मा रघुनाथदास जी उन्हीं पुरुषों में से एक हैं।
महात्मा रघुनाथदास जी के पिता दो भाई थे, हिरण्य मजूमदार और गोवर्धन मजूमदार। ये दोनों ही भाई बड़े ही समझदार, कार्यकुशल और लोक-व्यवहार में परम प्रवीण थे। हम पहले ही बता चुके हैं कि उनक दिनों राजा की ओर से गांवों को ठेका दिया जाता था और ठेका लेने वाले भूम्यधिपति या जमींदार प्रायः कायस्थ या मुसलमान ही होते थे, ये दोनों भाई भी कुलीन कायस्थ थे और बादशाह की ओर से इन्हें 'मजूमदार' की उपाधि मिली थी।ये वर्तमान तीसबीघा नामक नगर के समीप सप्तग्राम नाम के ग्राम में रहते थे। उन दिनों सप्तग्राम गंगातट पर होने के कारण वाणिज्य-व्यापार की एक अच्छी मण्डी समझा जाता था, कारण कि उन दिनों व्यापार प्रायः नौ काओं द्वारा ही होता था। इनके इलाके की उस समय की आमदनी लगभग बीस लाख रूपये सालाना की थी, उस में से ये बारह लाख तो बादशाह को दे देते थे और शेष आठ लाख अपने पास रख लेते थे।उन दिनों आठ लाख की आमदनी बहुत अधिक समझी जाती थी, आज की एक करोड़ की आमदनी से भी बढ़कर उन दिनों के आठ लाख थे। इन दोनों भाइयों की बादशाह के दरबार में खूब प्रतिष्ठा थी और इन की बात का सब कोई पूर्ण विश्वास करते थे। इतने धनिक होने पर भी ये लोग पूरे आस्तिक थे।इनके दरबार में विद्वान पण्डितों का खूब सम्मान किया जाता और बहुत-से ब्राह्मण पण्डित आश्रय से अपनी आजीविका चलाते थे। महाप्रभु के पिता पण्डित जगन्नाथ मिश्र की भी ये लोग कुछ-न-कुछ सेवा करते ही रहते थे तथा नवद्वीप के बहुत-से पण्डित इनके यहाँ आते-जाते रहते थे।
श्री अद्वैताचार्य के चरणों में इन दोनों भाइयों की पहले से ही भक्ति थी, कारण कि इनके कुलपुरोहित श्री बलराम आचार्य के साथ अद्वैताचार्य की बहुत अधिक प्रगाढ़ता थी इसीलिये महात्मा हरिदास कभी-कभी सप्तग्राम में जाकर बलराम आचार्य के घर ठहर जाते।
क्रमशः
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