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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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आचार्य इनकी नाम-निष्ठापर मुग्ध थे, वे इन्हें पुत्र की भाँति स्नेह करते थे, इसी कारण ये दोनों जमींदार भाई भी हरिदास जी के प्रति श्रद्धा के भाव रखने लगे। हिरण्यदास निःसन्तान थे, केवल गोवर्धनदास के ही एक सन्तान थी और उसी सन्तान से वे जगद्वन्द्य और अमर हो गये।
महात्मा रघुनाथदास के पिता होने का लोकविख्यात सौभाग्य इन्हीं श्री गोवर्धनदास जी को प्राप्त हुआ था। बालक रघुनाथदास के पहले से ही बड़े तेजस्वी और होनहार प्रतीत होते थे। अपने कुल में अकेले ही होने के कारण चाचा तथा पिता का इनके ऊपर अत्यधिक स्नेह था। बालकपन से ही इनके स्वभाव में गम्भीरता थी, ये बहुत ही कम बातें करते, कभी किसी से अपशब्द नहीं कहते, बड़ोंके सामने सदा नम्र रहते।राजपुत्र होने के कारण वैसे ही बड़े सुन्दर और कोमलांग थे, फिर इतनी बड़ी नम्रता ने तो सोने में सुगन्ध का काम दिया। जो भी इनकी मोहिनी मूर्ति को देखता वही मुग्ध हो जाता। पिता ने अपने पुत्र को प्रसिद्ध पण्डित बनाने की इच्छा से अपने कुलगुरु बलराम आचार्य के समीप संस्कृत पढ़ने भेजा।विनयी रघुनाथ अपनी पोथियों को स्वयं लेकर आचार्य के घर पढ़ने जाने लगे। उन दिनों महात्मा हरिदास जी आचार्य के घर पर ही रहकर अहर्निश जोर-जोर से भगवन्नामों का उच्चारण किया करते थे। सरल स्वभाव वाले कोमल प्रकृति के रघुनाथदास पर हरिदास जी की धर्मनिष्ठा का बड़ा भारी प्रभाव पड़ा।वे घंटो एकटक-भाव से हरिदास जी के मुखमण्डल की ओर निहारते और उनके साथ कभी-कभी बेसुध होकर कीर्तन भी करने लगते। हरिदास जी के हृदय में भी बालक रघुनाथदास जी की सरलता और भावुकता ने अपना घर बना लिया। वे मन-ही-मन उस जमींदार के कुमार को प्यार करने लगे।
धीरे-धीरे रघुनाथदास बड़े हुए। उनके मन को इतना अतुल वैभव अपनी ओर आकर्षित नहीं कर सका। विषय-भोग उन्हें काटने के लिये दौड़ने लगे और उनका मन-मधुप अप्राकृतिक सजे हुए परम रमणीक उद्यान को छोड़कर खुले हुए वनों में स्वच्छभाव से विचरण करने के निमित्त व्याकुल होने लगा।जिन सोने-चांदी के ठीकरों को सर्वस्व समझकर लोग बुरे- से-बुरे कामों को करने में भी आगा-पीछा नहीं करते और उन की प्राप्ति के निमित्त प्राणों की बाजी लगाने में भी कभी संकोच नहीं करते, उन्हीं स्वर्ण के सिक्कों को रघुनाथदास जी अपने पथ के कण्टक समझते थे। उनका मन राज- काज में बिलकुल नहीं लगता था, वे तो परमार्थ-पथ को परिष्कृत करने वाले सत्संग के लिये तड़पते रहते थे।परिवार वालों को इन का यह व्यवहार अरुचिकर प्रतीत होता था, वे इन्हें भाँति-भाँति के संसारी प्रलोभन देते थे, अनेक-अनेक प्रकार की भोग्य-सामग्रियों द्वारा इनके मन को उन में फंसाना चाहते थे, किन्तु उन के सभी प्रयत्न निष्फल हुए। जो मधुरातिमधुर मिश्री का आस्वादन कर रहा है, उसे गुड़ देकर अपने वश में करना मूर्खता ही है। सभी को इन की ऐसी दशा पर चिन्ता हई। उस समय महाप्रभु संन्यास लेकर शान्तिपुर में अद्वैताचार्य के घर ठहरे हुए थे।
अपने पिता की आज्ञा लेकर ये उस समय प्रभु के दर्शन करने को गये थे और चार-पांच दिन प्रभु के चरणों के समीप रह भी गये थे। महाप्रभु तो पूरे पारखी थे, वे इन के रंग-ढंग से ही ताड़ गये कि यह जन्मसिद्ध पुरुष है। संसार में यह चिरकाल तक संसारी बनकर नहीं रह सकता। फिर भी प्रभु ने इन्हें समझा-बुझाकर अनासक्त-भाव से गृहस्थी में रहकर संसारी काम करते रहने का उपदेश कर के घर लौटा दिया।पिता ने जब देखा कि पुत्र का चित्त संसारी कामों में नहीं लगता तब उन्होंने एक बहुत ही सुन्दरी कन्या से इन का विवाह कर दिया। गोवर्धनदास धनी थे, राजा और प्रजा दोनों के प्रीति-भाजन थे, सभी लोग उन्हें प्रतिष्ठा की दृष्टि से देखते थे। राजाओं के समान उनका वैभव था। इसलिये उन्हें अपने पुत्र के लिये सुन्दर- से-सुन्दर पत्नी खोजने में कठिनता नहीं हुई। उनका ख्याल था कि रघुनाथ की युवा अवस्था है, वह परम सुन्दरी पत्नी पाकर अपनी सारी उदासीनता को भूल जायगा और उस के प्रेमपाश में बँधकर संसारी हो जायगा, किन्तु विषय-भोगों को ही सर्वस्व समझने वाले पिता को क्या पता था कि इस की शादी तो किसी दूसरे के साथ पहले ही हो चुकी है, उसके सौन्दर्य के सामने इन संसारी सुन्दरियों को सौन्दर्य तुच्छातितुच्छ है। पिता का यह भी प्रयत्न विफल ही हुआ। परम सुन्दरी पत्नी रघुनाथदास को अपने प्रेमपाश में नहीं फंसा सकी।रघुनाथदास उसी प्रकार संसार से उदासीन ही बने रहे।
अब जब रघुनाथदास जी ने सुना कि प्रभु वृन्दावन नहीं जा सके हैं, वे राम केलि से लौटकर अद्वैताचार्य के घर ठहरे हुए हैं; तब तो इन्होंने बड़ी ही नम्रता के साथ अपने पूज्य पिता के चरणों में प्रार्थना की कि मुझे महाप्रभु के दर्शनों की आज्ञा मिलनी चाहिये। महाप्रभु के दर्शन कर के मैं शीघ्र ही लौट आऊंगा।इस बात को सुनते ही गोवर्धनदास किंकर्तव्यविमूढ़ हो गये, किन्तु वे अपने बराबर के युवक पुत्र को जबरदस्ती रोकना भी नहीं चाहते थे, इसलिये आँखों में आंसू भरकर उन्होंने कहा- 'बेटा! हमारे कुल का तू ही एकमात्र दीपक है। हम सभी लोगों को एकमात्र तेरा ही सहारा है। तू ही हमारे जीवन का आधार है। तुझे देखे बिना हम जीवित नहीं रह सकते। मैं महाप्रभु के दर्शनों से तुझे रोकना नहीं चाहता, किन्तु इस बूढ़े की यही प्रार्थना है कि तू मेरे इन सफेद बालों की ओर देखकर जल्दी से लौट आना, कहीं घर छोड़कर बाहर जाने का निश्चय मत करना।‘
पिता के मोह में पगे हुए इन वचनों को सुनकर आँखों में आंसू भरे हुए रघुनाथ दास जी ने कहा- 'पिता जी! मैं क्या करूँ, न जा ने क्यों मेरा संसारी कामों में एकदम चित्त ही नहीं लगता। मैं बहुत चाहते हूँ कि मेरे कारण आप को किसी प्रकार का कष्ट न हो, किन्तु मैं अपने वश में नहीं हूँ। कोई बलात मेरे मन को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है। आप की आज्ञा शिरोधर्य करता हूँ, मैं शीघ्र ही लौट आऊँगा।' पुत्र के ऐसे आश्वासन देने पर गोवर्धनदास ने अपने पुत्र के लिये एक सुन्दर सी पाल की मंगायी।दस-बीस विश्वासी नौकर उन के साथ दिये।
क्रमशः
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