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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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बड़े ही ठाट-बाट के साथ राजकुमार की भाँति बहुत-सी भेंट की सामग्री के साथ उन्हें प्रभु के दर्शनों के लिये भेजा। जहाँ से शान्तिपुर दीखने लगा, वहीं से ये पालकी पर से उतर गये और नंगे पावों ही धूप में चलकर प्रभु के समीप पहुँचे। दूर से ही भूमि पर लोटकर इन्होंने प्रभु के चरणों में साष्टांग प्रणाम किया। प्रभु ने जल्दी से उठकर इन्हें छाती से चिपटा लिया और धीरे-धीरे इनके काले घुंघराले बालों को अपनी उँगलियों से सुलझाने लगे। प्रभु ने इनका माथा सूंघा और अपनी गोदी में बिठाकर बालकों की भाँति पूछने लगे- 'तुम इतनी धूप में अकेले कैसे आये, क्या पैदल आये हो?'
रघुनाथदास जी ने इन प्रश्नों में से किसी का भी कुछ उत्तर नहीं दिया, वे अपने अश्रुजल से प्रभु के काषाय-वस्त्रों को भिगो रहे थे। इतने में ही रघुनाथदास जी के साथी सेवकों ने प्रभु के चरणों में आकर साष्टांग प्रणाम किया और भेंट की सभी सामग्री प्रभु के सम्मुख रख दी। महाप्रभु धीरे-धीरे रघुनाथदास जी के स्वर्ण के समान कान्तियुक्त शरीर पर अपना प्रेममय, सुखमय और ममत्वमय कोमल कर फिरा रहे थे।प्रभु की ऐसी असीम कृपा पाकर रोते-रोते रघुनाथ जी कहने लगे- 'प्रभो! पितृ-गृह मेरे लिये सचमुच कारावास बना हुआ है। मेरे ऊपर सदा पहरा रहता है, बिना पूछे मैं कहीं आ-जा नहीं सकता, स्वतन्त्रता से घूम-फिर नहीं सकता। हे जग के त्राता! मेरे इस गृहबन्धन को छिन्न-भिन्न कर दीजिये। मुझे यातना से छुड़ाकर अपने चरणों की शरण प्रदान कीजिये। आप के चरणों का चिन्तन करता हुआ ही अपने जीवन को व्यतीत करूं, ऐसा आशीर्वाद दीजिये।'
प्रभु ने प्रेम पूर्वक कहा- 'रघुनाथ! तुम पागल तो नहीं हो गये हो, अरे! घर भी कहीं बन्धन हो सकता है? उसमें से अपनापन निकाल दो, बस, फिर रह ही क्या जाता है। जब तक ममत्व है, तभी तक दुःख है। जहाँ ममत्व दूर हुआ कि सब अपना-ही-अपना है। आसक्ति छोड़कर व्यवहार करो। धन, स्त्री तथा कुटुम्बियों में अपनेपन के भाव को भुलाकर व्यवहार करो।'
रघुनाथदास जी ने रोते-रोते कहा- 'प्रभो! मुझे बच्चों की भाँति बहकाइये नहीं। यह मैं खूब जानता हूँ कि आप सब के मन के भावों को समझकर उसे जैसे अधिकारी समझते हैं, वैसा ही उपदेश करते हैं। बाल-बच्चों में अनासक्त रहकर और उन्हीं के साथ रहते हुए भजन करना उसी प्रकार है जिस प्रकार नदी में घुसने पर भी शरीर न भीगे। प्रभो! ऐसा व्यवहार तो ईश्वर के सिवा साधारण मनुष्य कभी नहीं कर सकता।आप जो उपदेश कर रहे हैं, वह उन लोगों के लिये हैं, जिनकी संसारी विषयों में थोड़ी-बहुत वासना बनी हुई है। मैं आप के चरणों को स्पर्श करके कहता हूँ, कि मेरी संसारी विषयों में बिलकुल ही आसक्ति नहीं। मुझे घर कर अपार वैभव काटने के लिये दौड़ता है, अब मैं अधिक काल घर के बन्धन में नहीं रह सकता।'
प्रभु ने कहा- 'तुमने जो कुछ कहा है, वह सब ठीक है, किंतु यह मर्कट-वैराग्य ठीक नहीं। कभी-कभी मनुष्यों को क्षणिक वैराग्य होता है, जो विपत्ति पड़ने पर एकदम नष्ट हो जाता है, इसीलिये कुछ दिन घर में और रहो, तब देखा जायगा।'
अत्यन्त ही करूण-स्वर में रघुनाथदास जी ने कहा- 'प्रभो! आपके चरणों की शरण में आने पर फिर वैराग्य नष्ट ही कैसे हो सकता है? क्या अमृत का पान करने पर भी पुरुष को जरा-मृत्यु का भय हो सकता है? आप अपने चरणों में मुझे स्थान दीजिये।'
प्रभु ने धीरे से प्रेम के स्वर में कहा- 'अच्छी बात है देखा जायगा, अब तो तुम घर जाओ, मेरा अभी वृन्दावन जानेका विचार है। यहाँ से लौटकर पुरी जाऊँगा और वहाँ से बहुत ही शीघ्र वृन्दावन जाना चाहता हूँ। वृन्दावन से जब लौट आऊँ, तब तुम आकर मुझे पुरी में मिलना।'
प्रभु के ऐसे आश्वासन से रघुनाथदास जी को कुछ सन्तोष हुआ।वे सात दिनों तक शान्तिपुर में ही प्रभु के चरणों में रहे। वे इन दिनों पल भर के लिये भी प्रभु से पृथक नहीं होते थे। प्रभु के भिक्षा कर लेने पर उनका उच्छिष्ट प्रसाद पाते और प्रभु के चरणों के नीचे ही शयन करते। इस प्रकार सात दिनों तक रहकर प्रभु की आज्ञा लेकर वे फिर सप्तग्राम के लिये लौट गये।
श्री मन्माधवेन्द्रपुरी की पुण्य-तिथि समीप ही थी, इसलिये अद्वैताचार्य के प्रार्थना करने पर प्रभु दस दिनों तक शान्तिपुर में ठहरे रहे। नवद्वीप आदि स्थानों से बहुत से भक्त प्रभु के दर्शनों के लिये आया करते थे। शचीमाता भी अपने पुत्र को फिर से देखने के लिये आ गयीं और सात दिनों तक अपने हाथों से प्रभु को भिक्षा कराती रहीं।इसी बीच एक दिन महाप्रभु गंगा पार करके पण्डित गौरीदास जी से मिलने गये। वे गौरांग के चरणों में बड़ी श्रद्धा रखते थे। उन्होंने प्रभु से वरदान मांगा कि आप निताई और निमाई दोनों भाई मेरे ही यहाँ रहें।तब प्रभु ने उन के यहाँ प्रतिमा में रहना स्वीकार किया। उन्होंने निमाई और निताई की प्रतिमा स्थापित की, जिन में उन के विश्वास के अनुसार अब भी दोनों भाई विराजमान हैं। ये ही महाप्रभु गौरांगदेव और नित्यानन्द जी की आदिमूर्ति बतायी जाती है।ये दोनों मूर्ति बड़ी ही दिव्य हैं। कालना से लौटकर प्रभु फिर शान्तिुपर में आ गये, वहाँ से आपने सभी भक्तों को विदा कर दिया और आप अपने अन्तरंग दो-चार भक्तों को साथ लेकर श्रीजगन्नाथपुरी के लिये चल पड़े।
पुरी में प्रत्यागमन और वृन्दावन की पुनः यात्रा….
शान्तिपुर से विदा होकर महाप्रभु श्रीहट्ट, पानीहाटी आदि स्थानों में होते हए फिर लौटकर पुरी में आ गये। सब से पहले वे श्रीजगन्नाथ जी के दर्शनों को गये। भगवान को साष्टांग प्रणाम कर के वे गद्गद कण्ठ से उन की स्तुति करने लगे। पुजारी ने प्रभु को माला-प्रसाद लाकर दिया। भगवान का प्रसाद पाकर मन्दिर की प्रदक्षिणा करते हुए प्रभु अपने वासस्थान पर पहुँच गये। प्रभु के पुनः पुरी में पधारने का समाचार बात की बात में सम्पूर्ण नगर में फैल गया। जो भी सुनता वहीं प्रभु के दर्शनों को दौड़ा आता। सार्वभौम भट्टाचार्य, रामानन्दराय, काशी मिश्र, माइती, गदाधर आदि सभी भक्त प्रभु के स्थान पर आ गये।
क्रमशः
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