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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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सभी ने प्रसन्नता प्रकट करते हुए कहा- 'प्रभो! हमारा सौभाग्य, जो इतनी जल्दी आप के दर्शन हो गये, यह समय तीर्थयात्रा का नहीं है।'
प्रभु ने कहा- 'और कुछ नहीं है, मुझे गदाधर जी का शाप लग गया। इन्हें साथ नहीं ले गया और जबरदस्ती यहाँ छोड़ गया, इसीलिये मैं वृन्दावन नहीं जा सका।'
हाथ जोड़े हुए दीनभाव से गदाधर गोस्वामी ने कहा- 'प्रभो! आप के लिये वृन्दावन क्या, आप जहाँ भी बैठें वहीं वृन्दावन है, किन्तु लोक-शिक्षण के लिये आप तीर्थ यात्रा आदि करते हैं, यह आप की लीला-मात्र है!'
प्रभु ने कहा- 'सनातन ने मुझे सर्वोत्तम सम्मति दी है, वे दोनों भाई बड़े ही भागवत वैष्णव हैं, उन के हृदय में प्रभु-प्रेम कूट-कूटकर भरा हुआ है। इतना भारी राज- काज करते हुए भी वे सदा उस से उदासीन ही बने रहते हैं और भगवान का सदा चिन्तन करते रहते हैं। उन्होंने ही मुझे सम्मति दी है कि वृन्दावन अकेले ही जाना चाहिये। इसलिये अब के मैं अकेला ही वृन्दावन जाऊंगा।'
राय रामानन्दजी ने निवेदन किया- 'प्रभो! वर्षा काल सन्निकट है, रथ-यात्रा का उत्सव भी आ रहा है, अतः रथ-यात्रा कर के और चातुर्मास बिताकर फिर जैसा भी विचार हो कीजियेगा।'
राय महाशय की इस बात का सार्वभौम भट्टाचार्य, स्वरूप गोस्वामी, गदाधर आदि सभी भक्तों ने अनुमोदन किया। प्रभुने सब की सम्मति के सम्मुख सिर झुका दिया और वे वर्षा काल बिताकर ही वृन्दावन जाने के लिये राजी हो गये। शान्तिपुर से चलते समय प्रभु भक्तों से कह आये थे कि अब के हम वृन्दावन चले जायंगे अतः रथ-यात्रा में अब पुरी आने की आवश्यकता नहीं है। प्रभु की आज्ञा मानकर इस साल गौड़ीय भक्त दल बनाकर पहले की भाँति रथ-यात्रा के लिये नहीं आये थे। महाप्रभु ने सदा की भाँति रथ-यात्रा का उत्सव मनाया और पुरी में ही वर्षा के चार मास व्यतीत किये।वर्षा बीत जाने पर शरद के प्रारम्भ में प्रभु भक्तों से अनुमति लेकर वृन्दावन जाने के लिये उद्यत हुए। प्रभु एकाकी जा रहे हैं और साथ में किसी दूसरे को ले ही नहीं जाना चाहते तब गद्गद कण्ठ से स्वरूप गोस्वामी ने कहा- 'प्रभो! मेरी एक प्रार्थना है। उसे आप अवश्य ही स्वीकार कर लीजिये। आप एकाकी ही वृन्दावन जा रहे हैं, यह हमारे लिये असह्य है, अतः किसी और को साथ ले जाना नहीं चाहते तो इस बलभद्र भट्टाचार्यको तो आप अवश्य ही साथ ले जायँ।यह कुलीन ब्राह्मण है, सेवा करना भलीभाँति जानता है, प्रभु के पादपद्मों में इसका दृढ़ अनुराग है, इसकी स्वयं भी व्रजमण्डल के सभी तीर्थों की यात्रा करने की इच्छा है, यह आपकी भिक्षा आदि बना दिया करेगा, इससे आपको भी असुविधा न रहेगी और हम लोगों को भी संतोष रहा करेगा।’
स्वरूप की बात सुनकर और सभी भक्तों की ऐसी ही इच्छा समझकर भक्तवत्सल प्रभु बोले- ‘आप लोगों की इच्छा के विरुद्ध कोई काम करने की मेरी शक्ति नहीं है, आप लोगों की जिसमें प्रसन्नता होगी और आप लोग जैसा कहेंगे वैसा ही मुझे करना पड़ेगा। अच्छा, आप लोगों के अनुरोध से मैं बलभद्र को साथ ले जाऊँगा।’
प्रभु के इस निश्चय से सभी को प्रसन्नता हुई और सभी प्रभु के शरीर की ओर से कुछ-कुछ निश्चिन्त से हो गये किन्तु किसी को इस बात का पता नहीं था कि प्रभु कब वृन्दावन जायेंगे।शाम के समय प्रभु एकाकी भगवान के दर्शन करने गये और उनसे रात्रि में ही आज्ञा लेकर दूसरे दिन अँधेरे में ही बलभद्र भटटाचार्य को साथ लेकर वृन्दावन की ओर चल दिये। प्रातःकाल जब भक्तों ने देखा कि प्रभु नहीं हैं, तब सभी समझ गये कि प्रभु वृन्दावन को चले गये।
इधर महाप्रभु राजपथ को छोड़कर और कटक से बचकर झाड़ीखण्ड में होकर सीधे उपपथ के द्वारा वृन्दावन की ओर चले। रास्ते में बहुत दूर तक गाँव नहीं पड़ते थे, उन दिनों बलभद्र वन्य शाक-मूल-फलों को ही बनाकर प्रभु को भिक्षा करा देते। कभी-कभी बलभद्र गाँवों में से तीन-तीन, चार-चार दिन के लिए इकठ्ठा सामान माँग लाते और जहाँ सामान न मिलता, वहाँ उसी में से प्रभु को बनाकर भिक्षा करा देते थे। वे बड़ी सावधानी से प्रभु की सेवा करते थे। महाप्रभु इनकी सेवा से सदा सन्तुष्ट रहते और बार-बार इनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करते। प्रभु की माया कौन जाने, कहाँ तो एक हरीत की के टुकड़े को दूसरे दिन के लिये रखने से असन्तुष्ट हो गये और यहाँ बलभद्र के अन्न संग्रह करने पर भी उससे उल्टे प्रसन्न ही हुए। तभी तो कहा है-
लोकोत्तराणां चेतांसि को हि विज्ञातुमीश्वरः।
इन महापुरुषों के चित्त कुछ संसारी लोगों से विलक्षण ही होते हैं, उनके मनोगत भावों को जानने में कौन समर्थ हो सकता है?
महाप्रभु अपने अनुपम प्रभाव से पथ के पशु-पक्षी और हिंसक जीव-जन्तुओं को भी प्रेम-प्रदान करते हुए आगे बढ़ रहे थे। हिंसक जन्तु अपने क्रूर स्वभाव को छोड़कर प्रभु के पादपद्मों में लोटने लगते थे। प्रभु जिस ग्राम से होकर निकलते, उसी ग्राम के सभी पुरुष हरि-हरि कहते हुए प्रभु को चारों ओर से घेर लेते थे।
इस प्रकार पथ के जीव-जन्तुओं को कृतार्थ करते हुए कुछ दिनों में प्रभु अविमुक्त क्षेत्र श्री वाराणसीपुरी में पहुँचे। विश्वनाथ जी की काशीपुरी में पहुँचकर सर्वप्रथम महाप्रभु स्नानार्थ काशी के प्रसिद्ध मणिकर्णिका घाट पर गये।स्नान करके प्रभु बैठे ही थे कि इतने में ही तपन मिश्र नामक एक बंगाली ब्राह्मण वहाँ आ पहुँचे। महाप्रभु जब पूर्ण बंगाल की यात्रा करने अपनी शिष्यमण्डली के साथ गये थे, तब उन्हें ये ही तपन मिश्र मिले थे और प्रभु ने इन्हें भगवन्नाम का उपदेश करके काशी जी भेजा था। आज सहसा प्रभु को संन्यासी के वेश में देखकर तपन मिश्र प्रभु के पैरों में पड़कर जोरों से रुदन करने लगे। प्रभु ने मिश्र जी को उठाकर गले लगाया और उनकी कुशल पूछते हुए उनके सिर पर हाथ फेरने लगे।
मिश्र जी ने गदगद कण्ठ से कहा- ‘प्रभो! आपने अपना भक्तवत्सल नाम आज सार्थक कर दिया। मुझ अधम को यहाँ आकर अपने देव-दुर्लभ दर्शनों से कृतार्थ कर दिया। अब कृपा करके कुछ काल इस कंगाल की कुटिया पर निवास करके इस दीन-हीन को कृतार्थ कीजिये।’
क्रमशः
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