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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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महाप्रभु ने मिश्र जी की प्रार्थना स्वीकार की और वे उन्हें साथ लेकर सबसे पहले तो भगवान विश्वनाथ जी के दर्शनों के लिये गये, फिर विन्दुमाध्यव के दर्शन करते हुए तपन मिश्र के घर पधारे।मिश्र जी ने पाद्य, अध्र्य, आचमन, धूप, दीप, नैवेद्य और फल-फूल आदि से प्रभु की यथोचित पूजा की। उनके चरणों को धोकर चरणामृत लिया और उसे अपने सम्पूर्ण घर में छिड़का। महाप्रभु उनके घर पर सुखपूर्वक रहने लगे, उनके पुत्र रघुनाथ जी प्रभु की खूब ही मनोयोग के साथ सेवा करने लगे। वे सदा प्रभु के समीप ही रहते थे, प्रभु को छोड़कर वे कहीं भी नहीं जाते थे।

वहीं पर चन्द्रशेखर नाम के एक बंगाली वैद्य मिल गये, वे यहाँ पुस्तकें लिखकर अपना जीवन-निर्वाह करते थे। नवद्वीप में एक बार इन्होंने प्रभु के दर्शन भी किये थे और मिश्र जी से सदा प्रभु की प्रशंसा सुनते रहते थे। प्रभु के दर्शनों से उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई और वे प्रभु को अपने घर भिक्षा कराने लगे। इस प्रकार इन दोनों बंगाली भक्तों के आग्रह से प्रभु दस-बारह दिन काशी में ठहर गये। उसी बीच एक मराठा ब्राह्मण प्रभु के दर्शनों के लिये आने लगा। उसका सम्बन्ध श्री स्वामी प्रबोधानन्द जी महाराज से भी था। उसने जाकर महाप्रभु के प्रेम की, उनके संकीर्तन और अद्भुत नृत्य की स्वामी जी से प्रशंसा की।

जिस प्रकार प्रायः अद्वैतवादी सभी बातों को माया और लीला बताकर उपेक्षा कर देते हैं, उसी प्रकार उन्होंने प्रभु के भक्तिभाव की उपेक्षा-सी कर दी और प्रभु के सम्बन्ध में भी उन्होंने उदासीनता के भाव प्रकट किये। उस मराठा भक्त को यह बात अच्छी नहीं लगी, उसने आकर प्रभु से कहा। प्रभु ने उसे समझाते हुए कहा-‘संसार में भिन्न-भिन्न प्रकृति के पुरुष होते हैं, जिनके ऊपर भगवान की पूर्ण कृपा होती है उन्हें ही प्रभु-प्रेम प्राप्त हो सकता है। आपको दूसरों से क्या, लोग जो चाहें सो कहते रहें, आपको प्रभु-प्रसाद प्राप्त करने का सतत प्रयत्न करना चाहिये-यही परम श्रेयस्कर मार्ग है।

इस प्रकार अपने इन भक्तों को सन्तुष्ट करके प्रभु काशी जी से चलकर तीर्थराज प्रयाग पहुँचे। वहाँ भगवती भागीरथी अपनी बहिन सूर्यनन्दिनी कालिन्दी से आकर मिलती हैं, उस सितासित के संगम और सम्मिलन दर्शन से सभी पुरुषों को परमानन्द प्राप्त होता है।महाप्रभु अपने कृष्ण की प्यारी कालिन्दी के दर्शनों से एकदम व्याकुल हो गये और जल्दी से भावावेश में आकर यमुना जी में कूद पड़े। बलभद्र ने उन्हें पकड़कर बाहर निकाला। तीर्थराज की अद्भुत, अपूर्व शोभा को देखकर प्रभु गदगद कण्ठ से स्तोत्र पाठ करने लगे।तीन दिन प्रयाग राज में ठहरकर प्रभु वृन्दावन की ओर चले। चलते-चलते वे मथुरा जी में पहुँच गये। सबसे पहले उन्होंने विश्राम घाट पर पहुँचकर यमुना जी में स्नान किया। ब्रह्मभूमि की पवित्र रज को पाकर प्रभु फूले नहीं समाते थे। वे रज में लोट-पोट होकर अपने आनन्द को प्रदर्शित कर रहे थे।बड़ी देर तक कालिन्दी के कमनीय श्याम कमल के समान नील जल में क्रीड़ा करते रहे। फिर हुंकार देकर बाहर निकले और गीले ही वस्त्रों से कीर्तन करते हुए नृत्य करने लगे।प्रभु के अदभुत नृत्य को देखकर सभी दर्शनार्थी तथा मथुरावासी मन्त्रमुग्ध की भाँति एकटक-भाव से प्रभु की ओर देखने लगे। जो भी आता वही प्रभु को देखते ही ‘कृष्ण-कृष्ण’ कहकर कीर्तन करने लगता। हजारों आदमियों की भीड़ एकत्रित हो गयी।महाप्रभु शरीर की सुध भुलाकर प्रेम में उन्मत्त हुए नृत्य कर रहे थे। 
उसी समय उन्होंने देखा कि भीड़ में एक वैष्णव ब्राह्मण बड़े ही प्रेम के साथ संकीर्तन देखकर बड़े प्रसन्न हुए और उसका हाथ पकड़कर नृत्य करने लगे।
संकीर्तन समाप्त होने पर प्रभु ने उस ब्राह्मण से पूछा- ‘महाभाग! आपको इस अदभुत प्रेमनिधि की प्राप्ति कहाँ से हुई है?’ 
ब्राह्मण ने अत्यन्त ही दीनता के साथ कहा- ‘प्रभो! प्रेमावतार जगन्मान्य श्री माधवेन्द्रपुरी महाराज ने मेरे ऊपर कृपा करके मुझे मन्त्र-दीक्षा दी है। वे ही मेरे दीक्षागुरु हैं, मुझमें जो भी कुछ यत्किंचित प्रेम आपको दीखता है वह उन्हीं महापुरुष की कृपा का फल है।’

श्री मन्माधवेन्द्रपुरी का नाम सुनते ही प्रभु उस ब्राह्मण के पैरों में गिर पडे और उसे बार-बार प्रणाम करने लगे। उसने भय से काँपते हुए कहा- ‘स्वामिन! यह आप कैसा अनर्थ कर रहे हैं, संन्यासी होकर हमारे ऊपर पाप चढ़ा रहे हैं। आप तो हमारे पूजनीय, वन्दनीय और माननीय हैं। संन्यासी होने के कारण आप आश्रम गुरु हैं, इसलिये मेरे पैरों को छूकर मुझे पाप का भागी न बनाइये।’

*प्रभु ने गदगद कण्ठ से कहा- ‘विप्रवर! मैं समझ रहा था कि ऐसा प्रेम मेरे परमगुरु श्री माधवेन्द्रपुरी के जनों में ही सम्भव हो सकता है। भक्ति के उदगमस्थान वे ही भगवान माधवेन्द्रपुरी हैं, मैं उनके शिष्य का शिष्य हूँ, इसलिये आप मेरे गुरु के समान हैं।' 
प्रभु का परिचय उस ब्राह्मण को बड़ा सन्तोष हुआ, वह प्रभु को अपने घर ले गया और वहाँ जाकर प्रभु को भिक्षा करायी। ब्राह्मण ने प्रभु का बहुत अधिक सत्कार किया। वह प्रभु की तन, मन, धन से यथाशक्ति सेवा करने लगा। प्रभु ने ब्राह्मण को साथ लेकर -
(1) अविमुक्तघाट, (2) अधिरूढ़घाट, (3) गुह्यतीर्थ, (4) प्रयागतीर्थ, (5) कनखलतीर्थ, (6) तिन्दुक, (7) सूर्यतीर्थ, (8) बटस्वामी, (9) ध्रुवघाट, (10) ऋषितीर्थ, (11) मोक्षतीर्थ, (12) बोधतीर्थ, (13) गोकर्णघाट, (14) कृष्णगंगा, (15) वैकुण्ठघाट, (16) असिकुण्ड, (17) चतुःसामुद्रिक कूप, (18) अकूटतीर्थ, (19) याज्ञिक विप्रस्थान, (20) कुब्जाकूप, (21) रंगस्थल, (22) मंचस्थल, (23) मल्लयुद्धस्थान, (24) दशाश्वमेध आदि यमुना जी के चौबीसों घाटों पर स्नान किया और स्वयम्भु, विश्रामघाट, दीर्घविष्णु, भूतेश्वर, महाविद्या, गोकर्णादि तीर्थों के दर्शन किये। अब प्रभु ने व्रज-मण्डल के बारहों वनों के दर्शनों की इच्छा की इसलिये उस ब्राह्मण को साथ लेकर आप वनों की यात्रा के लिये चल पड़े।

मथुरा से मधुवन, तालवन, कुमुदवन, बहुलावन आदि वनों को देखते हुए और रास्ते में अनेक तीर्थ कुण्डों में स्नान, आचमन करते हुए प्रभु भगवान की प्रधान लीलास्थली त्रैलोक्यपावन श्रीवृन्दावन की भूमि में पहुँचे। वृन्दावन में प्रवेश करते ही प्रभु भावावेश में आकर मूर्च्छित होकर भूमि पर गिर पड़े। वे चारों ओर आँखें फाड़-फाड़कर पागल की भाँति इधर-उधर देखने लगे। उन्होंने देखा कहीं तो कदम्ब के वृक्षों की पंक्तियां खड़ी हुई हैं। कहीं करील के वृक्षों पर टेंटियां और लाल-लाल फूल लगे हुए हैं। कहीं गौएं चर रही हैं, तो कहीं व्रज के ग्वाल-बाल किलोलें कर रहे है।
क्रमशः

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