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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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कहीं मयूर नाच रहे हैं तो कहीं सारस, हंस, चकवा, जल-मुर्ग आदि जल के पक्षी उड़-उड़कर कालिन्दी-कूल की ओर जा रहे हैं। प्रभु आँखें फाड़-फाड़कर सब की ओर प्रेम भरी दृष्टि से देखने लगते। कभी जल्दी से उठकर वृक्षों को आलिंगन करते, उन पर से बहुत से पुष्प गिर-गिरकर प्रभु के पादपद्यों को ढक देते, मानो वृक्ष अपने प्यारे के पैरो में श्रद्धांजलिस्वरूप पुष्प चढ़ा रहे हों।प्रभु गौओं की ओर पूर्वपरिचित की भाँति दौड़ते और उन की पीठों पर अपने कोमल करोंको फिराते। गौएं रंभाती हुई पूंछ उठा-उठाकर प्रभु की ओर दौड़तीं और उनके हाथ-पैरों को चाटने लगतीं। व्रज के पक्षी प्रभु के बिलकुल निकट आ-आकर अपनी-अपनी भाषा में कुछ कहते, प्रभु उन की प्रेमभरी वाणियों को सुनकर सिर हिलाने लगते, मानो वे उन की बातों को समझ कर संकेत के द्वारा उनका उत्तर दे रहे हैं।
प्रभु के आनन्द की सीमा नहीं रहीं, वे वृन्दावन में आते ही सभी बातों को भूल गये और जिस प्रकार जल से पृथक की हुई मछली फिर महासागर में डाल देने से परमानन्द का अनुभव करती है उसी प्रकार व्रज की पावन रज में लोटकर प्रभु उसी परमानन्दस्वरूप सुख का अनुभव करने लगे।
यहाँ से जाकर प्रभु ने व्रजमण्डल के प्रायः सभी तीर्थों के दर्शन किये। प्रभु के समय में वृन्दावन सचमुच वन ही था। दस-बीस ब्राह्मणों के और ग्वालों के झोंपड़े थे, नहीं तो चारों ओर वन-ही-वन था। बहुत ही भावुक भक्त वहाँ दर्शन करने आते थे और दर्शन कर के मथुरा लौट जाते थे। व्रजमण्डल के बहुत से तीर्थ और कुण्ड लुप्तप्राय हो गये थे। लोग उनका नाम तक नहीं जानते थे।

श्री वृन्दावन आदि तीर्थों के दर्शन….

जब महाप्रभु संन्यास लेने से पूर्व नवद्वीप में ही रहकर भक्तों  के साथ संकीर्तन करते थे तभी उन्होंने भूगर्भ पण्डित और लोकनाथ गोस्वामी को व्रजमण्डल के लुप्त तीर्थों को प्रकट करने और उनका जीर्णोद्धार करने के निमित्त वृन्दावन में भेजा था।इन लोगों ने जब प्रभु के संन्यासी होने की बात सुनी तो ये प्रभु-दर्शनों की लालसा से वृन्दावन को छोड़कर दक्षिण की ओर चले गये थे, इस कारण वृन्दावन आने पर प्रभु की इन से भेंट नहीं हो सकी। महाप्रभु ने स्वयं ही कुछ लुप्त तीर्थों को प्रकट किया।

जिस स्थान पर भगवान ने अरिष्टासुर का वध किया था, वहाँ 'आरिठ' नामका एक ग्राम है, महाप्रभु ने वहाँ आकर लोगों से पूछा कि 'यहाँ पर राधाकुण्ड का पुराणों में उल्लेख मिलता है, वह राधाकुण्ड कहाँ है?' प्रभु के इस प्रश्न का उत्तर ग्रामवासी नहीं दे सके। उनमें से किसी को भी राधाकुण्ड का पता नहीं था।प्रभु का साथी ब्राह्मण भी राधाकुण्ड से अनभिज्ञ था, तब प्रभु ने स्वयं ध्यानमग्न होकर राधाकुण्ड जाना और दो खेतों के बीच में भरे हुए थोड़े से जल में स्नान करके आपने राधाकुण्ड का माहात्म्य वर्णन किया। उस दिन से वही राधाकुण्ड के नाम से प्रसिद्ध हो गया।
राधाकुण्ड को प्रकट कर के प्रभु कुसुम सरोवर पर आये। वहाँ श्रीगोवर्धन-पर्वत के दर्शन करके आप पुलकित हो उठे। भूमि में लोटकर आपने गिरिराज को साष्टांग प्रणाम किया और उस की छोटी-छोटी शिलाओं को लेकर हृदय से चिपटाने लगे।गोवर्धन भगवान का अभिन्न विग्रह है। शास्त्रों में इसे भगवान का शरीर ही बताया गया है। गोवर्धन में प्रभु ने हरिदेव जी के दर्शन किये, फिर ब्रह्मकुण्ड में स्नान कर के वहीं भिक्षा की।
गोवर्धन-पर्वत के ऊपर गोपाल भगवान का मन्दिर था, जिन्हें श्रीमन्माधवेन्द्रपुरी ने प्रकट किया था। उनके दर्शनों की प्रभु को इच्छा हुई, किन्तु प्रभु तो गिरिराज के ऊपर चढ़ना ही नहीं चाहते। वे सोचने लगे कि गोपालभगवान के दर्शन कैसे हों।सर्वान्तर्यामी भगवान अपने भक्त की इच्छा को जान गये। वे तो भाव के भूखे हैं, भक्तों के हाथ तो वे बिना कोड़ी-दाम के ही बिक जाते हैं, फिर पर्वत से नीचे उतरना कौन-सी बात है। उन दिनों गोपाल भगवान की स्थिति अस्थिर थी। मुसलमानों के उत्पातों के कारण वे इधर से उधर घूमते थे।कभी किसी कुंज में ही पूजा हो रही है, तो कभी किसी ग्राम में ही विराजमान हैं। वे तो व्रजवासियों के सखा हैं। ईश्वर  या परमात्मा होंगे तो शिव, ब्रह्मा अथवा लक्ष्मी जी के लिये होंगे। व्रज में वे वही पुराने 'कनुआ' हैं।जब व्रजवासियों को यवनों से भय है, तो उन्हें भी होना चाहिये, इसलिये व्रजवासी ग्वाल-बाल जहाँ भी जाते वहीं गोपाल को साथ ले जाते। उन दिनों एक तुर्क- सेना मूर्तियों को विध्वंस करती हुई आ रही थी, व्रजवासी राजपूत इसी भय से अन्नकूट नामक ग्राम से गोपाल जी को 'गाठौली' नामक ग्राम में ले आये और वहीं गुपचुप चार पांच दिनों तक उन की सेवा पूजा करते रहे। गाठौली ग्राम गिरिराज के नीचे है, प्रभु ने जब सुना कि गोपाल भगवान तो मानो मुझे ही दर्शन देने के निमित्त पर्वत से उतरकर गाठौली में आ विराजे हैं, तब तो प्रभु के आनन्द की सीमा नहीं रहीं।
प्रातःकाल मानसी गंगा में स्नान गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा प्रारम्भ कर दी। गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा सात कोस की बताते हैं, परिक्रमा जहाँ से प्रारम्भ होती है वहीं समाप्त करते हैं, बहुत से मनुष्य तो दण्डवत करते हुए ही सम्पूर्ण परिक्रमा को करते हैं। प्रभु ने भी पूरी परिक्रमा की।महाप्रभु के साथ बलभद्र भट्टाचार्य और वह साधु ब्राह्मण ये दो सेवक और थे, सभी गोविन्दकुण्ड पर पहुँचे। और वहाँ से गाठौली में गोपाल जी का आगमन सुनकर वहाँ पहुँचे। महाप्रभु गोपाल जी की मन-मोहिनी मूर्ति के दर्शनों से मुग्ध हो गये और वे प्रेम में बेसुध होकर गोपाल जी के सामने नृत्य करने लगे और गोपाल-स्रोत द्वारा उन की स्तुति करने लगे। तीन दिन प्रभु गाठौली में रहकर गोपाल जी के दर्शनों का सुख लेते रहे। इस के अनन्तर आप नन्दीश्वर, पावनसरोवर, शेषशायी, लक्ष्मी, खेलातीर्थ, भाण्डीरवन, भद्रवन, लोहवन, गोकुल, महावन आदि भगवान की लीला-स्थलियों के दर्शन करते हुए फिर मथुरा जी में लौट आये और उसी साधु ब्राह्मण के घर में आकर ठहरे।ब्राह्मण ने प्रभु की खूब सेवा की थी, उसी से संतुष्ट होकर प्रभु उस के घर में रहने लगे।
क्रमशः

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