276
श्री श्री चैतन्य चरितावली
276
फिर वहाँ नगर की भीड़-भाड़ को देखकर मथुरा और वृन्दावन के बीच में अक्रूरघाट पर एकान्त समझकर वहाँ रहने लगे।वहाँ से आपने वृन्दावन में जाकर कालीहृद, प्रस्कन्दन क्षेत्र, द्वादशादित्य, केशीतीर्थ, रासस्थली आदि पुण्य तीर्थों के दर्शन किये और सायंकाल को फिर लौटकर अक्रूरतीर्थ में ही आ गये। वहाँ भी बहुत से लोग प्रभु के दर्शनों के निमित्त आने जाने लगे, अतः आप वृन्दावन में यमुना जी के तटपर एकान्त में रहकर भगवन्नम-संकीर्तन करते रहे। वहीं पर कृष्णदास नाम का एक राजपूत क्षत्रिय प्रभु के शरणापन्न हुआ और वह घरबार छोड़कर प्रभु के ही साथ रहने लगा।
एक दिन सम्पूर्ण वृन्दावन में हल्ला हो गया कि वृन्दावन में फिर श्रीकृष्ण उत्पन्न हुए हैं, वे कालीदह में कालिय के फण पर नृत्य करते हैं और कालिय के सिर में की मणि प्रत्यक्ष चमकती है। बहुत से लोग इस बात को सुनकर प्रभु के पास पूछने आये कि क्या यह बात सत्य है। प्रभु ने कहा- 'आप ही जाकर देखिये, सत्य है या असत्य।'
बहुत से लोग रात्रि में कालीदह पर जाकर पहुँचे। सचमुच वहाँ एक काला आदमी खड़ा था और दूर से एक मणि-सी चमक रही थी। लोग आनन्द और कुतूहल के साथ उसी ओर बढ़ने लगे। बलभद्र भट्टाचार्य ने भी कालीदहपर जाकर साक्षात श्रीकृष्ण भगवान के दर्शनों की इच्छा प्रकट की।प्रभु ने प्रेम पूर्वक उस के गाल पर एक हल्का-सा चपत जमाते हुए कहा- 'लोगों की गति तो भेड़ों के समान है। एक भेड़ कुएं में गिर पड़ती है तो सब की सब उस के पीछे ही कुएं में गिर पड़ती हैं। इस कलिकाल में भगवान के प्रत्यक्ष दर्शन होना कोई साधारण बात थोड़े ही है कि सभी को भगवान के साक्षात दर्शन हो जाये।करोड़ों में कोई ऐसे एक-दो भाग्यवान पुरुष होते हैं, जिन्हें भगवत-कृपा से प्रभु के साक्षात दर्शनों का सौभाग्य प्राप्त हो। यहीं बैठकर भगवन्नाम का जप करो। सबेरे लोगों से पूछ लेना कि क्या बात थी।'
भट्टाचार्य ने प्रभु के समझाने पर रात्रि में काली दह पर जाने का विचार छोड़ दिया, इधर लोगों की भीड़ वहाँ पहुँची। वहाँ उन्होंने देखा, एक काले रंग का मल्लाह डोंगी में लालटेन रखकर मछली मार रहा है। उसके हाथ में मछली मारने की बंसी थी। लोगों का भ्रम दूर हुआ। प्रातःकाल जब लोग प्रभु के दर्शनों के लिये आये जब प्रभु ने उनसे पूछा- 'क्या आप लोगों को श्रीकृष्ण भगवान के दर्शन हुए?'
एक तेजस्वी वृद्ध पण्डित ने प्रभु को सभी वृत्तान्त सुनाया और अन्त में कहा- 'वहाँ तो हमें दर्शन हुए सो हुए ही, यहाँ भगवान के प्रत्यक्ष दर्शन अवश्य हो गये।'
प्रभु ने चारों ओर देखते हुए कहा- 'यहाँ कहाँ हैं भगवान? मुझे भी भगवान के दर्शन करा दीजिये। मैं भगवान के दर्शनों के लिये बड़ा उत्सुक हूँ।'
उस ब्राह्मण ने प्रभु की ओर संकेत करते हुए कहा- 'संन्यासी के छद्यवेश में ये ही तो सामने श्रीहरि बैठे हैं।'
इतना सुनते ही प्रभु ने उस वृद्ध ब्राह्मण के पैर पकड़ लिये और रोते-रोते कहने लगे- 'महानुभव आपकी इस अद्भुत निष्ठा को धन्य है, आप को अवश्य ही भगवान का साक्षात हो गया है, तभी तो आप चराचर विश्व में भगवान-भावना रखते हैं। सच्चे भक्त को अपने भगवान के अतिरिक्त दूसरा कोई रूप भासता ही नहीं। उसे सर्वत्र अपने प्यारे के दर्शन होते हैं।' इस प्रकार उस ब्राह्मण की भाँति-भाँति से स्तुति करके उसे विदा किया।
महाप्रभु दिन में वृन्दावन में स्नान-जप से निवृत्त होकर भिक्षा अक्रूर-तीर्थ पर ही आकर किया करते थे। ग्रामवासी ब्राह्मण तथा और द्विजाति के लोग नित्य ही प्रभु को भिक्षा कराने का आग्रह किया करते थे। कभी-कभी तो दस-बीस पांच-पांच आदमियों को साथ ही निमंत्रण आ जाता।महाप्रभु की वहाँ विचित्र दशा थी, जब भी उन्हें इस बात का स्मरण हो उठता कि उसी स्थान में डुबकी मारते हुए अक्रूर को भगवान के दर्शन हुए थे, तभी आप जल्दी से यमुना जी में कूद पड़ते और शरीर की सुधि भूलकर बेहोश होकर यमुना के तीक्ष्ण प्रवाह में बहने लगते। इसलिये भट्टाचार्य को प्रभु की बड़ी ही सावधानी से सदा देख-रेख करनी पड़ती। अतएव भट्टाचार्य ने उस ब्राह्मण से सम्मति लेकर प्रभु को लौटा ले चलने का निश्चय किया।
उन्होंने प्रभु से निवेदन किया- 'प्रभो! यहाँ अब एकान्त विशेष नहीं रहता, निमंत्रण भी बहुत आने लगे है। आप की यहाँ दशा भी विचित्र-सी हो जाती है। इसलिये मेरी प्रार्थना है कि अब यहाँ से चलना चाहिये। माघ की संक्रान्ति भी सन्निकट है, अभी से चलेंगे तो प्रयाग पहुँचकर मकर-स्नान कर सकेंगे, अब जैसी आज्ञा हो!'
प्रभु ने अत्यन्त ही प्रेम पूर्वक कहा- 'भट्टाचार्य महाशय! तुम्हारी ही कृपा से मुझे भगवान की पुण्य-लीलास्थली के दर्शन हो सके हैं। तुमने ही मुझे वृन्दावन के दर्शन कराकर मेरे इस जन्म को सार्थक किया है। अतः यह शरीर तुम्हारा ही है। तुम इसे ले जाना चाहो वहाँ ले जाओ, मुझे इस में कुछ भी आपत्ति न होगी।'
प्रभु की सम्मति पाकर सभी को अत्यन्त ही प्रसन्नता हुई और वह प्रभु का कृपा पात्र राजपूत ठाकुर तथा मथुरा का साधु ब्राह्मण ये दोनों ही प्रभु के साथ-ही-साथ चलने को प्रस्तुत हुए।भट्टाचार्य के सहित चारों ही मथुरा में आये और वहाँ से यमुना-पार करके प्रयाग की ओर चलने लगे। व्रज की पवित्र भूमि को परित्याग करते समय प्रभु को अपार दुःख हुआ। वे शोक में विहृल होकर भूमि पर गिर पड़े और बहुत देर तक अचेतनावस्था में पड़े रहे। जिस किसी भाँति तीनों ने मिलकर प्रभु को सावधान किया और उन्हें साथ लेकर आगे बढ़ने लगे।
पठानों को प्रेम-दान और प्रयाग में प्रत्यागमन….
यमुना पार करके अनिच्छापूर्वक चल रहे थे। वृन्दावन की पुण्य भूमि को छोड़ने में उन्हें अपार कष्ट हो रहा था। भट्टाचार्य आदि प्रभु के साथी उन्हें पकड़कर चल रहे थे। महाप्रभु अब अधिक चलने में समर्थ न हुए। वे एक सुन्दर सघन वृक्ष की छाया में अपने साथियों के सहित बैठ गयें जहाँ बैठकर प्रभु विश्राम कर रहे थे वहीं पास में कुछ गौएं चर रही थीं। व्रजमण्डल की सुन्दर और सीधी गौएं अब भी अपने गोपाल की चुलबुली और प्रेममयी मूर्ति का स्मरण दिलाती हैं।गौएं इधर-उधर चल रही थीं।
क्रमशः
Comments
Post a Comment