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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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पास में ही गौएं चराने वाले ग्वाल-बाल आपस में क्रीड़ा कर रहे थे। व्रजमण्डल की परिधि चौरासी कोस की है। इस चौरासी कोस की बोली में कितनी मिठास है, कितनी सरता है और कितनी निश्छलता है, उसे हृदयवान पवित्र पुरुष ही जान सकता है। व्रजमण्डल के गांवों में पर्दे का विशेष बन्धन नहीं है। होली के दिनों में स्त्री-पुरुष निष्कपटभाव से एक-दूसरे के साथ बिना जान-पहचान के होली खेलते हैं।यों निर्विकार तो पृथ्वी पर कोई है ही नहीं, किन्तु अन्य स्थानों की अपेक्षा व्रजमण्डल में विकारी भाव बहुत कम है। व्रज में 'सारे' कहना तो एक साधारण-सी बात है। 'सारे' वहाँ गाली नहीं समझी जाती। प्रायः बच्चे बात-बात में 'सारे' कहते हैं। व्रजमण्डल के अनपढ़ ग्वाल-बालों के मुखों से भी आप श्रीकृष्ण-लीला के ही पद सुनेंगे।व्रज के अनपढ़ मनुष्य श्रीकृष्ण-लीला-सम्बन्धी रसिया बड़े ही स्वर से गाते हैं। सुनते-सुनते उनमें से रस टपकने लगता है और सुनने वाला उस मधुर रस में छक-सा जाता है। गौओं को एक ओर छोड़कर ग्वाल-बाल मिलकर गीत गा रहे थे- सभी मिलकर हाथ उठा-उठाकर और कमर को हिला-हिलाकर गा रहे थे-

वारो सो कन्हैया कालीदह पै खेलन आयो रे! 
मार्यो टोल गेंद गई दहमें-
(अरररर) वह तो गैंद के संगई धायो रे।

कुछ ग्वाल-बाल गा रहे थे, एक उनमें से त्रिभंगललित-गति से खड़ा होकर बांसुरी बजा रहा था। वह अपने साथियों की तान के साथ ही चेष्टा को बताया हुआ और सिर को इधर-उधर घुमाता हुआ वंशी  बजा रहा था। महाप्रभु ने व्रजमण्डल में मुरली की मधुर तान सुनी, उन की दृष्टि सामने की क्रीड़ा करती हुई ग्वाल-मण्डली के ऊपर पड़ी। बस, फिर क्या था, वे प्रेम में गद्गद होकर अपने-आप को भूल गये और एकदम ऊपर उछलने लगे। उछलते-उछलते बेहोश होकर पृथ्वी पर गिर पड़े। इतने में ही कोई मुसलमान राजकुमार अपने धर्मगुरु के साथ दस-बीस घुड़सवारों को लिये हुए वहाँ आ निकला। उन सवारों में से किसी एक ने बेहोश हुए प्रभु को देखा। महाप्रभु के मुख से झाग निकल रहे थे और उन की आँखें ऊपर चढ़ी हुई थीं।

प्रभु की ऐसी दशा देखकर उस सवार ने अपने स्वामी से यह बात कही। सभी सवार फौरन अपने-अपने घोड़ो पर से उतर पड़े। महाप्रभु के अदभुत रूप-लावण्ययुक्त दिव्य मुख को देखकर सभी हठात उन की ओर आकर्षित हो गये और उन सबके हृदय में प्रभु के प्रति प्रगाढ़ प्रेम उत्पन्न हो गया। उन्होंने समझा कि इस संन्यासी के पास कुछ द्रव्य होगा, उसी के लालच से इसके साथियों ने उसे धतूरा दे दिया है। यह सोचकर उन सवारों के सरदार ने प्रभु के सभी साथियों को कसकर बांध लिया और कहने लगे-'यहीं इनका कत्ल कर डालो।'
कत्ल का नाम सुनते ही बंगाली भट्टाचार्य महाशय तो सिटपिटा गये। बंगालियों की ढीली धोती वैसे ही मशूहर है, फिर परदेश में तो अच्छे-अच्छे साहसियों की सिटल्ली भूल जाती है। बेचारे भट्टाचार्य थर-थर काँपने लगे। इस पर उस मथुरा के साधु ब्राह्मण ने साहस करके कहा- 'आपलोग हमारे ऊपर व्यर्थ ही संदेह करते हैं।हम यहीं के तो हैं। हमें आप यहाँ के शासनकर्ता के पास ले चलिये। वहाँ हमारे बहुत-से यजमान और शिष्य हैं। वे सब हमें जानते हैं। हम कभी ऐसा काम कर सकते हैं ?' ब्राह्मण की इस बात से उन लोगों को सन्तोष नहीं हुआ।
प्रभु का तीसरा साथी राजपूत था। उसका नाम था कृष्णदास। इस घटना से कृष्णदास के रजपूती खून में जोश आ गया। वह कड़क कर बोला- 'मालूम पड़ता है, अभी तुम लोगों ने हमें पहचाना नहीं।हम राजपूत हैं, राजपूत। शस्त्र  लेकर युद्ध में लड़ना ही हमारा नित्य का काम हैं। अभी मेरे आवाज देने पर सैकड़ों योद्धा यहाँ एकत्रित हो जायंगे और बात-की-बात में तुम्हें अपने इन बड़े वचनों का मजा मिल जायेगा।'

इस बात से मन में कुछ भयभीत-से होकर वे सवार अपने पीर साहब की ओर देखने लगे। पीर जी ने कुछ गम्भीरता के साथ शांतस्वर में पूछा- 'हम यह जानना चाहते हैं कि ये इतने सुन्दर तेजस्वी और स्वस्थ शरीर के युवक संन्यासी बेहोश क्यों पड़े हैं?'

*कृष्णदास जी ने कहा- 'ये हमारे गुरु हैं, इन्हें कभी-कभी मिरगी का दौरा हो जाता है, इस समय ये उसी के दौरे से बेहोश पड़े हैं।'
कृष्णदास इतना कह ही रहे थे कि प्रभु उसी समय चैतन्यता लाभ करके उठकर खड़े हो गये और जोरों से प्रेम में गद्गद होकर नृत्य करने लगे। तब राजकुमार बिलजी खाँ ने पूछा- 'साधू बाबा! आप अब तक बेहोश क्यों पड़े थे? मालूम पड़ता है, आपके इन साथियों ने आपको भूल से धतूरा खिला दिया है, उसी से आप बेहोश थे।अपने रूपये-पैसे देख लीजिये। इन धतूरा खिलाने वाले साथियों को आप जो कहेंगे, वही उचित दण्ड दिया जायेगा।' 
प्रभु ने अत्यन्त ही सरलता के साथ कहा- 'भाइयो! ये मेरे साथी मेरे दूसरे शरीर ही हैं। इन्हीं की कृपा से तो मुझे व्रजमण्डल के समस्त तीर्थों के दर्शन हो सके हैं। मैं तो भिक्षुक संन्यासी हूँ, कामिनी-कांचन का कभी स्पर्श नहीं करता। मुझे धतूरा देने से किसी को क्या लाभ हो सकता है? आप लोग घबड़ाये नहीं, मुझे कभी-कभी मिरगी का दौरा हो उठता है, उसी के दौरे में मैं बेहोश हो गया था और कोई भी कारण नहीं है।' 
प्रभु के ऐसा कहने पर उन लोगों ने सभी साथियों के बन्धन खोल दिये।अब प्रभु की और उस राजकुमार के धर्मगुरु (पीरसाहब)- की परस्पर में कुछ धार्मिक बातें होने लगीं। वह यवन राजकुमार बड़ा ही सहृदय, सुशील, शान्त और कोमल प्रकृति का था। प्रभु के दर्शनों से ही उस पर बड़ा भारी प्रभाव पड़ा। वह प्रभु की सरलता, भावुकता और तन्मयता को देखकर मुग्ध हो गया और हृदय से उन्हें प्यार करने लगा।पीर साहब भी धर्मान्ध नहीं थे, उनके हृदय में भी सद्विवेक, विचार और प्रेम-प्रसंग को समझने की शक्ति थी। प्रभु की प्रेम भरी बातों को सुनकर वह अपने इस्लामीपन के आग्रह को छोड़कर प्रभु के शरणापन्न हुआ। प्रभु के पैर पकड़कर वह कहने लगा- 'आप सचमुच नारायण हैं।आपके दर्शनों से मुझे बड़ी शान्ति हुई है।
क्रमशः

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