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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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अब आप मेरे उद्धार का कोई उपाय बताइये। मैं तो पीरपन के मिथ्याभिमान में अपने स्वरूप को ही भूल गया था। आपने मुझे डूबते हुए को हाथ पकड़कर उबारा है, अब आप ही मुझे आगे का रास्ता भी कृपा करके बतावें।'

प्रभु ने कहा- 'आपका हृदय शुद्ध है, इसमें अभिमान रह ही नहीं सकता। यह तो राम के रहने की जगह है।अन्तर्यामी भगवान सबके हृदयों की बातें जानते हैं। भगवान सर्वशक्तिमान और सब कुछ करने में समर्थ हैं। उनसे किसी के हृदय का भाव छिपा नहीं है। उन्हें किसी भी नाम से पुकारिये, उनके किसी भी रूप का सच्चे हृदय से ध्यान कीजिये, उसी से वे प्रसन्न हो जायँगे, क्योंकि संसार में जितने नाम हैं, जितने रूप हैं, वे सब उन्हीं के हैं। उनके बिना किसी नाम-रूपी की प्रतीति ही नहीं हो सकती।भगवान् को दास्यभाव से भजना चाहिये। अपने को गुरु आचार्य या शिक्षक नहीं समझना चाहिये। आज से अपने को रामदास समझिये इसी में आपका कल्याण है।'

बस, उसी समय से उसने अपने नाम रामदास रख लिया और वह 'श्रीकृष्ण, श्रीकृष्ण' कहकर नृत्य करने लगा। राजकुमार बिजली खाँ तो पहले से ही प्रभु को आत्म समर्पण कर चुका था, उसके कोमल-हृदय में प्रभु की प्रेममयी मूर्ति पहले से ही विराजमान हो चुकी थी। किंतु अब तो वह अपने को नहीं रोक सका।आपने धर्मगुरु के इस परिवर्तन का उसके ऊपर अत्यधिक प्रभाव पड़ा। वह भी 'कृष्ण-कृष्ण' कहकर प्रभु के चरण-कमलों में लोटने लगा। प्रभु ने उसे प्रेमालिंगन प्रदान किया। मानों उसके शुद्ध हृदय में प्रभु ने शक्ति का संचार कर दिया हो। प्रभु के प्रेमालिंगन को पाते ही सरल हृदय राजकुमार पागल की भाँति नृत्य करने लगा। उसी समय उसने इस्लामी धर्म की पद्धति को छोड़कर वैष्णवधर्म की शरण ली।वह अपने साथियों के सहित सदा श्रीकृष्ण-कीर्तन में ही मग्न रहने लगा। वे सब-के-सब पठान वैष्णव के नाम से प्रसिद्ध हुए। उनका एक अलग दल ही बन गया। बिजलीखां हिन्दुओं के जिस तीर्थ में भी जाता वहीं वैष्णव लोग उसके भक्ति-भाव से सन्तुष्ट होकर उसका अत्यधिक आदर करते। इस प्रकार पठानों को प्रेम-दान देकर प्रभु गंगा जी के किनारे सोरौं (सूकरक्षेत्र) में पहुँचे। सोरौं में गंगा-स्नान करके प्रभु बड़े ही प्रसन्न हुए।उन्होंने अपने साथी कृष्णदास  को तथा उस माथुरिया साधु बाबा को यहीं से लौट जाने की आज्ञा दी। इस पर वे प्रभु के पैर पकड़कर रोते-रोते कहने लगे- 'प्रभो! यदि आप हमें सदा अपने पास रखना नहीं चाहते तो प्रयाग तक चलने की आज्ञा तो अवश्य ही दीजिये। मकर की संक्रान्ति का स्नान करके हम लौट आवेंगे।'

प्रभु ने उन दोनों की विनती स्वीकार कर ली और आप अपने सभी साथियों के सहित भगवती भागीरथी के किनारे-किनारे प्रयाग की ओर चले। गंगा जी के किनारे के प्रायः सभी ग्राम गंगा माता के प्रभाव के कारण बड़े ही शुद्ध-पवित्र होते हैं। उन ग्रामों के प्रायः सभी गृहस्थ साधु-महात्माओं को बड़ी ही श्रद्धा के साथ भिक्षा देते हैं। इसीलिये अच्छे-अच्छे विरक्त साधु-महात्मा राजपथ (सड़क) से कभी यात्रा नहीं करते, वे निरन्तर माता का दर्शन करते हुए और माता के अमृत-तुल्य जल का पान करते हुए गंगा जी के किनारे-किनारे ही विचरण करते हैं। गंगा जी के किनारे यात्रा करने में पग-पग पर प्रयाग का फल मिलता है। गंगा जी के किनारे को साधु-महात्माओं का राजमार्ग ही समझना चाहिये।प्रभु भी गंगा जी के किनारे के ग्रामों में हरिनाम-संकीर्तन का प्रचार करते हुए और लोगों को प्रेमानन्द में प्लावित करते हुए प्रयाग पहुँचे तथा वहाँ पर पुनः यमुना जी के दर्शन करके प्रेम में उन्मत्त होकर नृत्य करने लगे। प्रयागराज में संगम पर वैसे ही सदा मेला-सा लगा रहता है किन्तु प्रभु के आने से उस मेले की शोभा और भी अधिक बढ़ गयी। हजारों आदमी आ-आकर प्रेम में विभोर होकर प्रभु के साथ नाचने लगते और नाचते-नाचते बेहोश होकर भूमि पर गिर पड़ते। इस प्रकार प्रभु के प्रयाग में आने से वहाँ पर भक्ति की एक प्रकार से बाढ़-सी आ गयी। सभी प्रभु प्रदत्त प्रेमासव का पान करके पागल-से बन गये और अपने-आपको भूलकर सदा-

श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे हे नाथ नारायण वासुदेव।

भगवान के इन सुमधुर नामों से आकाश मण्डल को गुंजाने लगे।

श्री रूप को प्रयाग में महाप्रभु के दर्शन…

गौड़ेश्वर के मन्त्री रूप और सनातन-रामकेलि नामक ग्राम में प्रभु के दर्शन करके और नूतन जन्म पाकर ये दोनों भाई प्रभु से विदा हुए। प्रभु के दर्शनों से ही इनके भीतर छिपी हुई भावुकता और भगवद्भक्ति एकदम प्रस्फुटित हो उठी। इन्हें अपने पूर्वकृत्यों पर पश्चात्ताप होने लगा।साधु-संग से संसार में मनुष्य-शरीर की सार्थकता का बोध होता है और तभी अपने गतजीवन की निरर्थकता का भान होने लगता है। उसी समय हृदय में पश्चात्ताप की अग्नि जलने लगती है, उस अग्नि में पड़कर सुवर्ण के समान मन दहकने लगता है।पश्चात्तापरूपी अग्नि के उत्ताप से मन का मैल जलकर भस्म हो जाता है और फिर केवल शुद्ध सुवर्ण ही शेष रह जाता है। फिर उसमें मैल का नाम तक नहीं रहता, वह एकदम निर्मल होकर चमकने लगता है, उसी में होकर भगवान के दर्शन होते हैं।दर्शन क्या होते हैं भगवान उसमें आकर विराजमान हो जाते हैं, और फिर उसे अपना घर ही नहीं, कलेवर बना लेते हैं। इसलिये साधु-संग का प्रधान फल पूर्वकृत पापों का पश्चात्ताप ही है। जिसे साधु-संग पाकर भी पश्चात्ताप नहीं हुआ, उसे या तो यथार्थ साधु-संग ही प्राप्त नहीं हुआ या वह पूर्वजन्मकृत पापों का कारण इतना अपात्र है कि अभी उसे चिरकाल तक साधु-सेवा करने की आवश्यकता है। जब भी पूर्वकृत कर्मों के लिये हृदय में घबड़ाहट हो और प्रभु-प्राप्ति के लिये हृदय सदा छटपटाता-सा रहे, तभी समझना चाहिये कि साधु संगति का वास्तविक फल मिल गया।ये दोनों ही भाई भाग्यवान थे, भगवान के निज जन थे, अनुग्रहसृष्टि के जीव थे। प्रभु के दर्शन मात्र से ही इनकी काया पलट हो गयी। प्रभु के दर्शन करते ही इन्हें पद, प्रतिष्ठा, परिवार, पैसा और प्रिय पदार्थों से एकदम घृणा हो गयी।इनका मनमधुप वृन्दावन  की कुंजों में विहार करने के लिये छटपटाने लगा।
क्रमशः

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