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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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जिस प्रतिष्ठित पद के लिये संसारी लोग सब कुछ करने के लिये तैयार हो जाते हैं, वही राजमन्त्री का पद उन्हें घोर बन्धन-सा प्रतीत होने लगा। रूप तो लौटकर गौड़ गये ही नहीं।वे अपनी धन-सम्पत्ति को नाव पर लाद कर दस-बीस नौ के साथ अपनी जन्मभूमि फतेहबाद को चले गये। वहाँ जाकर अपना आधा धन तो उन्होंने ब्राह्मण और कंगालों को बांट दिया। कुछ परिवार के लिये रख दिया और दस हजार रूपये गौड़ में एक मोदी की दुकान पर जमा कर दिये।

इधर महाभाग सनातन की दशा रूप से भी अधिक विचित्र हो गयी। वे लौटकर राजधानी में तो गये; किन्तु राजकाज करने में एकदम असमर्थ-से हो गये। सब काम मन से ही होते हैं, मन तो एक ही है, उससे चाहे इस लोक का काम करा लो या परमार्थ के मार्ग का शोधन करा लो। एक मन दो काम कदापि नहीं कर सकता। सनातन जानते थे कि बादशाह मुझे प्राणों से भी अधिक प्यार करता है, यदि मैं एकदम राज मैं एकदम राजकाज से त्यागपत्र दे दूँ, तो बादशाह उसे कदापि स्वीकार न करेगा और फिर आजकल तो उसका उड़ीसा-देश के महाराज से युद्ध छिड़ा हुआ है।वह मेरे ऊपर सबसे आधिक विश्वास रखता है, ऐसे समय में वह मुझे कभी न छोड़ेगा। यह सब सोचकर उन्होंने बादशाह को कहला भेजा- 'मै बीमार हूँ, राजकाज करने में एकदम असमर्थ हूँ। कुछ समय का अवकाश चाहता हूँ।'

बादशाह को इनकी बीमारी की बड़ी चिन्ता हुई। उसने अपने दरबार के प्रधान हकीम को इनके इलाज के लिये भेजा। वैद्य ने जाकर इनकी नाड़ी देखी किन्तु वह अनाड़ी इनकी नाड़ी को क्या पहचान सकता ? इनकी वेदना को तो कोई परमार्थी वैद्य ही जान सकता था।इस लोक के वैद्यों की पुस्तकों में न तो इस रोग का निदान है और न चिकित्सा। राजवैद्य ने इनसे सम्पूर्ण शरीर की परीक्षा करके कहा- 'महाशय, मुझे आपके शरीर में कोई रोग दीखता नहीं।' इस बात को सुनकर सनातन जी मुसकरा दिये, उन्होंने कुछ भी उत्तर नहीं दिया।
दरबारी हकीम ने जाकर बादशाह से कह दिया- 'श्रीमन! मुझे तो इनके शरीर में कोई रोग दीखा नहीं। वे तो भलेचंगे बैठे हुए पण्डितों से भागवत की कथा सुन रहे हैं। मैंने तो आज तक ऐसा रोगी कोई भी नहीं देखा।'
बादशाह इतना सुनते ही आगबबूला हो गया। वह उसी समय उठकर स्वयं सनातन जी वासस्थान पर पहुँचा। सचमुच सनातन जी बैठे हुए कथा सुन रहे थे। दस-बीस ब्राह्मण पण्डित उनके इधर-उधर बैठे हुए थे।बादशाह को सहसा अपने यहाँ आते देखकर सनातन जी उठकर खड़े हो गये और उनकी अभ्यर्थना करके उनके बैठने योग्य एक सुन्दर-सा आसन दिया। सबके बैठ जाने पर बादशाह ने कुछ बनावटी व्यग्रता-सी प्रकट करते हुए बोला- 'मल्लिक महाशय, तुम्हें क्या बीमारी हो गयी हैं ?'

कुछ वैसे ही अन्यमनस्क भाव से धीरे-धीरे सनातन जी ने कहा- 'वैसे ही श्रीमन! कुछ तबीयत खराब-सी है। काम करने में बिलकुल जी ही नहीं लगता।'
बादशाह ने कहा- 'कुछ भी तो बात होगी, मुझे ठीक-ठीक बताओ क्या रोग है क्या बीमारी है और काम में चित्त न लगने का कारण क्या है ?'
उसी तरह से उपेक्षा के भाव से सनातन जी ने कहा- 'नहीं, कोई खास बात नहीं है। तबीयत ठीक नहीं हैं।'
अब बादशाह अपने रोब को नहीं रोक सका, उसने कड़ककर कहा- 'राजकाज से तुम्हारी यह लापरवाही ठीक नहीं तुम जानते हो मैं तुम दोनों भाइयों पर कितना अधिक विश्वास रखता हूँ, किन्तु देखता हूँ, तुम दोनों ठीक समय पर ही मुझे धोखा देना चाहते हो। इसे विश्वास घात न कहूँ तो और क्या कहूँ।तुम्हारा भाई यहाँ से भागकर फतेहाबाद चला गया। तुम बीमार न होने पर भी बीमारी का बहाना बनाये घरमें बैठे हो। इस धोखे बाजी के अंदर कौन-सी बात छिपी है, मुझे सच-सच बताओ। तुम्हारी लापरवाही के कारण मेरा सभी राजकाज चौपट हो गया है। तुम्हें राजकाल करना होगा और कभी चलकर अपना काम संभालना होगा।'

अत्यन्त ही नम्रता के साथ किन्तु निर्भीकभाव से सनातन जी ने कहा- 'श्रीमान! आप जो चाहें सो समझें। मैं सदा आपके हित की बात सोचता रहा हूँ, और अब भी आपका शुभचिन्तक हूँ, किन्तु अब मुझसे राजकाज नहीं हो सकता।'
लाल-लाल आँखें निकालते हुए बादशाह ने कहा- 'क्यों नहीं हो सकता?'
उसी प्रकार नम्रता के साथ सनातन ने उत्तर दिया- 'इसीलिये कि श्रीमन्! अब मेरा मन मेरे वश में नहीं है, वह वृन्दावन की ओर चला गया है।'
बादशाह ने झुँझलाकर कहा- 'मैं यह सब सुनना नहीं चाहता तुम एक बात बताओ। राजकाज संभालते हो या नहीं ?'
दृढ़ता के साथ सनातन जी ने कहा- 'मैंने श्रीमान से पहले ही निवेदन कर दिया है कि मैं अब किसी प्रकार राजकाज न कर सकूँगा।'

सनातन जी की इस दृढ़ता को देखकर बादशाह हुसैनशाह एकदम चकित हो गया। जो आज तक सदा हाथ बांधे हुए मेरी आज्ञा की प्रतीक्षा करता रहता था, वही मेरा वेतन भोगी नौकर मेरे सामने इस प्रकार निर्भीक होकर उत्तर दे रहा है। इस बात से उसे क्रोध आया किन्तु असमय में क्रोध प्रकट करना उचित न समझकर बादशाह ने कुछ बनावटी प्रेम प्रदर्शित करते हुए कहा- 'अच्छा, जाने दो, तुम यहाँ का काम मत करो।मेरे साथ लड़ाई करने उड़ीसा देश को तो चलोगे?' 
सनातन जी ने फिर उसी तरह कहा- 'श्रीमन मुझे किसी खास काम से चिढ़ नहीं है। मुझे तो संसारी जितने काम हैं। सभी काटने को दौड़ते हैं। मैं कुछ भी न कर सकूँगा। आप मुझसे अब किसी प्रकार के काम की आशा न रखें।'
अपने भीषण क्रोध को दबाते हुए और रोष से ओठ चबाते हुए बादशाह ने कहा- 'शाकिर मल्लिक! तुम होश में होकर बातें कर रहे हो या नशे में? तुम्हें पता है, तुम किससे बातें कर रहे हो ? अपनी बात पर फिर से सोच लो और खूब समझ-सोचकर उत्तर दो।'

सनातन जी ने कहा- श्रीमान! मैंने कोई नशा नहीं किया है। मै खूब होश में होकर बातें कर रहा हूँ। मुझे पता है कि गौड़-देश के एकमात्र स्वतंत्र शासक और बंगाल के अधीश्वर से मैं बातें कर रहा हूँ, जिनकी छोटी-सी आज्ञा से देश-के-देश नष्ट-भ्रष्ट और बरबाद हो सकते हैं।जिनकी आज्ञा निष्फल नहीं हो सकती।
क्रमशः

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