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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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श्रीमन! मैंने खूब सोच लिया है और खूब सोचकर ही उत्तर दे रहा हूँ कि मुझसे अब राजकाज किसी भी हालत में न हो सकेगा।'
क्रोध के स्वर में बादशाह ने कहा- 'तुम जानते हो, तुम्हारी इस धृष्टता का फल क्या होगा ?'
सिर झुकाकर सनातन जी ने कहा- 'मैं खूब जानता हूँ, यह सिर धड़ से अलग हो जायेगा, श्रीमन! इसकी मुझे तनिक भी परवा नहीं।'
बादशाह आगे कुछ न कह सका। उसने उसी समय क्रोध में भरकर कहा- 'कोई है?'
फौरन दो सेवक प्रणाम करके बादशाह के सम्मुख खड़े हो गये। बादशाह ने कहा- 'राज के प्रधान कर्मचारी से कहकर इसे अभी जेल खाने पहुँचाओ।'
राजाज्ञा क्षणभर में ही पालन की गयी।
सनातन जी उसी समय राजबन्दी बनाकर कारावास में भेजे गये। इधर बादशाह ऐसी आज्ञा देकर उड़ीसा-प्रान्त में युद्ध करने के लिये चला गया।
दूसरे भाई रूपजी ने अपने भाई के राजबन्दी होने का समाचार सुनने के पूर्व ही उन्होंने प्रभु की खोज के लिये दो नौकर पुरी भेजे थे। उन्होंने आकर समाचार दिया कि प्रभु तो वन के पथ से श्री वृन्दावन की यात्रा करने चले गये हैं। प्रभु के वृन्दावन-गमन का समाचार सुनकर रूप अपने छोटे भाई अनूप (श्रीवल्लभ) को साथ लेकर प्रभु की खोज में वृन्दावन की ओर चल पड़े।चलते समय वे अपने भाई सनातन के पास एक पत्र इस आशय का भेज गये कि 'हम श्री चैतन्य की खोज में वृन्दावन जा रहे हैं। हमारा मनमधुप चैतन्य-चरणारविन्दों का मकरन्द पान करने के निमित्त उन्मत्त-सा हो रहा है। अब हम अपने को क्षण भर भी यहाँ नहीं रख सकते।श्रीचैतन्य-चरण जहाँ भी होंगे वहीं जाकर हम उनके शरणापन्न होंगे। आप किसी बात की चिन्ता न करें। मंगलमय श्रीचैतन्य आपका भला करेंगे। वे आप को शीघ्र ही इस कारागार के बन्धन से ही नहीं, संसारी बन्धन से भी उन्मुक्त करेंगे। अमुक मोदी की दुकान पर आप के निमित्त मैं दस हजार रूपये जमा कर चला हूँ। यदि कारावास मुक्ति में उनका कुछ उपयोग हो सके तो कीजिये और शीघ्र ही कारागार से मुक्त होकर व्रज में आकर श्रीचैतन्य-चरणों के दर्शन कीजिये।यह पत्र मैं गुप्त रीति से आप के पास भेज रहा हूँ। मंगलमय भगवान आपका भला करें।
गुप्त रीति से यह पत्र सनातन जी के पास पहुँचा। पत्र को पढ़कर उनका चित्त भी श्रीचैतन्य-चरणों के दर्शनों के लिये तड़फड़ाने लगा। वे किसी-न-किसी प्रकार जेल से उन्मुक्त होने का उपाय सोचने लगे।उधर रूप जी अपने भाई अनूप जी के साथ प्रभु की खोज करते हुए काशी होकर प्रयाग पहुँचे। प्रयाग में प्रतिष्ठानपुर (झूसी) के घाट से पार होकर वे वर्तमान दारागंज के समीप पहुँचे। वहीं उन्हें अनेक आदमियों से घिरे हुए महाप्रभु चैतन्यदेव जी के दर्शन हुए। प्रभु प्रेम में विभोर हुए भक्तों के साथ संकीर्तन-नृत्य करते हुए विन्दुमाधव जी के दर्शन के लिये जा रहे थे।वे दोनों भाई भी उस भीड़ के साथ-ही-साथ हो लिये, महाप्रभु को जो भी नृत्य करते हुए देखता वही उनके साथ चल पड़ता। इस प्रकार विन्दुमाधव जी के दर्शन करके प्रभु लौटे।
एक दक्षिणी ब्राह्मण ने उस दिन निमंत्रण किया था।महाप्रभु उसके यहाँ भिक्षा करने गये। भीड़ हट जाने पर ये दोनों भाई प्रभु के पीछे उस ब्राह्मण के घर में घूस गये। ब्राह्मण ने अपने घर के बाहर छोटे-से उद्यान में पत्थर की चैकी पर प्रभु के लिये आसन बिछाया था। प्रभु उस पर बैठे हुए चारों ओर वाटिका की शोभा को निहार रहे थे कि उसी समय रूप और अनूप इन दोनों भाइयों ने प्रभु के पादपद्मों में साष्टांग प्रणाम किया।रूप को अपने पैरों में प्रणत देखकर प्रभु जल्दी से आसन से उठकर खड़े हो गये और उन्हें बलपूर्वक उठकार छाती से चिपटाते हुए उनके सिर पर अपने कोमल कर फिराने लगे।महाप्रभु के बैठ जाने पर दोनों भाई प्रभु के पैरों को पकड़े हुए बैठे। प्रभु ने अनूप का परिचय पूछा और सनातन जी के समाचार जानने चाहे। श्री रूप जी ने सभी वृत्तान्त सुनाकर कहा- 'प्रभो! वे श्री चरणों के दर्शन के लिये कारावास की काली कोठरी में पड़े हुए तड़प रहे होंगे।'
प्रभु ने हंसते हुए कहा- 'अब वे कारावास में कहाँ, अब तो वे वहाँ से छूट गये होंगे। भगवान करेंगे तो शीघ्र ही तुम दोनों भाइयों की भेंट होगी। अब तुम कुछ काल यहीं मेरे पास रहो' यह कहकर प्रभु ने अपने पास ही इन दोनों भाइयों को रहने के लिये स्थान दे दिया।बलभद्र भट्टाचार्य ने इन दोनों भाइयों को भोजन कराया और प्रभु का प्रसादी-अन्न भी इन्हें दिया। इस प्रकार ये दोनों ही भाई आनन्द के साथ प्रभु की सेवा में रहने लगे।
महाप्रभु वल्लभाचार्य....
पुष्टिमार्गीय सम्प्रदाय के प्रवर्तक भगवान श्रीवल्लभाचार्य महाप्रभु चैतन्यदेव के समकालीन ही थे। इन दोनों महापुरुषों के जीवन में बहुत अधिक साम्य है। दोनों ही भगवान के अनन्य भक्त थे। दोनों ही लोक-शिक्षक आचार्य थे, दोनों ही भक्तिमार्ग के प्रवर्तक थे और दोनों ही अपने-अपने सम्प्रदायों में भगवान के अवतार माने जाते हैं।दोनों ही महाप्रभु कहलाते थे। दोनों का ही जन्म केवल छः वर्ष के आगे-पीछे हुआ। भगवान वल्लभाचार्य महाप्रभु चैतन्यदेव से छः वर्ष पूर्व ही इस अवनि पर अवतरित हुए और दो-ढाई वर्ष पहले इस संसार से तिरोभाव को प्राप्त हुए।दोनों का ही जीवन में त्याग, वैराग्य और प्रेम के भाव पूर्णरीत्या विकसित हुए थे। दोनों ही अपने प्रचण्ड प्रेम के प्रभाव से प्रेमामृतरूपी भक्तिरस से पृथ्वी को परिप्लावित बना दिया। दोनों ही नम्र थे, दोनों ही रसिक थे, दोनों ही गुणग्राही, शान्त, अदोषदर्शी और प्रेमोपासक थे।इन दोनों महापुरुषों का दो बार परस्पर में समागम भी हुआ था। उसका निष्पक्ष विवरण प्राप्त नहीं होता। फिर भी इतना जाना जाता है कि ये एक-दूसरे से अत्यन्त ही स्नेह करते थे और दोनों में बहुत अधिक प्रगाढ़ता रही होगी।क्यों न रहे, जों संसार को अपने प्रेमामृत से अमर बना सकते हैं, ये आपस में संकुचित या विद्वेषपूर्ण भाव रख ही कैसे सकते है? जिसके जीवन में त्याग, वैराग्य और प्रेमरूपी चैतन्यता है, वही चैतन्य-चरितावली का पात्र है, इसलिये श्रीवल्लभाचार्य का चरित्र यहाँ अप्रासंगिक न होगा और उनके चरित्र से पाठकों को शान्ति तथा आनन्द की ही प्राप्ति होगी।
क्रमशः
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