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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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इतनी भारी सम्पत्ति, इतनी अधिक प्रतिष्ठा, स्त्री, बच्चे तथा शिष्य-सेवकों से एकदम पृथक होकर आप निरन्तर भगवत-अर्चा-पूजा और नाम-संकीर्तन में ही लगे रहते थे। इस प्रकार अपने परम त्यागमय जीवन के द्वारा अपने शिष्य-प्रशिष्य तथा वंशजों के लिये त्याग का आदर्श बताते हुए संवत 1587 के आषाढ़ मास की शुक्ला तृतीया के दिन आप इस असार संसार से विदा होकर वैकुण्ठवासी बन गये।
महाप्रभु वल्लभाचार्य, विशेषकर गोकुल, अरैल, चुनार और काशी में ही रहते थे। इन चारों ही स्थानों में इनकी बैठकें अभी तक बनी हुई हैं और वे 'महाप्रभु बैठक' के नाम से प्रसिद्ध हैं। इनके वंशज गोकुलिया गोसाईं कहे जाते हैं। भारतवर्ष में इसी सम्प्रदाय के आचार्य सबसे अधिक धनी और वैभवशाली बताये जाते हैं।बड़े-बड़े महाजन धनी-सेठ इस कुल के सेवक तथा शिष्य हैं। आचार्य के द्वितीय पुत्र श्री विट्ठलनाथ जी महाराज को इस सम्प्रदाय के लोग साक्षात श्रीकृष्ण का अवतार मानते हैं। उन्होंने इस सम्प्रदाय का खूब प्रचार किया। ये बड़े ही तेजस्वी, कर्मपरायण तथा धर्म में आस्था रखने वाले आचार्य थे। इनके गिरधरलाल जी, गोविन्दलाल जी, बालकृष्ण जी, गोकुलेश जी, रघुनाथ जी, यदुनाथ जी और घनश्यामलाल जी- ये सात पुत्र हुए। इनकी सात गद्दियाँ अभी तक विद्यमान हैं।पीछे इनके वंशज बहुत बढ़ गये जो बम्बई, काशी, मथुरा, गोकुल, नाथ द्वारा आदि भिन्न-भिन्न स्थानों में अभी तक विद्यमान हैं। इनके शिष्य-सेवक गोस्वामी-बालकों को अभी तक भगवत-बुद्धि से मानते तथा पूजते हैं।
वल्लभ-सम्प्रदाय विशेषकर खण्डन परक सम्प्रदाय नहीं है। दार्शनिक सिद्धान्तों की बात छोड़कर इस सम्प्रदाय में जहाँ तक हमें मालूम है, किसी सम्प्रदाय की पूजा-पद्धति का खण्डन नहीं किया गया है। वल्लभ-सम्प्रदाय में वैदिक कर्मों का अन्य सम्प्रदायों की तरह खण्डन नहीं हैं, किन्तु उसमें श्रीकृष्ण-सेवा को ही प्रधानता दी गयी है। ब्रह्मा-सम्बन्ध-संस्कार इनके यहाँ मुख्य माना जाता है। गुरु शिष्य के कान में मन्त्र देता है, उस मन्त्र का तात्पर्य यह है- 'हमारे रक्षक श्रीकृष्ण हैं।उनसे हमारा हजारों वर्षों से वियोग हुआ है, इसी कारण त्रिविध तापों के वशीभूत होकर हमारा सम्पूर्ण आनन्द तिरोहित हो गया है, ऐसी स्थिति वाला मैं श्री गोपी जनवल्लभ भगवान श्रीकृष्ण के निमित्त देह, इन्द्रिय, प्राण, अन्तःकरण और अन्तःकरण के धर्म, स्त्री, गृह, पुत्र, कुटुम्ब, वित्त और आत्मा सबको समर्पण करता हूँ, हे कृष्ण! मैं आपका दास हूँ।'
इस मन्त्र से जीवात्मा का ब्रह्म के साथ सम्बन्ध होना मानते हैं। ब्रह्मा-सम्बन्ध हो जाने पर कोई भी स्त्री-पुरुष भगवान को बिना अर्पण किये न तो अन्न-जल ग्रहण कर सकता है और न वस्त्र, आभूषण, वाहन, धन, स्त्री आदि का उपभोग कर सकता है।सबको कृष्णार्पणपूर्वक भगवत-प्रसादी समझकर उपभोग करो, यही इसका तात्पर्य है। कितना ऊँचा भाव है, वास्तव में पुरुष इस धर्म का सच्चे हृदय से पालन कर सके तो उसका घर में रहते हुए भी कल्याण हो सकता है।भगवान वल्लभाचार्य ने अपने सिद्धान्त को समझाने के लिये स्वयं अनेक ग्रन्थ लिखे हैं तथा पूर्वमीमांसा, उत्तरमीमांसा और श्रीमद्भागवत पर सुन्दर भाष्य लिखे हैं। श्रीमद आचार्य-चरणों ने अनेक ग्रन्थों में बड़ी ही युक्ति के साथ भक्ति-तत्त्व समझाया है। अपने सभी ग्रन्थों का सार पाँच श्लोकों में वर्णन किया है। ये पाँच श्लोक ही उनके यथार्थ सिद्धान्त को स्पष्ट करते हैं। इन पाँच श्लोकों से पाठकों को पता चल जायगा कि जो लोग पुष्टि-सम्प्रदाय को प्रवृत्ति मार्ग बताते हैं और कहते हैं कि पुष्टि-सम्प्रदाय में सर्व कर्म त्याग निषिद्ध बताया गया है, यह उनकी भारी भूल है। भगवान वल्लभाचार्य दो मार्ग बताते हैं- एक निवृत्तिमार्ग, दूसरा प्रवृत्तिमार्ग।निवृत्तिमार्ग को वे सर्वश्रेष्ठ बताते हैं; किन्तु निवृत्तिमार्ग के अधिकारी विरले ही होते हैं, इसलिये जब कोई उसका अनुसरण न कर सके तो वह कृष्णार्पण बुद्धि से अपने वर्णाश्रम के अनुसार श्रीकृष्णप्रीत्यर्थ ही कर्म करता रहे। ब्रह्मचारी से गृहस्थी होना, गृहस्थी से वानप्रस्थ और वानप्रस्थ से संन्यास धारण करना-इसी का नाम प्रवृतिमार्ग है। लोग भूल से सभी संन्यासियों को वानप्रस्थ और वानप्रस्थ से संन्यास धारण करना- इसी का नाम प्रवृत्ति मार्ग है। लोग भूल से सभी संन्यासियों को निवृत्ति मार्ग का ही समझ बैठते हैं।निवृत्ति मार्ग संन्यासी तो वह है कि ज्ञान होते ही चाहे वह कहीं भी कैसी भी दशा में हो, वहीं से सर्वस्व त्याग करके और विधि-निषेध की झंझटों को छोड़कर अवधूत परमहंस बन जाये।उसकी चेष्टा बालक की-सी, जडकी-सी अथवा पागल की-सी हो। ज्ञान पूर्वक एक के बाद एक आश्रम में प्रवेश करते हुए संन्यास धारण करना यह प्रवृत्ति मार्ग है। भगवान वल्लभाचार्य ने इसी प्रवृत्ति मार्ग को अपने जीवन में प्रत्यक्ष दिखाकर लोगों को शिक्षा दी थी। वे निवृत्ति मार्ग की सर्वश्रेष्ठता को अस्वीकार नहीं करते, किन्तु उसके अधिकारी बहुत कम बताते हैं।
पुष्टि सम्प्रदाय वाले इन्हीं पाँच श्लोकों को भक्ति प्रकरण का सन्दोहनरूप समझते हैं। आचार्य आज्ञा करते हैं-
गृहं सर्वात्मना त्याज्यं तच्चेत्त्यक्तुं न शक्यते।
कृष्णार्थं तत्प्रयुंजीत कृष्णोऽनर्थस्य मोचकः।।
(सर्वोत्तम सिद्धान्त तो यह है कि) घर का पूर्ण रीति से परित्याग ही कर देना चाहिये। (किन्तु पूर्व जन्म के संस्कारों से सभी गृह त्याग ने में समर्थ नहीं हो सकते इसलिये) यदि घर को पूर्णरीत्या त्याग करने की सामर्थ्य न हो तो घर में रहकर सब कार्य श्रीकृष्ण के निमित्त-उनके प्रीत्यर्थ ही करे।(ऐसा करने पर कर्म करने से जो पाप होता है। वह पाप न होगा) क्योंकि श्रीकृष्ण सभी प्रकार के अनर्थों को मोचन करने वाले हैं।
संगः सर्वात्मना त्याज्यः स चेत्तयक्तुं न शक्यते।
स सद्भिः सह कर्तव्यः सन्तः संगस्य भेषजम्।।
(सर्वोत्तम सिद्धान्त तो यह है कि) संग किसी का करना ही नहीं चाहिये। सभी प्रकार के संगों का एकदम परित्याग कर देना चाहिये। (किन्तु अनेक जन्मों से जीव का समाज में मिलकर रहते आने का स्वभाव पड़ गया है, इसलिये) सब प्रकार के संगों का परित्याग करने में समर्थ न हो सके तो सज्जन तथा सन्त-महात्माओं का ही संग करना चाहिये। क्योंकि संग से जो काम उत्पन्न हो जाता है उसकी ओषधि सन्त ही हैं।
भार्यादिरनुकूलश्चेत्कारयेद्भगवत्क्रियाः।
उदासी ने स्वयं कुर्यात् प्रतिकूले गृहं त्येजत्।।
तत्त्यागे दूषणं नास्ति यतो विष्णुपरांगमुखः।
(अब बताते हैं जो गृहस्थी बन चुका है उसे कैसा व्यवहार करना चाहिये। उस के लिये बताते हैं) यदि स्त्री आदि परिवार अपने मन को माफिक भगवत्भक्तिपरायणादि हो तो उससे भी भगवान की सेवा-पूजा आदि करवावे।क्रमशः
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